अपनी धरा पर बेहाल हिन्दी

निर्मलकुमार पाटोदी

इन्दौर(मध्यप्रदेश)

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हम इतना भी सोचने और मानने को तैयार नहीं हैं कि,हमारे हिन्दी में बोलने भर से अब हिन्दी के पक्ष में बात बनने वाली नहीं है। जब तक सरकार के कामकाज में,न्याय के उच्चतम क्षेत्र में,शिक्षा में भाषा और माध्यम में अंग्रेज़ी रहेगी,कुछ होने-जाने वाला नहीं है। व्यापार,उद्योग और तकनीकी क्षेत्र में अंग्रेज़ी भाषा पूरी तरह से जम चुकी है। हिन्दी समाचार-पत्रों और चैनलों में अंग्रेज़ी की घुसपैठ निरंतर बढ़ती जा रही है। हिन्दी के साहित्यिक प्रकाशनों की संख्या हज़ार दो हज़ार तक सीमित है। हिन्दी के साहित्यकारों को अपनी भाषा के धीरे-धीरे हो रहे क्षरण से कोई सरोकार नहीं है। विभिन्न तकनीकी और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी लेखन लगभग शून्य ही है,क्योंकि प्रकाशन की उपयोगिता नहीं है। चारों ओर हिन्दी मृत्यु शैय्या पर अंतिम सांसे गिन रही है। फिर भी हम हिन्दी वाले समझ ही नहीं पा रहे हैं कि,हम हिन्दीतर भाषाएँ सीखें। क्यों सीखें,क्या उपयोगिता है,अन्य हिन्दीतर भाषाओं को सीखने से ? यह तो राजनीतिक लोगों की स्वार्थी नीति है। राजनीति वालों की कुटिल चालों में हम कब तक आते रहेंगे।
हमारे पचास करोड़ युवा अपनी भाषाओं के दम पर शिक्षित नहीं हुए हैं। उन्हें अपनी भाषा में लिखने-पढ़ने का वातावरण ही नहीं दिया गया है। उनके जीवन निर्वाह की भाषा भारतीय भाषाएँ नहीं रहीं हैं। फिर वे राष्ट्र की भाषाओं को क्यों गले लगाएंगे ? उनके जीवन निर्माण की भाषा `मातृभाषा` या राष्ट्र की प्रमुख भाषा `हिन्दी` नहीं है। हिन्दी की फ़िल्मों के निर्माण में हिन्दी का योगदान सिर्फ धन कमाने तक सीमित रह गया है। वहाँ भी रोमन लिपि में अंग्रेज़ी का साम्राज्य है। हिन्दी फ़िल्मों के प्रमुख कलाकार फ़िल्म समारोह में फ़िल्म की भाषा में नहीं,अंग्रेज़ी में अपनी बात कहते हैं।
अगस्त में मारिशस में ग्यारहवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन होगा। परखिए,पिछले दस हिन्दी सम्मेलनों से हिन्दी कितने क़दम आगे बढ़ सकी है। ऐसे सम्मेलन मौज-मस्ती,पर्यटन के लिए हो रहे हैं। पुस्तकों का विमोचन होता है। मान-सम्मान और पुरस्कार दिए जाते हैं।      सम्मेलन का लक्ष्य हिन्दी का प्रचार-प्रसार नहीं है। पुरस्कृत कौन होते हैं ? हिन्दी सेवी, कदापि नहीं ! ये आयोजन सरकारी जामा पहन चुके हैं। वहाँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार की न योजना बनती है,और न ही क्रियान्वित होने का संकल्प लिया जाता है। करोड़ों रुपयों की राशि हिन्दी के नाम पर स्वाहा होती रही है।
भारत सरकार में हिंदी अधिकारी अधिकार विहीन हैं। उनकी कोई सुनता नहीं है। सरकार के उच्चत्तम शिखर पर आसीन अधिकारी अपना पूरा कामकाज अंग्रेज़ी में बेधड़क होकर करते हैं। सरकार में अंग्रेज़ी की धारा शिखर से प्रवाहित होती है। सरकार की वेबसाइटों में हिन्दी सिमटी हुई है। हिन्दी `राष्ट्रभाषा` नहीं है,नाम मात्र की `राजभाषा` है। भारत सरकार की सभी योजनाओं और उनके ‘लोगो’ के नाम मूल रूप से अंग्रेज़ी में होते हैं। जनप्रतिनिधियों की रुचि देश की भाषाओं को अधिकार दिलाने में नहीं है। बड़े अधिकारी सरकार और प्रशासन के मालिक हैं। उनके आगे राजभाषा समितियों की कोई भूमिका नहीं है। समितियों की भूमिका रपट देने तक ही है।
प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति की पिछले चार साल में बैठक ही नहीं बुलाई गई है।
अपनी भाषाओं को चाहने वाले हम लोग कभी एकसाथ बैठ भी नहीं सके हैं। हमारी अपनी भाषाओं के प्रति तड़प अपने तक सीमित है। हम हस्तीविहीन से हैं।
हमारी भाषाओं के पत्रकारों को प्रकाशन में कोई अधिकार नहीं हैं। मालिक जैसा चाहें,उनके अनुसार क़लम घिसते हैं,अन्यथा उनके लिए दरवाज़े का रास्ता खुला होता है। `नभाटा` अब `एनबीटी` हो गया है। भास्कर,जागरण हो या पत्रिका सभी में अंग्रेज़ी की घुसपैठ बढ़ती जा रही है। व्यावसायिकता के सामने पत्रकारिता और पत्रकार नतमस्तक हैं।
मोदी सरकार के आगे अपनी भाषाओं को सम्मान दिलाने के मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चार सालों में कुछ भी नहीं चल सकी है। मोहनराव भागवत के विचार सरकार के बाहर तक ही रहे हैं। सरकार में उनकी सुनवाई का रास्ता बंद है।
जो व्यक्ति मतदाताओं की भाषा में बोलकर संसद में पहुँचे हैं,वे संसद में अपने मतदाताओं की भाषाओं में अपनी बात नहीं बोलते हैं।

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