अथ श्री सु-चालक कथा

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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आदमी को जब उदर(पेट) से नीचे के रोग हो जाएं तो उसे सरकार बनाने और सरकारी बसों की यात्रा नहीं करनी चाहिए। हाँ,सरकार बनाने में सहयोग करने या उसे परामर्श देने जैसे छोटे-मोटे कार्य करते रहने चाहिए,इससे घर चलाने के लिए नामा मिलता रहे,मुहल्ले में नेता स्वरूप साख बनी रहे,जिलाधीश पर्ची देखकर अंदर बुलाता रहे,दशहरे पर अध्यक्षता की कुर्सी मिलती रहे और सबसे बड़ी बात थानेदार फोन पर पहचान ले और रपट को फिसलपटटी बना दे, जिससे फंसा हुआ आदमी रपटकर दूसरे किनारे पहुंच जाए। जब सरकारी बसों की यात्रा की जाए,तो सुचालक से मधुर संबंध बनाएं। कुचालक (कंडक्टर) से सिफारश लगाएं,जिससे सुचालक के बाएं विराजमान हो सकें। उसके दो फायदे हैं, दुर्घटना की संभावना को आप स्वयं होते हुए देख सकते हैं, दुर्घटना के चश्मदीद गवाह के रूप में आपको पुलिस द्वारा बार-बार तंग किया जा सकेl अगर बीड़ी अथवा खैनी के शौकीन हैं तो आपकी आत्मीयता और प्रगाढ़ हो सकती हैl सबसे बड़ी बात उदर रोग के कारण अगर आपको दो मिनट का विश्राम चाहिए,तो आप उसका फायदा राजनीति में भतीजा होने जैसा उठा सकते हैं।
सरकार में शुभचिंतक और सरकारी बस में सुचालक दोनों ही आने वाली विपदाओं से बचा सकते हैं। बीकानेर से नागौर जाते समय इसी बात का ध्यान रखा गया कि किसी तरह सुचालक के पास स्थान मिल जाए। पहले तो सुचालक (ड्राइवर साहब) की पहचान की,फिर उन्हें एक चाय पेश की। आखिरकार सुचालक से संबंध बन गए और उनके बगलस्त होने का मौका मिला।
सुविधा सभी चाहते हैं,बस निकल पड़ी। कुछ दूर जाने के बाद एक और सुचालक महोदय ने विशेष प्रकार से इशारा किया और उसे भी हमारे पास ही स्थान मिला। हमारे संबंध अब तेल लेने गए। जब चाचा के सामने जीजा आ जाए तो चाचा को दरकिनार कर दिया जाता है। हम भी दरकिनार हो गए।
मित्रों का आदेश है कि,आप इतने महान नहीं हैं कि लिखते समय गालियों का प्रयोग करें। गाली का उपयोग करना वरिष्ठ और महान लेखकों का एकाधिकार है।
खैर,सुचालकों की दुआ-सलाम के बाद बातचीत का सिलसिला पारिवारिक संबंध को व्यक्त करने वाले शब्दों से शुरू हुआ। सबसे पहले कहां से आना और कहां जाना है। फिर खैनी का मलना। जो भी काम किया जाता है,वह चूना लगाकर ही किया जाता है। यह बात दोनों सुचालकों ने स्वीकार की। मुख्य सुचालक ने कहा-भाई चूना कम लगाना। दूसरा-अरे अब तो चूना लगाना मुश्किल हो गया। अब तो सरकार ने चूना लगा दिया और ये कम्प्यूटर वाला डेस्क बोर्ड लगा दिया। अब तो मालिक को चूना नहीं लगा सकते। दो- चार सवारी ज्यादा बिठा लो तो चेकर जेब पर चूना लगा देता है। डेस्क बोर्ड बता देता है कि गाड़ी में क्या खराबी है।
अरे भाई,पहले सरकार चलाना और बस चलाना एकदम आसान था। कोई भी अनपढ़ सीट पर बैठा और टापो-टॉप निकल पड़ी। अब तो पढ़ा-लिखा होना जरूरी है। कुछ दिन और बचे हैं कट जाएंगे,जैसे सरकार धक्के खाकर चल रही है,हमारी भी गाड़ी चली जाएगी।
सुचालक-एक ऐसा डेस्क बोर्ड भी बनना चाहिए जो फौरन बता दे किसने किस बैंक से सरकार को चूना लगाया। सरकार को इतना चूना लगाया,लेकिन फिर भी सरकार को फरक नहीं पड़ता। एक सरकार को चूना लगाकर जाता है और दूसरा आकर फिर चूने की तगारी माथे पर रखकर आ जाता है।
दूसरा- भाई कोई भी चूना लगाए। चूना तो जनता को ही लगता है। बैंक में जनता का पैसा लगता है। चाकू खरबूजे पर गिरे,या खरबूजे पर चाकू,नुकसान तो जनता का ही होना ही है। खैनी में चूना लग चुका था। चूना लगने के बाद खाने लायक हो जाता है। चूना लगाकर खाने का आनंद ही कुछ और होता है। जब चूना लगाया जाता है,तो अकेले नहीं खाया जाता। जब चूना लगाकर खाना है तो मिल-बांटकर खाओ। अकेले चूना वाला माल खाने से मुंह में छाले पड़ जाते हैं। इसीलिए,चूना लगाते समय कम-से-कम दो और अधिक से अधिक कितने भी हो सकते हैं। खैनी मुंह में जाते ही सुचालक का स्वर बदला,विषय बदला।
अचानक भैंस का कटड़ा यानी पाड़ा सामने आ गया। खैनी के असर और गर्मी ने भाषा बदल दी। जोरदार ब्रेक मारा। पेट के नीचे से बीमारी वाले यात्री दहल गए। ब्रेक के साथ ही साथ कटड़े से पारिवारिक संबंध स्थापित करते हुए सुचालक ने कहा-सरकार भी सड़क की तरह है। सड़क पर गाड़ी चलाना और विपक्ष के गड्ढों में सरकार चलाना एक जैसा ही है। न सड़क के गड्ढे भरते हैं,और न विपक्ष का हंगामा। चालक तो महात्मा गांधी की मूर्ति बन बैठा रहता है, बस देखता रहता है,कर कुछ नहीं पाता। न तो सुधार कर पाता है,न भाग पाता है।
अब उसकी फिलास्पी चल निकली थी। सड़क के गड्ढे और मृत्यु दो ही सत्य हैं। न मृत्यु टल सकती है,न गड्ढे भर सकते हैं। ऐसा नहीं,मृत्यु टल भी जाती है,चिकित्सक टाल देते वेंटीलेटर लगाकर,कुछ देर कर देते हैं। पेट भरते ही वेंटीलेटर हटा देते हैं। गड्ढे भी भरते हैं-सड़क बनती है,बाबू साहेब की साइकिल,साहब की गाड़ी,मंत्री जी का बंगला तैयार होते हैं,सड़क के गड्ढे भरने के साथ-साथ इनके पेट का गड्ढा भी जब भर जाता है,सड़क सुधर जाती है।
सरकार कभी-कभी अच्छे काम भी करती है। अब सड़क पर आसानी से पव्वा मिल जाता है। सड़क किनारे लाल रंग से लिखा रहता है-`दारू की दुकान-मात्र ५०० मीटर की दूरी पर।`
भैया हमें क्या सरकार से लेना,क्या मंत्री के बंगले से। बस साल में एक बार सड़क ऐसी बनवा दें,जिससे शरीर का दर्द मिटाने के लिए पव्वा न लेना पड़े।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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