अपने-अपने मानसून

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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आसमान जब नीले से काला होने लगता है,सारे कौवे ऊपर देखने लगते हैं। मानसून की संभावना में पंख पसारने लगते हैं। सोचते हैं-इस बार पानी कितना बरसेगा। कौवे समझदार होते हैं। मौसम विज्ञानी भी उनसे कम जानते हैं। जब मानसून की जोरदार संभावना होती है तो वे घोंसला पेड़ पर नीचे की डाल पर बनाते हैं। केवल कौवे ही नहीं,हर कोई नीले आसमान में काली परछाई देखना चाहता है। काली परछाई यानी बादलों का आना,गरजना और बरसना। काले बादल,काले धन का प्रतीक नहीं हैं। काले बादल मानसून का प्रतीक हैं।
मानसून आ रहा है। अखबार और टीवी चैनल बरसने लगे हैं। रोज-रोज बरसते हैं,लेकिन बादल नहीं बरसते। जब बादल बरसते हैं, तो नगर पालिका बहने लगती है। नालियां,नाले बन जाती हैं,नाले,नदी बन जाते,नदी महानदी बन जाती है,लेकिन साथ में भ्रष्‍टाचार बहने लगता है। तेजी से बहने लगता है,लेकिन जांच की प्‍लास्टिक पन्नियां अवरोध पैदा करने लगती हैं। नालियाँ रुक जाती है,भ्रष्‍टाचार नहीं रुकता।
मानसून ने दस्‍तक दे दी है। हर कोई मानसून की तैयारी में, डूबना चाहता है,सराबोर होना चाहता है। मानसून के कई प्रकार हो गए हैं। बाबू का मानसून,लड़की के बाप का मानसून,व्‍यापारी का मानसून, अफसर का मानसून,किसान का मानसून,सबसे ज्‍यादा महत्‍व होता है नेता जी के मानसून का।
सबका मानूसन अलग मौसम में आता है। बाबू का मानसून एक से लेकर पांच तारीख तक रहता है। वह मानसून में महीने भर के लिए खाने का सामान भरता है,बच्‍चों की फीस भरता है,मकान का किराया देता है और अपने लिए एक शर्ट खरीदता है,जिसका वह पिछले छह महीने से इंतजार कर रहा था। इसी मानसून में वह लिया हुआ उधार पटाता है। आश्‍वासन पाता है,जरूरत पड़ने पर दोबारा मिलेगा।
बाबू के मानसून से ही जुड़ा होता है,लड़की के बाप का मानसून। दोनों ही नि‍रीह होते हैं। लड़की का बाप मानसून में दहेज का इंतजाम करता है,लड़का देखने में चप्‍पलें घिसता है,लड़के वालों की चिरोरी करता है और अगर मानसून बिगड़ जाता है तो उसकी लड़की आत्‍महत्‍या करके मर जाती है।
व्‍यापारी का मानसून बारहमासी होता है। इसमें वह सभी प्रकार के कर चुकाता है। `जीएसटी` देता है,लेकिन बिल नहीं देता,ग्राहक से जीएसटी लेता है,लेकिन सरकार को नहीं देता। वह मानसून में नई गाड़ियाँ खरदीता है,भूखंड खरीदता और नौकरों की तनख्‍वाह में कटौती करता है। नए-नए नौकरों को काम सिखाने के बहाने आधी तनख्‍वाह देता है।
अफसरों का मानसून आता नहीं है,उसे लाना पड़ता है। अफसरों में हिन्‍दी अफसरों का कोई मानसून नहीं होता। आयकर के अफसरों का मानसून जुलाई में आता है,पुलिस के अफसरों का मानसून अपराध के आंकड़े के साथ उतरता-चढ़ता है। इनका मानसून अक्सर दिवाली के आसपास ज्‍यादा सक्रिय हो जाता है। मानसून का असर अफसर के विभाग पर निर्भर करता है। मानसून तगड़ा होगा,फसल अच्‍छी आएगी। कुछ विभागों में हमेशा सूखा पड़ा रहता है।
