अमेरिका में राष्ट्रपति ‘ट्रम्प बनाम मीडिया’ लड़ाई के मायने

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

******************************************************************

अमेरिका के इस अनोखे घटनाक्रम को कुछ लोग चाहें तो भारत के आईने में भी देख सकते हैं,हालां‍कि उसकी सीधे तौर पर तुलना सही नहीं होगी। संयुक्त राज्य अमेरिका के ३५० अखबारों ने अपनी खबरों को फर्जी अौर प‍त्र‍कारों को ‘जनता का दुश्मन’ बताने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आरोपों के खिलाफ गुरूवार को एक साथ संपादकीय लिखे। इसकी पहल वहां के एक प्रमुख अखबार ‘बोस्टन ग्लोब’ ने की थी। इसके समर्थन में वहां के ‘न्यूयाॅर्क टाइम्स’ जैसे अखबार भी अागे आए। इसे वहां `शब्द युद्ध` कहा जा रहा है,जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उल्टे खुद मीडिया पर उनके खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया है।

ट्रम्प विरोधी कुछ संपादकीय तो बुधवार से ही आॅनलाइन दिखने लगे थे। सेंट लुईस में ‘पोस्ट डिस्पैच’ ने संवाददाताओें से ‘सच्चा देशभक्त’ बनने का आह्वान किया,जबकि ‘द शिकागो सन-टाइम्स’ के अनुसार अधिकांश अमेरिकी जानते हैं कि,ट्रम्प अनर्गल बात कर रहे हैं। ‘एनसी ऑब्जर्वर’ के फयेट्टेविल ने कहा कि उम्मीद है कि,ट्रम्प रुक जाएंगे,लेकिन हम ज्यादा उम्मीद लगाकर नहीं बैठे हैं। नॉर्थ कैरोलिना के एक अखबार ने कहा,-‘इसके बजाय,हम उम्मीद करते हैं कि सभी राष्ट्रपति समर्थक महसूस करेंगे कि वह क्या कर रहे हैं। वह जो चाह रहे हैं, इसके लिए वास्तविकता से छेड़छाड़ कर रहे हैं।’ कुछ अखबारों ने अपने मामले को बताने के लिए इतिहास से मिले सबक का इस्तेमाल किया है। ऐसे अखबारों में एलिजाबेथ टाउन पेन से प्रकाशित होने वाली ‘एलिजाबेथ एडवोकेट’ भी शामिल है।‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने भी इस पर टिप्पणी की है।

मीडिया के साथ ट्रम्प की इस आर-पार की लड़ाई के पीछे कारण को पहले समझ लें। ट्रम्प,रिपब्लिकन पार्टी से हैं और शुरू से अपने विवादास्पद बयानों और मनमाफिक कार्य-शैली के कारण मीडिया के निशाने पर रहे हैं। मीडिया और कुछ अन्य

परम्परावादी ट्रम्प के व्यवहार को ‘अपारंपरिक और बयानों को अनर्गल मानता रहा है। राष्ट्रपति पद के ‍लिए चुनाव के दौरान भी मीडिया की आलोचना का केन्द्र थे। इसके पीछे मीडिया के कुछ अपने पूर्वाग्रह भी बताए जाते हैं। यही कारण था कि ट्रम्प का मीडिया की ‘निष्पक्षता’ पर से भरोसा उठ गया। ट्रम्प को लगा कि मीडिया ने चुनाव में उन्हें हराने की सुपारी ले रखी है। उधर मीडिया के एक बड़े तबके को लगता रहा है कि,ट्रम्प की जीत से अमेरिका में कट्टरपंथी ताकतें मजबूत होंगी,जो अमेरिका के उदार चरित्र के विरूद्ध है। बावजूद इसके ट्रम्प चुनाव जीत गए और आज मीडिया की छाती पर मूंग दल रहे हैं। उनका सीधा आरोप है कि मीडिया गलत तथ्यों और अभिप्राय के साथ `फर्जी खबरें` छापता और दिखाता रहा है। यही नहीं,ट्रम्प ने बाकायदा एक ‘फेक न्यूज ट्राॅफी’ का भी ऐलान कर डाला। हालांकि,यह ट्राॅफी किसी को मिली या नहीं,इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

