`अंग्रेज़ी` की अनिवार्यता ने कराई छात्र से आत्महत्या

निर्मलकुमार पाटोदी

इन्दौर(मध्यप्रदेश)

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भारत की केन्द्र सरकार में पिछले बहोत्तर साल में जिन दलों ने भी सरकार में भागीदारी की है,उन सभी दलों के नेता,देश के प्रबुद्ध और विवेकशील नागरिक, इन्दौर(मध्यप्रदेश) के बारहवीं कक्षा में हिन्दी माध्यम से उत्तीर्ण विद्यार्थी शुभम मालवीय द्वारा की गई आत्महत्या के लिए अक्षम्य अपराधी हैं। २९ अक्तूबर २०१८ के इन्दौर के अख़बारों में प्रकाशित समाचार है: इन्दौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के प्रथम वर्षीय छात्र ने अंग्रेज़ी में कमज़ोर होने से फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने के बारे में माता-पिता को लिखा है-“मम्मी-पापा मुझे माफ़ कर देना। आप मुझे पढ़ाना चाहते थे,लेकिन मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती है,इसलिए मैं ठीक से नहीं पढ़ पा रहा हूँ।”

अब प्रस्तुत हैं अंग्रेज़ी भाषा के अनिवार्य माध्यम पर महात्मा गांधी(जिनकी डेढ़ सौ वीं जन्म शताब्दी देश और दुनिया में मनाई जा रही है)द्वारा यंग इण्डिया में प्रकाशित लेख शीर्षक-‘राष्ट्रीय शिक्षा’ (१ सितम्बर १९२१) में व्यक्त विचार-“विदेशी माध्यम के द्वारा वास्तविक शिक्षा असंभव है।”

अब रही शिक्षा के माध्यम की बात,तो इस विषय पर मेरे विचार इतने स्पष्ट हैं कि यहाँ उनके दोहराने की जरुरत नहीं। इस विदेशी भाषा के माध्यम ने लड़कों के दिमाग़ को शिथिल कर दिया और उनकी शक्तियों पर अनावश्यक जोर डालाl उन्हें रटटू और नक़लची बना दिया,मौलिक विचारों और कार्यों के लिए अयोग्य कर दिया और अपनी शिक्षा का सार अपने परिवारवालों तथा जनता तक पहुँचाने में असमर्थ बना दिया है। इस विदेशी माध्यम ने हमारे बच्चों को अपने ही घर में पूरा पक्का परदेशी बना दिया है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का यह सबसे बड़ा दु:खांत दृश्य है।

अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की बढ़ोतरी को रोक दिया है। यदि मेरे हाथ में मनमानी करने की सत्ता होती तो मैं आज से ही विदेशी भाषा द्वारा हमारे लड़कों-लड़कियों की पढ़ाई बन्द कर देता,और सारे शिक्षकों और अध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवाता या उन्हें बरखास्त करता। मैं पाठ्य-पुस्तकों की तैयारी का इन्तज़ार न करता,वे तो परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आएंगी। यह ख़राबी तो ऐसी है, जिसके लिए तुरंत इलाज की ज़रूरत है।

यहाँ इतना ही कहना है कि गांधी को मानते हो,गांधी की नहीं मानते हो। संसद के दिसम्बर में होने वाले शीत-क़ालीन सत्र में शिक्षा-प्रणाली में से अंग्रेज़ी भाषा की अनिवार्यता को समाप्त करने संबंधी विधेयक प्रस्तुत हो,और उसके पहले सरकार इस संबंध में अध्यादेश निकाले। स्वाधीन भारत में विदेशी भाषा अंग्रेज़ी की साम्राज्यवादिता से मुक्ति दिलाई जाए।

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