अद्भुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा )

नागेश्वर सोनकेशरी
इंदौर(मध्यप्रदेश )
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भाग-२………………………..
आत्मदेव की कथा
चौपाई ये ज्ञान भक्ति के चर्चे हैं,स्वर्ग या मुक्ति की इच्छा है।
अब सुनो दशा उन लोगों की,जिनको धन जन की आशा है॥
दक्षिण में आत्मदेव नामी,सज्जन सीधा सा ब्राह्मण था।
पंडित था और चतुर भी था,साधु था ब्रह्म परायण था॥
धुँधली नामक उसकी नारी,मानो विप्र की ग्रह दशा थी।
स्वामी जितना भी सज्जन था,उतनी ही नारि कर्कशा थी॥
फिर भी हरि इच्छा समझ विप्र,व्याधि को न्यारा करते थे।
सब सुख-दुःख सहते जाते थे,शांति से गुजारा करते थे॥
गालियाँ सुनी अपमान सहे,तो भी वह छोर न छोड़ा था।
बंधुओं यही बस समझ रखो,वह केर-बेर का जोड़ा था॥
दोहा १
 पहले तो थे विप्रवर,नारी से हैरान।
वहाँ देव संयोग से,हुई न थी संतान॥
दोहा १
 चांदी-सोना धेनु-धन,जो कुछ भी था पास।
दे डाला सब दान में,किन्तु न पूजी आस॥
चौपाई संतान न अब हो सकती है,तब विप्र देव ने जान लिया।
तब मरने का निश्चय करके,घर-बार छोड़ प्रस्थान किया॥
वन में सरिता ढूंढने लगा,वह मरने का अभिलाषी भी।
हरि इच्छा से घाट पर वहीं,आ गया एक सन्यांसी भी॥
वह बोला कहाँ भटकते हो,क्या इच्छा हृदय समाई है।
द्विजराज तुम्हारे चेहरे पर,प्रत्यक्ष निराशा छाई है॥
दोहा ३
 ब्राह्मण बोला क्या कहूँ,अपनी व्यथा कराल।
करे न प्रभु मेरी तरह,दुश्मन का भी हाल॥
चौपाई जीवन की श्वांस चुक रही है,मौत भी सामने झूली है।
जीवन की डाली सूख चली,पर जीवन आश न फूली है॥
नागेश्वर सोनकेसरी ७
भगवन ऐसे हैं कौन जतन,जिसका कर चुका विधान नहीं।
सब दान किए सब पुण्य किए,पर हुई एक संतान नहीं॥
भावी का ऐसा चक्कर है,यह भाग्य कहीं भी जगा नहीं।
गौ के भी बछड़ा हुआ नहीं,बिरवे में भी फल लगा नहीं॥
सुनता हूं जो पापी अपने जीवन में,पुत्र न पाते हैं।
वे स्वयं नरक में जाते हैं,पुरखों को भी नरक ले जाते हैं॥
ऐसी सूरत पर अब न,घर रहना अच्छा है।
अथवा निराश हो जाने पर न जीना, मरना अच्छा है॥
दोहा ३
 आया हूंँ इस जगह पर,नाथ मरण की ठान।
छोड़ दिया संतान पर,प्राणों का भी ध्यान॥
चौपाई सन्यासी बोला महाराज,किसने भ्रम में भटकाया है।
मोक्ष और स्वर्ग का द्वार,कहो बेटा किसने बतलाया है॥
यह हमने माना पिंडदान,कुछ शांति वहांँ पहुंचाते हैं।
लेकिन यह बात न संभव है,हम उसे स्वर्ग ले जाते हैं॥
यह तो कर्मों की खेती है,जो बोएगा सो पाएगा।
कर्मों से मुक्ति दिलाने में,बेटा क्या हाथ लगाएगा॥
कर्मों का बोझ उठाने में,बेगार से काम न चलता है।
द्विजवर यह भ्रम है धोखा है,बेटों से नाम न चलता है॥
मेरे विचार में तो संतति,उल्टा प्रभाव दिखलाती है।
उसकी माया ममता हमको,नर्क की ओर ले जाती है॥
पुत्र के भरण-पोषण में हम,पेट भी न भरने पाते हैं।
उसकी ममता में फँसने से,हरि भजन न करने पाते हैं॥
देवात कपूत हुआ पैदा,तो उल्टा पीछे पड़ता है।
परलोक बने या बिगड़ जाए,पहले यह लोक बिगड़ता है॥
दोहा ४
 दे न किसी माँ-बाप को,कुल कपूत के हाथ।
द्विजवर ममता छोड़कर,जपो जानकीनाथ॥
दोहा (१)
द्विज बोला संतान का,अब है भूत सवार।
