अद्भुत श्रीमद भागवत(कथा भीष्म मुक्ति की) भाग – ६

नागेश्वर सोनकेशरी
इंदौर(मध्यप्रदेश )
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कथा भीष्म मुक्ति की)
भाग – ६
दोहा १-  
सरशय्या पर शांति से,लेटे थे योगीश। 
उसी जगह जा धर्म ने,उन्हें झुकाया शीशll 
चोपाई-
जिव्हा ने प्रणाम छोड़,आगे अक्षर भी कहा नहीं।
आँखों से आँखे मिली रही,पर बल आँखों में रहा नहींll 
देकर आशीष भीष्म ने ही पूछा,राजन क्या हालत है।
यह विश्व विजय पाने पर भी,भिखमंगे-सी क्यूं सूरत हैll 
धर्म ने कहा यह जय ही तो,जीवन की असली हार हुई।
जिसको मैं कार समझता था,यह कोयले की बेगार हुईll 
दुनिया प्रत्यक्ष में कहती है,मैंने यह नाम कमाया है।
पर आत्मा कहती है तूने,जीवन को दाग लगाया हैll 
जो शांति और श्री थी मुझ पर,भगवान भिखारी होने से।
वह शांति नहीं अब दिखती है,इस राष्ट्र अधिकारी होने सेll 
दोहा २-  
इस ममता की आग ने,दिया वंश को भून।
चुटकी लेने की जगह,तोड़ दिए नाखूनll 
दोहा १- 
भीष्म पितामह ने कहा,नृप छोड़ो यह ज्ञान।
पाप,ताप कुछ भी नहीं,है केवल अज्ञानll 
दोहा २-
लीला लीला धाम की,मान करो संतोष।
राजन इस रण कर्म में,नहीं किसी का दोषll 
चौपाई-
हम तुम क्या थे कठपुतले थे,नट की इच्छा पर फूट गए।
जुट पड़े परस्पर टकराकर,तुम बने रहे हम टूट गएll 
जल के बुलबुलों जैसे हम,उठते-मिटते दिखलाएंगे।
यह सिंधु रूप जैसे भी थे,फिर वैसे ही रह जाएंगेll 
वे देव यही देवाधिदेव सविकार यही,अविकार यही।
पति तत्व यही,तत्वज्ञ यही,विश्वम्भर बिहारीलाल यहीll  
नागेश्वर सोनकेशरी २१-
कारण कर्ता यह कर्म रूप जो कुछ हैं,ये लीलाधर हैं।
इस दुनिया के व्यापार सभी,इनकी इच्छा पर निर्भर हैंll 
दोहा 3- 
इसी भाँति सत्संग में,आया फागुन मास।
भीष्म भक्त कहने लगे,सुनिए जगन्निवासll 
चौपाई-
जीवन की अन्तिम श्वासें हैं,नैया आ चुकी किनारे पर।
अब लंगर खींचा जाता है,बलिया विश्वास तुम्हारे परll 
रण ही कैसा हे जगन्नाथ,उस जगह निठुरता धरियो ना।
जैसे इस जगह बिसर बैठे,वैसे उस जगह बिसरियो नाll 
भजन जैसा भी बनाया प्रभु ने,वैसा बन आया जीव,
कोई भूपति कोई रंक यहाँ कोई भिखारी है।
पाप-पुण्य दोनों कर्म जीव,धर्म कहते हैं,
इनके ही बूते पर सृष्टि अनुसारी हैl 
उत्तम कराया किया,मध्यम कराया किया,
आप-आप करने की,शक्ति क्या हमारी है।
अब भी जो कराओगे करना पड़ेगा हमें,
करना कराना तो मर्जी तुम्हारी है।
दोहा ४-
यह सुनकर कहने लगे,कमलनयन के नैन।
सिसकी भर संकोच में,बोले माधव बैनll 
(क्या कहते हैं भगवान)
चौपाई-
हे कर्मवीर हे ज्ञानसिंधु,अब यह प्रलाप दिखलाओ ना।
आओ शांति से करो पयान,चलो नाहक से मुझे लजाओ नाll 
ऐ सुनो राष्ट्र भूषण जाओ,अब आशा पूर्ण तुम्हारी हो।
यश कीर्ति तुम्हारी अमिट रहे,शुभ गति के तुम अधिकारी होll 
दोहा ५-
 शांति सहित हरिओम कह,कर कृष्ण को प्रणाम।
भारत के श्रृंगार वह,पहुँच गए सुरधामll 
दोहा १-
रोते-धोते धर्मपथ,लौटे अपने धाम।
कृष्णचन्द्र का नाम ले,कर विनती विश्रामll 
दोहा २-
 जगत विजय पर धर्म ने,रचा यज्ञ का साज।
विदा माँग नरराज से,गमने यादवराजll  
२२ अदभुत् श्रीमद् भागवत
दोहा ३-
और अंधपति विदुर से,कहने लगे विचार।
भैय्या टूटेगा नहीं क्या ये,माया का तारll 
चौपाई-
हो चुका देह का तार-तार,पर माया तार न टूट सका।
मरघट की ओर जा रहा हूँ,फिर भी श्रृंगार न छूट सकाll 
खा लिया वंश,परिवार सभी,अब काल न मुझको खाता है।
