अद्भुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा )

नागेश्वर सोनकेशरी
इंदौर(मध्यप्रदेश )
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भाग ३………………………………..
गौकर्ण और धुंधुकारी की कथा…
दोहा १
एक रूप भोजन बसन,एक रूप की चाह।
पर चलते ही चल पड़े,अपनी-अपनी राह॥
चौपाई
गौकर्ण सुबह से संध्या तक,पूजन में समय बिताने लगा।
खल नीच धुंधुकारी लेकिन, वेश्याओं के घर जाने लगा॥
गौकर्ण जहाँ पर जाता है,छा जाता है जयकार वहाँ।
पर धुंधुक की धांधलियों से, मचता है हाहाकार वहाँ॥
डण्डों से माँ की पूजा की,लातों से गुरु सत्कार किया।
घर में जो कुछ जर-जेवर था,वह सारा बंटाढार किया॥
आंँखें तब खुली ब्राह्मण की,जब व्यापा कठिन क्लेश उसे।
सिर पर बीती तब समझ पड़ा,सन्यासी का उपदेश उसे॥
दोहा २
 रो-रोकर गौकर्ण से,कहा हृदय का हाल।
कैसे कटे बवाल यह,तुम्हीं कहो हे लाल॥
चौपाई तेरे सत्कर्मों को लगकर, जितनी छाती सिहराती है।
उसकी काली करतूतों से,उससे दुगुनी धधकाती है॥
मैं समझा था संतानों से,हर हालत में सुख होता है।
खबर न थी कि दुष्टपुत्र का,बाप जन्म भर रोता है॥
दोहा ३
विहस कहा गौकर्ण ने,तजो तात यह ध्यान।
होती है जग में नहीं,संतति एक समान॥
चौपाई
कोई सुखदायिनि होती है, कोई अतिशय दुख देती है।
कुछ भली भी है कुछ बुरी भी है, यह तो जीवन की खेती है॥
संतान और धन धानों से,आत्मा में क्रांति नहीं होती।
मैं तो इतना ही समझता हूंँ,दुनिया में शांति नहीं होती॥
यदि तुम्हें शांति की इच्छा है,तो सीधे वन को गमन करो।
मुझको छोड़ो उनको छोड़ो,श्री रामचन्द्र का भजन करो॥
१०
अदभुत् श्रीमद् भागवत
भजन वेदन बखानी यह सरस कहानी,
बिनु राम रस पानी,
अन्त नाही रस पहेरे,सुख को दिवैया
जिन्हें जानत है अजान सो छय्या पितु भय्या,
कोऊ सुख न देहे रे,काहु को संयोग
शोभ काहु को वियोग,शोभ भोग रोग क्षोभ
भोग मूढ़ मर जई है रे,लाखों उपाय
हाय हाय सौ गंवाये कहा
बिना राम प्रेम,कहु शांति न लहिये॥
दोहा ४
उसी समय वन को गया,विप्र सहित आव्हाद।
चला गया गौकर्ण भी,कुछ दिवसों के बाद॥
चौपाई
अब तो डण्डा लेकर माँ पर,वह अत्याचार ढाया है।
पूछने लगी पापिनी बता,घर का धन कहाँ छिपाया है॥
कल बतलाऊंँगी यों कहकर,बच सकी उस समय दुःखियारी।
पर रात समय डर के मारे,गिर पड़ी कुएं में महतारी॥
घर में पाई भी मिल न सकी,गाँठ में न एक छदाम मिला।
तब चोरी और डकैती ही,उस व्यभिचारी को काम मिला॥
दोहा ५
वेश्याओं ने देख यह,मन में किया विचार।
खा जाएगा एक दिन,इस खल का व्यवहार॥
चौपाई
वह ठगी डकैती का पैसा,अपना प्रभाव दिखलाएगा।
यह जाएगा सो जाएगा,साथ में हमें ले जाएगा॥
यह नीच दण्ड के बिना कभी, पाप से न मुँह को मोड़ेगा।
मैं लाख तरह समझाऊँ भी,पर दुष्ट ना पीछा छोड़ेगा॥
दोहा ६
किया रात ही रात में,उसका काम तमाम।
मिला ना पापी को मगर,मरकर भी विश्राम॥
दोहा (१)
