अपेक्षाओं को सीमित रखें,आकांक्षाओं को नहीं

विशाल सक्सेना
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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हमेशा मानसिक शान्ति प्रकृति प्रदत्त बुद्धिमत्ता का सुन्दर गहना है। दूसरों की भलाई में किया गया हर कार्य कोई कर्तव्य नहीं,बल्कि हमें जीवन में आनंद के साथ-साथ शांति भी प्रदान करता है जिससे हम स्वस्थ भी रहते हैं। इससे हमें सच्ची खुशी का भी अनुभव होता है। किसी भी कार्य में एक छोटा-सा सच्चा प्रयास भी कभी निष्फल नहीं होता,इसलिए हमेशा लंबी-लंबी छलांग लगाने से बेहतर है कि हम निरंतर एक-एक कदम बढ़ाते रहें,जो निश्चित ही एक दिन हमें हमारी मंजिल तक अवश्य पहुँचा देने में सहायक सिद्ध होगा। दुनिया का कोई भी कार्य जो किसी की भलाई के लिए किया जाता है,वह हमारे धर्म व कर्म का सवरूप होता है जो हमारे गुणों को भी प्रदर्शित करता है। अगर हम उस कार्य को कुछ पाने की दृष्टि से करने लगते हैं और अगर वो सिद्ध न हो तो हमारे लिए दु:ख का भी कारण बन जाता है,जिससे हमारे कई संबंध भी खटाई में पड़ जाते हैं जो अनावश्यक तनाव,घुटन व कई अन्य परेशानियों को हमारे लिए खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हमें परिणाम अपनी अपेक्षाओं के अनुसार प्राप्त नहीं हुए। ऐसे में हम तुलना करने लग जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप हम अंधेरी कोठरी में कैद हो जाते हैं,जो कई दुष्परिणाम स्वरूप हमारे लक्ष्य व व्यवहार को बदल देते हैं। इसके विपरीत अगर हम अपेक्षाओं की जगह आकांक्षाओं पर जोर देना प्रारंभ कर दें तो परिणाम भी सकारात्मक होंगे,क्योंकि अपेक्षा और आकांक्षा प्रत्येक सामाजिक व हर वर्ग के व्यक्ति में होती ही है। विदेशों में इस विषय पर पर्याप्त खोज करने का प्रयास भी हुआ है। साथ ही तुलनात्मक अध्ययन के साथ उसकी समालोचनाएँ भी हुई हैं। साधारण व्यक्ति के लिए यह कतई संभव नहीं है कि वो अपेक्षा न करे और खासकर आज की इस दुनिया में,जहाँ हम व दूसरा व्यक्ति भी हमसे अपेक्षा के अनुसार ही संबंधों का निर्माण व निर्वाह कर रहा है। हमारे लिए ये भी जरूरी हो जाता है कि हम एक-दूसरे को समझने के लिए विचारों का आदान-प्रदान सही तरीके से करें व हमारी मंशा एक-दूसरे के प्रति स्प्ष्ट हो। इस स्थिति में अपेक्षा रखना भी जायज होगा,अन्यथा मन मुताबिक कार्य-परिणाम-व्यवहार को भूल जाना ही बेहतर होगा। यकीन मानिए ये बहुत समस्याओं का निदान भी है। दूसरी और हम चाहें तो हमारी आकांक्षाओं को जितना चाहें फैला सकते हैं। अपनी क्षमता अनुसार इसे पाने के लिए मेहनत भी स्वयं को ही करनी होगी और निराशा हाथ लगने पर हम ज्यादा हतोत्साहित भी नहीं होंगे, क्योंकि कारण हमें ज्ञात होंगे।
बहरहाल,अपेक्षा जब पूरी नहीं होती तो हम सिर्फ दूसरों में ही दोष देख पाते हैं,जिसके परिणाम भी हमें ज्ञात हैं,पर शांत,सुखमयी व स्वस्थ सुंदर जीवन अपेक्षाओं का त्याग करके ही सम्भव है,तभी असीम आकांक्षाएं हमारे जीवन जीने की आधारशिला बन सकती है।

परिचय : विशाल सक्सेना का जन्म स्थान शुजालपुर(मध्यप्रदेश) और जन्म तारीख ३०नम्बर १९७७ है। वर्तमान में मध्यप्रदेश के इंदौर में बसे हुए हैं। श्री सक्सेना की शिक्षा-व्यापार प्रबंधन में स्नातकोत्तर सहित सीएफई, पीजीडीएचआर,ग्रेफोलॉजिस्ट,साइबर क्राईम इंवेस्टीगेटर और विश्लेषक की है। 
आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी ( सहायक उपाध्यक्ष-बैंक)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप पीपल फ़ॉर एनिमल में स्थाई सदस्य होने के साथ ही एमनेस्टी इंटरनेशन इंडिया,अखिल भारतीय  एवं अन्य प्रादेशिक संस्थाओं में पदों पर कार्यरत हैं। लेखन विधा-आलेख है,और सामाजिक-आपराधिक विषय पर लिखते हैं। अखबारों और कुछ पुस्तकों में कई लेख छपे हैं। आपको कायस्थ गौरव,रक्त दान के लिए,ईगल आई व कई प्रदेशों के पुलिस विभाग और शिक्षण संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक चेतना व सतर्कता का प्रचार-प्रसार करना है। 
आपके लिए प्रेरणा पुंज-स्वामी विवेकानंद,सरदार पटेल व मेनका गांधी है। आपकी विशेषज्ञता-बैंक संबंधी धोखाधड़ी पता करने और अपराध विवेचना में है। विशाल सक्सेना की रुचि सामाजिक कार्य,लेखन,गीत सुनना,नए विषयों को पढ़ना व साझा करना में है।

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