कुल मिलाकर ट्रम्प और अमेरिका के बीच यह मूंछ की लड़ाई है। अमेरिका में करीब डेढ़ हजार अखबार छपते हैं। इनमें से आधे सांध्यकालीन हैं। देश का सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाला अखबार `वाॅल स्ट्रीट जर्नल` है।

वैसे मीडिया द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति की कटु आलोचना और तंज करना कोई नई बात नहीं है। वे इसे अभिव्यक्ति की असंदिग्ध आजादी के रूप में देखते हैं। मीडिया इसे अपना धर्म समझता है। सत्तर के दशक में पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के ‘वाटरगेट कांड’ का खुलासा ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने किया था,लेकिन तब और अब में फर्क यह है कि राष्ट्रपति निक्सन और उनकी सरकार ने ‘ट्रम्प की तरह’ मीडिया को ‘सबक’ सिखाने की नहीं सोची। निक्सन ने पद से इस्तीफा दे दिया,लेकिन ट्रम्प तो डंके की चोट पर कह रहे हैं कि पूरा मीडिया ही फर्जी है। उनकी इस ‘मान्यता’ के पीछे कुछ कारण भी हैं। मसलन राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कुछ अखबारों में खबरें छपीं कि ट्रम्प की जीत में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन का भी हाथ था। एक अखबार ने खबर छापी कि ट्रम्प के राष्ट्रपति बनते ही अमेरिकी बाजार रसातल को चला जाएगा। एक चैनल का कहना था कि ट्रम्प के साथियों ने विकीलीक्स पेपर्स की साइट हैक करने की कोशिश की। हालांकि,इनमें कई खबरें गलत निकली और कुछ में तो मीडिया को माफी भी मांगनी पड़ी,लेकिन ट्रम्प के मन में मीडिया को लेकर गांठ पड़ गई। वे मानने लगे कि मीडिया उनके प्रति दुराग्रह रखता है और वह उन्हें राष्ट्रपति रहते नहीं देखना चाहता।

बेशक ट्रम्प की कई नीतियां अत्यंत विवादास्पद हैं। उनका आचरण,भाषा और संवाद शैली भी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों की तुलना में भिन्न,अपारंपरिक और ‘उज्जड़’ भी है। भद्रता के आदी लोगों को वह कतई रास नहीं आ रहा। मीडिया की दिक्कत यह है कि यह देश ऐसा पहला राष्ट्रपति है जो मीडिया को न केवल खारिज कर रहा है,बल्कि उसे अपने जूते की नोंक पर रखना चाहता है।

बेशक ट्रम्प ने कुछ हद तक ‘मीडिया के मुगालते’ दूर किए हैं,लेकिन वो जो कर रहे हैं,वह भी सही नहीं है। कुछ अपवादस्वरूप घटनाअों के कारण ट्रम्प पूरे मीडिया को ही खारिज किए दे रहे हैं। उनकी चुनाव में अप्रत्याशित जीत के पीछे अमेरिका के स्थानीय कारण ज्यादा हैं। ट्रम्प का मानना है कि मीडिया उन्हें बदनाम करने के लिए फर्जी खबरें ‘गढ़’ रहा है,जबकि मीडिया का मानना है कि यह उसके सम्मान और वजूद की लड़ाई है।

