अद्भुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा ) भाग -४

नागेश्वर सोनकेशरी
इंदौर(मध्यप्रदेश )
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भाग -४………………………
कथा परीक्षित के गर्भ में रक्षा की
दोहा १
किया समर में भीम ने,कुरूपति पर आघात।
उन्हें शांतिहित द्रोणि ने,की कुचाल विख्यात॥
दोहा (१) पड़े हुए थे जिस जगह, पांचाली के पूत।
जा पहुँचा द्रोणी वहीं,बनकर यम का दूत॥
दोहा (२) हत्यारे ने क्रोध में,काट दिए वे लाल।
उन पाँचों के शीश ले,निकल चला तत्काल॥
चौपाई
डेरों में रक्त बह रहा था,अबला वहीं खड़ी रो रही थी।
द्रोपदी बाल बिखराए हुए,लालों पर पड़ी रो रही थी॥
मोहन के आते ही बोली,नटवर आओ बेबाकी है।
अथवा इस खेल तमाशे में,कुछ और कसर भी बाकी है॥
तुम प्रभु हो हम हैं तुच्छ जीव,यह अपनी-अपनी किस्मत है।
तुमसे मुँह लगकर बात करें,ये कहाँ हमारी हिम्मत है॥
दोहा २
प्रभु बोले-यह ठीक है,पर कुछ करो विचार।
नहीं किसी के भाग्य पर,मेरा कुछ अधिकार॥
दोहा (१)
मानो यदि आज पाण्डव ही,डेरों से अलग न हो जाते।
तो अभी बाप-बेटे सारे,दो टुकड़े पड़े नजर आते॥
दोहा (२)
मैं जितना वचन दे चुका हूँ,अंतिम क्षण तक निभाऊँगा।
सबका बलिदान चढ़ाकर भी, धर्मराज को राज दिलाऊँगा॥
दोहा (३)
बोली पांचाली-करो,ठण्डी मेरी ज्वाल।
इन लालों के बधिक को,ले आओ गोपाल॥
चौपाई
अर्जुन बोले-ठहरो भद्रे,मैं आज नीच को लाऊँगा।
या अपना वचन निभाऊँगा,या मुँह न तुझे दिखाऊँगा॥
यह कहकर अर्जुन और कृष्ण,चल दिए तलाश लगाने को।
मायापति को क्षण भी न लगा, उनका ऋण भी भुगताने को॥
मिल गए राह में द्रोण तनय,पार्थ से वहीं मुठभेड़ हुई।
नागेश्वर सोनकेशरी १७
कुछ देर बात पर बात हुई,फिर हथियारों से होड़ हुई॥
द्रोणी ने संगी शर ताना जिसको,न पार्थ पहचान सके।
मुँह भी न वहाँ पर मोड़ सके,अपना भी धनुष न तान सके॥
दोहा ३
दसों दिशाओं में हुआ,सहसा हाहाकार।
सन्मुख बाणों के हुए,जब प्रभु लीलोद्धार॥
दोहा (१) वह शर,बदन पसार कर, निगल गए गोपाल।
द्रोणी को तब पार्थ ने,बाँध लिया तत्काल॥
चौपाई
बेचारा रथ में बँधा हुआ,नीचा सर किए जा रहा है।
मानो कोई कैदी जबरन,फाँसी के लिए जा रहा है॥
(भीम ने शस्त्र उठाकर कहा-)
ओ नीच,कमान तान फिर तू,देखूँ ताना-बाना तेरा।
बिस्तरा बाँध इस दुनिया से,चुक गया यहाँ दाना तेरा॥
द्रोपदी मुझे जल्दी बतला,कैसे तेरा मन भर डालूँ।
खींच दूं खाल सारे तन की,या टुकड़े -टुकड़े कर डालूँ॥
दोहा ४
गरज रहा था शीश पर,यों ही काल कराल।
पानी-पानी था वहाँ,स्वयं द्रोण का लाल॥
(क्योंकि उसको अजर अमरता का वरदान मिला था,इसलिए प्रभु के बारे में सोचता था कि मुझे तड़पाएंगे,मार तो सकते नहीं।)
(द्रोणी बोला-)
चौपाई-
अपनी चलती भर करणी में,मैंने कुछ उठा न रक्खा है।
अपनी दानिश में इस कुल का, अंकुर भी छिपा न रक्खा है॥
ले चला खूब उस चलती में,जितनी चल सकी हमारी है।
मारो तो न्याय समझता हूँ,छोड़ो तो दया तुम्हारी है॥
दोहा ५
पांचाली यह वचन सुन,तुरत उठी उमगाय।
बोली-बस प्रभु हो चुका,अपराधी का न्याय॥
चौपाई
बलधारी बेबस ब्राह्मण पर,अब क्या हथियार उठाते हो।