उजड़ गया हर तौर से,आशाओं का खेत।
वहाँ धुंधुकारी हुआ,महाभयानक प्रेत॥
चौपाई
जिसकी ऐसी दुर्गति होगी,उसको ही प्रिय वेश्या होगी।
जो सगे बाप की सगी नहीं,वह किसी और की क्या होगी॥
नागेश्वर सोनकेशरी ११
धन,धर्म,बुद्धि,बल और तेज, इनको बेकार गँवाओ ना।
जो अपना भला चाहते हो, वेश्याओं के घर जाओ ना॥
भजन चंडिका की तानी,जनु धर्म महिषासुर पे
कर्म तेज ज्वाल हारी हंडिका उफानी है
पाप की निशानी छानी विपत्ति गिरानी कैर
अपनी विरानी खोट खाला खरियानी है
कोकिला-सी बानी पे नागिनी विहानी विष
दोष दुख दानी एक दाम की दिवानी है
रानी-सी दिसत छवि कर्म मेहतारी से
रण्डिका न जानो यह खासी खण्ड खानी है।
दोहा ७
मिला वहाँ गौकर्ण को,किसी तरह संवाद।
भाई के नाते हुआ,उसको अधिक विषाद॥
चौपाई
सौ जगह कराया पिंडदान,पर पातक पिंड न छूट सका।
हर तरह लगाया तार मगर,कर्मों का तार न टूट सका॥
गौकर्ण जहाँ घर पर आया,त्यों ही वह प्रेम दिखाने लगा।
सुकर भैंसा,घोड़ा,बकरा,बन- बनकर आगे आने लगा॥
दोहा ८
पूछताछ की बंधु ने,बहुत लगाई घात।
पर वह रोने के सिवाय,कर न सका कुछ बात॥
चौपाई
कुछ मंत्रों का प्रयोग करके पूछा, क्या दशा तुम्हारी है।
तब रोकर यही जवाब मिला,यह पापी शरण तुम्हारी है॥
मेरी काली करतूतों ने,इस हालत पर पहुंँचाया है।
भाई वेश्या की संगति ने,भाई को भूत बनाया है॥
सांसारी सूक्ष्म यातनाएँ मुझको, दिन-रात जलाती हैं।
जीवन की सुखदायी घड़ियाँ,यों सपने सामने दिखाती है॥
यह पंचतत्व ही शत्रु हुए,दुनिया में कारागार मुझे।
यह कपट योनियाँ चोले हैं,है वायु मात्र आहार मुझे॥
दोहा ९
हालत सुन गौकर्ण,यह हुआ बहुत हैरान।
बोला तेरे नाम पर,किए बहुत व्रत दान॥
१२ अदभुत् श्रीमद् भागवत
चौपाई
गंगा,हरिद्वार,प्रयाग गया,शुभ श्राद्ध दान कर आया हूँ।
संसार सिद्ध है गया तीर्थ,उस जगह पिण्ड धर आया हूंँ॥
इतने क्षेत्रों में दान कभी,होता समझो बेकार नहीं।
अचरज है इतना यत्न किया,हो सका मगर उद्धार नहीं॥
दोहा १०
धुंधुक ने रोकर कहा,करो लाख व्रत दान।
लेकिन मिट सकता नहीं,पातक कर्म प्रधान॥
चौपाई
लाओ तिल भर खाओ दिन भर, घर में अन्न न जुड़ता है।
तंत्रों से व्याधि न टलती है,फूंक से पहाड़ न उड़ता है॥
मेरे उन घोर कुकर्मों को,हर सकते हैं व्रत दान नहीं।
नाथ ही न्यायशाला है वह,कुछ रिश्वत की दुकान नहीं॥
मैंने परिवार विनाश किया,अब तुम उद्धार करो भैया।
भैया का भैया डूब रहा,अब नैया पार करो भैया॥
अन्यथा पार करने वाला,एक भी देव बलवान नहीं।
इतने ही में बस समझ रखो,विश्व में मुझे स्थान नहीं॥
दोहा ११
इसी समय गौकर्ण ने,किया सूर्य का ध्यान।
पावन मंत्र प्रयोग से,प्रकट हुए  भगवान॥
चौपाई
बोले बेटा जिस चिंता में,तू इतनी जान लड़ाता है।
उसका मोक्ष के लिए मुझको,कुछ साधन नजर न आता है॥
ऐसा कोई व्रत नेम नहीं,जो पाप भार ले जाएगा।
है कृष्ण भागवत ग्रन्थ एक,जो इसे पार ले जाएगा॥