दयाधाम इस दीन को,समझाना बेकार॥
चौपाई इसलिए न माथ खपाओ प्रभु, समझाकर यह भवजाल हमें।
हो उदार दे सकते हो तो,दो गोदी का लाल हमें॥
८-अदभुत् श्रीमद् भागवत
फल दिया तब उस सन्यांसी ने,नारी के लिए खिलाने को।
पर वह पापिनी तैयार न थी,संतति के कष्ट उठाने को।।
दोहा ५
बोली अपनी बहन से,बहिन बचा ले प्राण।
यह फल आया है मुझे,निश्चय काल समान।।
चौपाई फल खाने से रह गया गर्भ तो, केलि गर्भ गिर जाएगा।
हे बहिन महल में पड़े-पड़े,यह माटी कौन सड़ाएगा॥
खाना-पीना श्रृंगार खेल,आप ही छूट सब जाएंगे।
हे बहिन प्रसव की पीड़ा से,बेमौत प्राण तब जाएंगे॥
फिर पैदा भी संतान हुई तो,जीवन भर को भार हुआ।
सुख की घड़ियाँ सब छूट गई,दूसरा साहू तैयार हुआ॥
वह गंदापन मल-मूत्र बहिन,मुझसे न संभाला जाएगा।
उस आठ पहर के चक-चक में,जीना बवाल दिखलाएगा॥
इसलिए उपाय सोच बहिना,इस पिस जाने से बची रहूँ।
फल का फल भी फल दिखलाए,मैं फल खाने से बची रहूँ॥
दोहा ६
 वह बोली मत कर बहिन,इसकी कुछ परवाह।
खोल रखी है देव ने,पहले ही से राह॥
चौपाई फल आए जितना समय हुआ, उतना ही गर्भ हमारा है।
अब अपने पति को बातों में,बहकाना काम तुम्हारा है॥
मेरा बेटा अपना कहकर,बातों में उन्हें भुला देना।
फिर दूध बढ़ाने के बहाने से,मुझको भी वहीं बुला लेना।।
दोहा ७
 ठहर गई इस भांति से,उन दोनों की राय।
लुका-छिपाकर गाय को,वह फल दिया खिलाय॥
दोहा (१)
मिली बहन से बहिन को,कुछ दिन में संतान।
गौ से भी बछड़ा हुआ,लेकिन मनुज समान॥
चौपाई बेटे का नाम धुंधुकारी,ज्योतिषों ने बतलाया है।
एवं उस गौ के बछड़े को,गौकर्ण नाम ठहराया है॥
नाम के साथ गुण का प्रमाण,दोनों दे रहे नामधारी।
और गौ के समान थे कान वहाँ,वह था प्रत्यक्ष धुंधुकारी॥
दोहा ८
 ब्राह्मण ने माना उन्हें,अपने लिए समान।
पालन-पोषण का रहा,एक रूप से ध्यान॥
निरन्तर जारी………
परिचय-नागेश्वर सोनकेशरी की जन्मतिथि २५ मई १९७५ और जन्म स्थान मंडला(मध्यप्रदेश )है। आपका 
वर्तमान निवास इंदौर स्थित विजयनगर में है। श्री सोनकेशरी की शिक्षा बी.ए. और कार्यक्षेत्र में सहायक आबकारी आयुक्त (आबकारी विभाग,मध्यप्रदेश)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत संस्थाओं से जुड़कर इंदौर और रतलाम में सेवा देते हैं। आपकी लेखन विधा आलेख है, जिसके प्रेरणापुंज इनके गुरूदेव हैं। आपके इस प्रयास को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख और केन्द्रीय  मानव संसाधन मंत्री भी प्रशंसित कर चुके हैं। सात साल की मेहनत से आपने यह पुस्तक तैयार की है। प्रकाशन में अदभुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) महापुराण आपके द्वारा सरलता से लिखने के लिए गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं वर्ल्ड बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इनकी विशेष उपलब्धि मात्र ६ माह में इस रचना की  ३२०० पुस्तकों का विक्रय होना है। नागेश्वर सोन केशरी की लेखनी का उद्देश्य-भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का प्रचार व प्राप्त राशि से ग़रीब मरीज़ों की सेवा करना है। 

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