जाने भी दो हो चुका दण्ड,क्यों व्यर्थ कलंक लगाते हो॥
मोहन माधव लो इसी समय,मैं अपना मोह त्यागती हूँ।
पर एक अनाथ ब्राह्मण के,प्राणों  की भीख मैं मांगती हूँ॥
१८ अदभुत् श्रीमद् भागवत
दोहा ६
कृष्णचन्द्र कहने लगे,धन्य दुरपद सुकुमारी।
त्याग कथा तेरी सदा,गाएगा संसारी॥
चौपाई
धरणी करणी है थमी हुई,ऐसी सुशील महिलाओं से।
बलवानों की यदि इज्जत है,तो ऐसी ही अबलाओं से॥
दोहा ७
द्रोणी का सिर चीरकर,मणि को लिया निकाल।
लज्जित नीचा सिर किए,निकल चला चाण्डाल॥
चौपाई
बैठ न पाए थे अभी,शांति सहित गोपाल।
फैल गई क्षण मात्र में,विषम बाण की ज्वाल॥
उस ब्रम्ह बाण की विषम ज्वाल, भीतर ही गर्भ जलाने लगी।
उत्तरा देवी काँपती हुई,मोहन को हाहा खाने लगी॥
मामाजी यह क्या गूढ़ भेद,कुछ नहीं समझ में आता है।
हा-हा! प्रभु मेरा गर्भ लाल,भीतर ही जलता जाता है॥
हा-हा! मा-मा! हा-हा मोहन! दासी पर आज दया कीजे।
मेरे जीवन को ले लीजे,पर मेरा गर्भ बचा लीजे॥
मोहन बोले-खल द्रोणी ने,फिर से ब्रह्मास्त्र चलाया है।
इस कुल का मूल मिटाने को,यह अन्तिम चक्र चलाया है॥
दोहा ८
यों कहकर भगवान ने,किया उसे भी पान।
जले हुए उस गर्भ में,डाल दिए फिर प्राण॥
(अब ये कवित्त रूप में है)
छन्द द्वंद्व में दुर्योधन लै भीम चोंट भूमि परौं,
द्रोणी दौरी द्रोपदी के पूतन हने पाप सौं।
बंदी कर पार्थ मात चीर छोड़ दियो ताहि,
यद्यपि ब्रम्हास्त्र साध छरि खल दांप सों।
उत्तरा पुकारी हाय राखो,यदुराय गर्भ,
हरि ने काया माया सो बचायो था ताप सों।
अर्जुन सिंगार भार हरण महितल के प्रगटे परिक्षित सों
चौपाई
प्रभु के प्रताप से उसी गर्भ के,बाद हुए परीक्षित लाल।
कह बिनती आनन्द से,जयति जय कृष्ण गोपाल॥
बोलो जय कृष्ण गोपाल॥
निरन्तर जारी…………..
परिचय-नागेश्वर सोनकेशरी की जन्मतिथि २५ मई १९७५ और जन्म स्थान मंडला(मध्यप्रदेश )है। आपका  वर्तमान निवास इंदौर स्थित विजयनगर में है। श्री सोनकेशरी की शिक्षा बी.ए. और कार्यक्षेत्र में सहायक आबकारी आयुक्त (आबकारी विभाग,मध्यप्रदेश)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत संस्थाओं से जुड़कर इंदौर और रतलाम में सेवा देते हैं। आपकी लेखन विधा आलेख है, जिसके प्रेरणापुंज इनके गुरूदेव हैं। आपके इस प्रयास को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख और केन्द्रीय  मानव संसाधन मंत्री भी प्रशंसित कर चुके हैं। सात साल की मेहनत से आपने यह पुस्तक तैयार की है। प्रकाशन में अदभुत श्रीमद भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) महापुराण आपके द्वारा सरलता से लिखने के लिए गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं वर्ल्ड बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इनकी विशेष उपलब्धि मात्र ६ माह में इस रचना की  ३२०० पुस्तकों का विक्रय होना है। नागेश्वर सोन केशरी की लेखनी का उद्देश्य-भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का प्रचार व प्राप्त राशि से ग़रीब मरीज़ों की सेवा करना है। 

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