यदि इसकी मुक्ति चाहते हो,तो शुभ सप्ताह विधान करो।
श्रीकृष्ण का गुणगान करो,इस दुखिया का कल्याण करो॥
दोहा १२
यों कहकर ओझल हुए,श्री दिनकर भगवान।
रचा वहीं गौकर्ण ने,शुभ सप्ताह विधान॥
चौपाई
एक सात गाँठ के बाँस पर,उस भाई को स्थान दिया।
फिर वैदिक विधि से यथा समय, सब देवों का आह्वान किया॥
एक ही रोज की गाथा में,यह पौड़ बाँस की टूट गई।
या यों कहिए उतने ही में,यह गाँठ कर्म की छूट गई॥
विधि पूर्वक जब सातवें रोज,पूरा सप्ताह विधान हुआ।
नागेश्वर सोनकेशरी १३
तो सातों गांठें टूट गईं,उस पापी का निर्वाण हुआ॥
आया विमान तत्काल वहाँ, सुरमण्डल ने गुणगान किया।
धुंधुक ने विष्णु रूप पाकर, वैकुण्ठ धाम प्रस्थान किया॥
सब दर्शक चकित-थकित होकर, यह अद्भुत दृश्य निहार उठे।
लेकिन उनमें से कितने ही,यह है अन्याय पुकार उठे॥
हमने उसने एक ही साथ,इस गाथामृत का पान किया।
पर प्रभु ने हमको छोड़ दिया,उस पापी का निर्वाण किया॥
बोला गौकर्ण देखकर यह,बेशक सब बात बराबर हैं।
पर सुनने की सुनते हो तो,सुनने सुनने में अन्तर है॥
जब श्रोता-श्रोता रूप नहीं,कुछ सोते हैं कुछ रोते हैं।
इसलिए कथा सुनने पर भी,फल नहीं एक से होते हैं॥
दोहा १३
अपना-अपना भाव है,अपना-अपना ध्यान।
जितना जिसका प्रेम है,उतना ही कल्याण॥
चौपाई
यदि तुम भी मोक्ष चाहते हो,तो उसी भाँति से मनन करो।
मैं फिर से गाथा कहता हूंँ,तुम फिर श्रद्धा से श्रवण करो॥
विधि पूर्वक सब श्रोताओं ने,फिर से प्रभु का आह्वान किया।
श्रद्धा समेत गाथा सुनकर,वैकुण्ठ धाम प्रस्थान किया॥
निरन्तर जारी…
परिचय-नागेश्वर सोनकेशरी की जन्मतिथि २५ मई १९७५ और जन्म स्थान मंडला(मध्यप्रदेश )है। आपका वर्तमान निवास इंदौर स्थित विजयनगर में है। श्री सोनकेशरी की शिक्षा बी.ए. और कार्यक्षेत्र में सहायक आबकारी आयुक्त (आबकारी विभाग,मध्यप्रदेश)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत संस्थाओं से जुड़कर इंदौर और रतलाम में सेवा देते हैं। आपकी लेखन विधा आलेख है, जिसके प्रेरणापुंज इनके गुरूदेव हैं। आपके इस प्रयास को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख और केन्द्रीय  मानव संसाधन मंत्री भी प्रशंसित कर चुके हैं। सात साल की मेहनत से आपने यह पुस्तक तैयार की है। प्रकाशन में अदभुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) महापुराण आपके द्वारा सरलता से लिखने के लिए गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं वर्ल्ड बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इनकी विशेष उपलब्धि मात्र ६ माह में इस रचना की  ३२०० पुस्तकों का विक्रय होना है। नागेश्वर सोन केशरी की लेखनी का उद्देश्य-भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का प्रचार व प्राप्त राशि से ग़रीब मरीज़ों की सेवा करना है। 

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