यह ‘ट्रम्प-मीडिया वाॅर’ इसलिए भी अनोखा है, क्योंकि अमूमन अब तक कुछ एक मीडिया संस्थान ही कभी-कभार ही सत्ताधारियों के खिलाफ मुहिम चलाते रहे हैं,लेकिन साढ़े तीन सौ अखबारों अखबारों द्वारा देश के राष्ट्रपति के खिलाफ एक साथ संपादकीय लिखना, वह भी कोई सेंसरशिप आदि के न होते हुए,बहुत गंभीर और सांकेतिक है। यह अभूतपूर्व कदम यह साबित करने की कोशिश भी है कि अखबार वास्तव में ‘जनता की आवाज’ हैं,न ‍कि उनके मालिकों की आवाज। ट्रम्प जनता की आवाज को अपने फायदे के ‍लिए नहीं दबा सकते। वैसे भी अमेरिका अभिव्यक्ति की आजादी का मायका रहा है,तो क्या ट्रम्प को अमेरिका की इस विशिष्टता से भी कोई लेना- देना नहीं है ? क्या उन्होंने मान लिया है कि मीडिया केवल एक ‘धंधा’ है,जिसका प्रच्छन्न उद्देश्य केवल मालिकों के हित साधना भर है ? जनता को गुमराह करना है ? अभिव्यक्ति की अाजादी की अाड़ में अपना उल्लू सीधा करना है ?ट्रम्प की सोच आंशिक रूप से सही हो सकती है,लेकिन इस तरह राष्ट्रपति के खिलाफ मीडिया की सामूहिक लड़ाई ट्रम्प की अवांछनीय उद्दंडता को तार-तार भी कर सकती है,क्योंकि अगर नेता जनसमर्थन का टाॅनिक पीकर खुद को रूस्तम समझने लगें तो उसका उतारा देना भी जनता को आता है,और इसकी पहल मीडिया के आंगन से ही होती है। ‘फर्जी समाचार’ के पीछे साजिश भी हो सकती है,लेकिन ट्रम्प का यह कहना कि मीडिया जनता का प्रतिनिधि नहीं है,इसलिए अस्वीकार्य है, क्योंकि मीडिया भी लोकतंत्र का ही अनिवार्य स्तम्भ है। अखबारों के सामूहिक विरोध-संपादकीयों को डोनाल्ड ट्रम्प भले हवा में उड़ा दें,लेकिन यह पहल न केवल अमेरिकी राष्ट्रप‍ति बल्कि उन तमाम देशों के राजनेताअों के ‍लिए भी एक गंभीर चेतावनी है,जो सत्ता में आने के बाद मीडिया से उनकी मर्जी से चलने की अपेक्षा रखने लगते हैं। ट्रम्प आज हैं, कल चले जाएंगे,लेकिन अगर मीडिया जनता से सच में धोखा करने लगे तो वह हमेशा के लिए रसातल में चला जाएगा। दुआ करें कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ऐसे हालात न बनें।

परिचय-अजय बोकिल की जन्म तारीख १७ जुलाई १९५८ तथा जन्म स्थान इंदौर हैl आपकी शिक्षा-एमएससी( वनस्पति शास्त्र) और एम.ए.(हिंदी साहित्य)हैl आपका निवास मध्यप्रदेश के भोपाल में हैl पत्रकारिता का ३३ वर्ष का अनुभव रखने वाले श्री बोकिल ने शुरूआत इंदौर में सांध्य दैनिक में सह-सम्पादक से की है। इसके बाद से अन्य दैनिक पत्रों में सह-सम्पादक, सहायक सम्पादक और फिर सांध्य दैनिक में सम्पादक रहकर वर्तमान में एक अन्य सांध्य दैनिक में वरिष्ठ सम्पादक के रूप में लेखन यात्रा जारी हैl आपकी लेखन विधा मुख्य रूप से आलेख और स्तम्भ ही हैl पं.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के रूप में कार्यरत हैं,साथ ही `अरविंद की संचार अवधारणा’ पुस्तक प्रकाशित हुई है। प्रकाशन रूप में आपके खाते में कहानी संग्रह ‘पास पड़ोस’ सहित कई रिपोर्ताज व आलेख हैं। मातृभाषा मराठी में भी लेखन करने वाले श्री बोकिल दूरदर्शन,आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन कर चुके हैं। पुरस्कार के रूप में आपको स्व.जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार,मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार,मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान भी दिए गए हैं। विदेश यात्रा के तहत समकालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलम्बो( श्रीलंका)में सहभागिता सहित नेपाल व भूटान का भ्रमण किया है।

Hits: 9

आपकी प्रतिक्रिया दें.