अमृतसर रेल हादसा प्रशासनिक लापरवाही

डाॅ.देवेन्द्र जोशी 
उज्जैन(मध्यप्रदेश)

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दशहरा उत्सव के दौरान भगदड़ मचने से अमृतसर में हुए रेल हादसे में ६० से अधिक लोगों की मृत्यु ने एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और भारत की रेल दुर्घटनाओं की ओर अपना ध्यान खींचा है। प्रशासन की लापरवाही और राजनेताओं द्वारा भीड़ जुटाने के लिए नियमों की अनदेखी की तो चर्चा होगी ही लेकिन रेलवे भी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। अगर स्थानीय प्रशासन और रेलवे ने उस स्थल पर जहां प्रतिवर्ष यह आयोजन होता है,तार फेन्सिंग ही करवा दी होती तो यह हादसा होने से बच जाता।  दुनिया के चार बड़े रेलवे नेटवर्क में से एक भारतीय रेलों में प्रतिदिन ३ करोड़ से अधिक यात्री यात्रा करते हैं। ८७ लाख टन माल हर दिन  रेलों के जरिये ढोया जाता है। ६४६०० मार्ग के ट्रैक पर कब जरा-सी चूक रेल दुर्घटना का कारण बन जाए,कहना मुश्किल है, क्योंकि अपनी हर छोटी-मोटी आर्थिक जरूरत के लिए सरकार और वित्त मंत्रालय की तरफ देखने वाले रेल विभाग की यात्री सुरक्षा संबंधी अनेक योजनाएँ सिर्फ इसलिए क्रियान्वित नहीं हो पा रही है,क्योंकि उनके लिए अपेक्षित धनराशि का अभाव है। भारत में प्रतिवर्ष औसतन छोटे-बड़े  करीब ३०० रेल हादसे होते हैं,जिनमें से ज्यादातर की वजह ट्रैक की क्षमता में वृद्धि नहीं हो पाना है। जिस ट्रैक पर ३० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से रेल चलना चाहिए,वहां ११० की गति से रेल दौड़ेगी तो हादसे होना स्वाभाविक ही है। वर्ष २०१६-१७ के दौरान रेल हादसों में १९३ यात्रियों की मृत्यु हुई,जबकि २०१४-१५ में १३१ रेल हादसों में १६८ तथा २०१३-१४ में ११७ ट्रेन दुर्घटनाओं में १०३ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। वर्ष २०१५ में  हुई रेल दुर्घटनाओं में ६० प्रतिशत का कारण रेलों का पटरी से उतरना था। २०१६ में  हुई ८० रेल दुर्घटनाओं में ज्यादातर की वजह रेल ट्रैक के नवीनीकरण का अभाव पाया गया। यदि २०१७ के बड़े रेल हादसों की बात करें तो जनवरी में १,फरवरी में १,मार्च में ३,अप्रैल में ३,मई में १ तथा अगस्त में  हुई २ रेल दुर्घटनाओं में से ज्यादातर  रेल के पटरी से उतरने,बिना फाटक वाले रेलवे क्रासिंग पर वाहन टकराने या रखरखाव के अभाव या इसी जैसे अन्य कारणों की वजह से हुई। अगर धन का अभाव आड़े नहीं आता और रेल पटरियों के नवीनीकरण कार्य को समय पर अंजाम दिया जाता तो इनमें से ज्यादातर रेल दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था |
परिचय–डाॅ.देवेन्द्र जोशी का निवास मध्यप्रदेश के उज्जैन में हैl जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६२ और जन्म स्थान-उज्जैन (मध्यप्रदेश)है। वर्तमान में उज्जैन में ही बसे हुए हैं। इनकी पूर्ण शिक्षा-एम.ए.और पी-एच.डी. है। कार्यक्षेत्र-पत्रकारिता होकर एक अखबार के प्रकाशक-प्रधान सम्पादक (उज्जैन)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप एक महाविद्यालय-एक शाला सहित दैनिक अखबार के संस्थापक होकर शिक्षा,साहित्य एवं पत्रकारिता को समर्पित हैं। पढ़ाई छोड़ चुकी १००० से अधिक छात्राओं को कक्षा १२ वीं उत्तीर्ण करवाई है। साथ ही नई पीढ़ी में भाषा और वक्तृत्व संस्कार जागृत करने के उद्देश्य से गत ३५ वर्षों में १५०० से अधिक विद्यार्थियों को वक्तृत्व और काव्य लेखन का प्रशिक्षण जारी है। डॉ.जोशी की लेखन विधा-मंचीय कविता लेखन के साथ ही हिन्दी गद्य और पद्य मेंं चार दशक से साधिकार लेखन है। डाॅ.शिवमंगल सिंह सुमन,श्रीकृष्ण सरल,हरीश निगम आदि के साथ अनेक मंचों पर काव्य पाठ किया है तो प्रभाष जोशी,कमलेश्वर जी,अटल बिहारी,अमजद अली खाँ,मदर टैरेसा आदि से साक्षात्कार कर चुके हैं। पत्रिकाओं सहित देश- प्रदेश के प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों में समसामयिक विषयों पर आपके द्वारा सतत लेखन जारी है। `कड़वा सच`( कविता संग्रह), `आशीर्वचन`, आखिर क्यों(कविता संग्रह) सहित `साक्षरता:एक जरूरत(अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष में प्रकाशित शोध ग्रन्थ) और `रंग रंगीलो मालवो` (मालवी कविता संग्रह) आदि आपके नाम हैl आपको प्राप्त सम्मान में प्रमुख रुप से अखिल भारतीय लोकभाषा कवि सम्मान, मध्यप्रदेश लेखक संघ सम्मान,केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड सम्मान,ठाकुर शिव प्रतापसिंह पत्रकारिता सम्मान,वाग्देवी पुरस्कार,कलमवीर सम्मान,साहित्य कलश अलंकरण और देवी अहिल्या सम्मान सहित तीस से अधिक सम्मान- पुरस्कार हैं। डॉ.जोशी की लेखनी का उद्देश्य-सोशल मीडिया को रचनात्मक बनाने के साथ ही समाज में मूल्यों की स्थापना और लेखन के प्रति नई पीढ़ी का रुझान बनाए रखने के उद्देश्य से जीवन लेखन,पत्रकारिता और शिक्षण को समर्पण है। विशेष उपलब्धि महाविद्यालय शिक्षण के दौरान राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद स्पर्धा में सतत ३ वर्ष तक विक्रम विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व और पुरस्कार प्राप्ति हैl आपके लिए प्रेरणा पुंज-माता स्व.श्रीमती उर्मिला जोशी,पिता स्व.भालचन्द्र जोशी सहित डाॅ.शिवमंगल सिंह सुमन,श्रीकृष्ण सरल,डाॅ.हरीश प्रधान हैं। आपकी विशेषज्ञता समसामयिक विषय पर गद्य एवं पद्य में तत्काल मौलिक विषय पर लेखन के साथ ही किसी भी विषय पर धारा प्रवाह ओजस्वी संभाषण है। लोकप्रिय हिन्दी लेखन में आपकी रूचि है।

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