हो चुका द्रोह या क्षोभ खतम,पर ममता मोह न जाता हैll 
(धृतराष्ट्र ने कहा विदुर से)
दोहा ६-
 शांति सत्य मिलता नहीं,न घर में मिलता झूठ।
जैसे मिल सकता कभी,नहीं बाम पर ऊँटll 
चौपाई-
है लाख त्याग वैराग्य भाव,या लाख भक्ति से नाता है।
लेकिन घर के षट्रोगों से,वह राग हवा हो जाता हैll 
इन सबके साथ निभाने का,इतने दिन स्वाद उठाया है।
अब चलो कहीं हरि भजन करें,चौथापन आगे आया हैll 
दोहा ७-
गांधारी,कुंती,विदुर,अंधराज के साथ।
व्यासाश्रम को चल दिए,बिना कहे कुछ गाथll 
चौपाई-
कुछ दिन तक करते हुए,यों ही योग विधान।
हुआ शांति के साथ में,उनका नवनिर्वाणll 
धर्म भवन में जिस समय,पहुँचा यह संवाद।
आत्माओं में यकाएक,उतर गया आह्वादll 
दोहा ८-
 उन्हीं दिनों साकेत को,गवने श्री भगवान।
सुनते ही संवाद यह,रोए धर्मनिधानll 
चौपाई-
फिर कहा धर्म ने बंधु उठो,सीमा हो चुकी विलासों की।
अब समय नहीं है सोने का,कुछ कीमत आँको श्वासों कीll 
बस समझ रखो इस जीवन में,क्षण भर भी चैन न पाएंगे।
हम खाक छानने आए हैं,और खाक छानते जाएंगेll 
आगे न रहा पीछे न रहा जो है,वह भी न दिखाएगा।
जो इसे हाथ से खोया तो,बस शोक ही हाथ रह जाएगाll 
दोहा ९-
अर्जुन ने उत्तर दिया,अब कैसा आराम।
स्वच्छ नजर आने लगा,जीवन का परिणामll  
नागेश्वर सोनकेसरी २३- 
चौपाई-
यह जीवन ही मृगतृष्णा है,इसमें विश्राम न पाना है।
हम लाख बरस भी जिया करें,पर हरदम खाक उड़ाना हैll 
देखा सपना चुटकुले सुने,इनके सिवाय क्या कुछ निकला।
अपना माना गैरों का हुआ,सब-कुछ समझा,कुछ न निकलाll 
इससे मेरी तो सम्मति है,हम भी दिन पाकर ढल जाएँ।
जब प्रायश्चित ही करना है,तो चलो हिमगिरि जाकर गल जाएँll 
दोहा १०-
 शीघ्र परीक्षित लाल को,देकर सब अधिकार।
गए हिमालय के लिए,पाँचों पाण्डुकुमारll 
चौपाई-
द्वापर का अंत समय था वह,कलयुग की बारी आई थी।
मानो सुख सूर्य डूबता था,दु:खमय अंधियारी आई थीll 
या द्वापर था मृत शैया पर,कलि बालरूप पल्ले पर था।
पापों का उदय हो रहा था,पुण्यों का रवि ढलने पर थाll  
(एक दृष्टि यहाँ भी:योगीश-भीष्म,  धर्म-युधिष्ठिर)
परिचय-नागेश्वर सोनकेशरी की जन्मतिथि २५ मई १९७५ और जन्म स्थान मंडला(मध्यप्रदेश )है। आपका  वर्तमान निवास इंदौर स्थित विजयनगर में है। श्री सोनकेशरी की शिक्षा बी.ए. और कार्यक्षेत्र में सहायक आबकारी आयुक्त (आबकारी विभाग,मध्यप्रदेश)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत संस्थाओं से जुड़कर इंदौर और रतलाम में सेवा देते हैं। आपकी लेखन विधा आलेख है, जिसके प्रेरणापुंज इनके गुरूदेव हैं। आपके इस प्रयास को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख और केन्द्रीय  मानव संसाधन मंत्री भी प्रशंसित कर चुके हैं। सात साल की मेहनत से आपने यह पुस्तक तैयार की है। प्रकाशन में अदभुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) महापुराण आपके द्वारा सरलता से लिखने के लिए गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं वर्ल्ड बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इनकी विशेष उपलब्धि मात्र ६ माह में इस रचना की  ३२०० पुस्तकों का विक्रय होना है। नागेश्वर सोन केशरी की लेखनी का उद्देश्य-भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का प्रचार व प्राप्त राशि से ग़रीब मरीज़ों की सेवा करना है। 

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