अकेले रह गए…

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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(तर्ज:दिल के अरमां आँसूओं में बह गए…रचना शिल्प:२१२२   २१२२   २१२)

इस जमाने में अकेले रह गए।
छोड़कर जब अलविदा वो कह गएll

हर तरह दुनिया ने सताया था मगर,
सब तुम्हारे वास्ते हम सह गए।

प्यार के इस खेल में हारा हुआ,
रेत के दीवार-सा हम ढह गए।

जल रहा दीपक उजाला है कहाँ,
चाँदनी वो रात में सब बह गए।

हम जिसे किस्मत समझते ही रहे,
ख्वाब वो `बोधन` अधूरे रह गएll

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