मजदूर का मानसून पांच साल में एक बार आता है। सुबह आता और `मत` डालने के बाद चला जाता है। मानसून में एक समय का भोजन,एक बोतल,पूड़ी-सब्‍जी या क्षेत्र के हिसाब से स्‍वादिष्‍ट भोजन और मतदान केन्‍द्र तक गाड़ी की सुविधा। शाम पांच बजे तक इनका मानसून रहता है और उसके बाद मानसून और मानसून के बादल न तो गरजते हैं,न बरसते हैं और गधे के सींग की तरह पांच साल के लिए गायब हो जाते हैं।
विद्यार्थियों का मानसून परीक्षा परिणाम के साथ आता है और उसी के साथ चला जाता है। जिनका मानसून अच्‍छा रहता है,वे अगली कक्षा में और जिनकी फसल अच्‍छी वे नौकरी पा जाते हैं। साक्षात्कार में असफल हो जाना बादल फट जाने के समान होता है।
मानसून का इंतजार किसान करता है। उसकी निगाहें चातक की तरह ऊपर बादलों में अटकी रहती हैं। उसकी सांस बैंक के कर्ज में फंसी रहती है। मानसून आने के बाद और जाने के बाद किसान,किसान ही रह जाता है। किसान,किसान के अलावा और भी बहुत कुछ होता है। किसान,मजदूर होता है,किसान नेता होता है। किसान नेता,किसानी नहीं करता,वह नेतागिरी करता है। अरबपति होने के बाद भी गरीब किसान ही रहता है। मंत्री या संत्री बने,लेकिन किसान ही रहता है। वह ऐसा किसान होता है,जिसने कभी खेत नहीं देखा,खलिहान नहीं देखा, बैलगाड़ी में नहीं बैठा हो। ऐसा किसान केवल अपने नाम के आगे किसान लगाता है,जिससे सत्‍ता पा सके,उसे भोग सके और किसान के नाम पर `मत` पा सके। असली किसान वही होता है जो आत्‍महत्‍या के शिखर को छूता है और उस पर देश के नेता रोटी सेंकते हैं।
मानसून एक बार आता है। सभी के लिए एक बार ही आता है। मानसून का जितना इंतजार सभी करते हैं,उतना ही इंतजार नेता भी करते हैं। मानसून सत्र का इंतजार करते हैं। हर सत्र में मानसून होता है। हर कोई पिकनिक मनाने आता है। बच्‍चों की तरह हॉल के बीच आ कर कबडडी खेलने लगता है। गुस्‍से में अख़बार फाड़ने लगता है। आपस में बहस करते हैं,माइक फेंकते,कुर्ते फाड़ते हैं,और फिर कक्षा से भाग जाते हैं। ये बादलों की तरह एक माह तक गरजते हैं और फिर बूंदों भरा आश्‍वासन देने के लिए जनता के आगोश में सो जाते हैं।
मानसून सत्र गरजने के लिए होता है,बरसने के लिए नहीं। योजनाओं की खोखली बरसात के लिए होता है,क्रियान्‍वयन के लिए नहीं। मानसून के बाद बाढ़ आए या सूखा मुआवजा पाने के लिए मानसून होता है।
दलों के दल में मानसून फंसता चला जाता है। मानसून भूल जाता है और हर दो माह बाद दिल्‍ली के गोल भवन में इस उम्‍मीद से आ जाता है,शायद इस बार योजनाओं की बरसात होगी,आश्‍वासनों की बाढ़ से राहत मिलेगी,रुपए का कद बढ़ेगा,पेट्रोल का कम होगा, सरकारी कर्मचारियों को जनसेवकों की तरह सुविधाएं मिलेगी।
मानसून आए और सभी के लिए आए,लेकिन ऐसा मानसून किसी के लिए न आए,जिसमें किसान आन्‍दोलन करने में पेड़ से लटक जाए और बेटी जमींदार के हत्थे चढ़ जाए।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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