अबकी जब तुम आना

सारिका त्रिपाठी
लखनऊ(उत्तरप्रदेश)
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अबकी जब तुम आना,
तो भरे हुए बादलों की तरह आना
और खूब बरस कर
सराबोर कर देना मुझे,
अपनी अमृत फुहारों से।
अबकी जब तुम आना,
तो उफनती हुई
किसी नदी की तरह आना,
और बहा ले जाना मुझे
अपनी उद्दाम लहरों के साथ,
सागर मिलन की यात्रा पर।
अबकी जब तुम आना,
तो माँ की तरह आना
भींच लेना मुझे
अपने सीने में,
सुनाना लोरियाँ,कहानियाँ
और सुला देना मुझे थपकी देकर,
फिर से
मीठे सपनों की नींद
अपनी गोद में।
अबकी जब तुम आना,
तो बिछड़े हुए किसी
बाल सखा की तरह आना,
और साथ में लाना
थोड़ा-सा सत्तू,थोड़ा भूजा,कुछ प्याज़
थोड़ी चटनी और गुड़ की ढेरों डलियाँ,
और ले चलना मुझे
बचपन की उन्हीं भूली-बिसरी
गलियों में,
और भर देना मेरे भीतर
वही निश्छल ऊर्जा से
हँसते-खिलखिलाते हुए,
फिर से एक बार।
अबकी जब तुम आना,
तो अपनी दोनों मुट्ठियों में
खूब सारा प्यार लेकर आना,
और मल देना मेरे गालों पर
अबीर की तरह
और चूमकर मेरे होंठों को,
भर देना मेरी रग-रग में
शीरी की पाकीज़ा मिठास।
अबकी जब तुम आना,
तो फिर कभी
न जाने के लिए आना॥

परिचय-सारिका त्रिपाठी का निवास उत्तर प्रदेश राज्य के नवाबी शहर लखनऊ में है। यही स्थाई निवास है। इनकी शिक्षा रसायन शास्त्र में स्नातक है। जन्मतिथि १९ नवम्बर और जन्म स्थान-धनबाद है। आपका कार्यक्षेत्र- रेडियो जॉकी का है। यह पटकथा लिखती हैं तो रेडियो जॉकी का दायित्व भी निभा रही हैं। सामाजिक गतिविधि के तहत आप झुग्गी बस्ती में बच्चों को पढ़ाती हैं। आपके लेखों का प्रकाशन अखबार में हुआ है। लेखनी का उद्देश्य- हिन्दी भाषा अच्छी लगना और भावनाओं को शब्दों का रूप देना अच्छा लगता है। कलम से सामाजिक बदलाव लाना भी आपकी कोशिश है। भाषा ज्ञान में हिन्दी,अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी है। सारिका जी की रुचि-संगीत एवं रचनाएँ लिखना है।

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