अरहर की दाल के नखरे

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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बधाई हो काकू चाचा,सेवानिवृत्ति के पैसों से सारा कर्ज निपटा दिया। अब न घर पर कर्जा बाकी रहा और न बेटे की शादी में लिया उधार। सही मायनों में ऐश कर रहे हो…। काकू चाचा जिनका तन सूख चुका और मन तो पहले ही महंगाई की मार से,कर्ज की फुफकार से मुरझा गया था। जिंदगी की गाड़ी ढोते-ढोते मुहं के दांत कब चले गए,मालूम ही न चला। चुटकी भर पेंशन को तीन बार जब तक गिन न ले,काकाजी का मन ही नहीं भरता। बिजली,किराना,मकान भाड़ा सारा का सारा हिसाब चंद अंगुलियों पर सिमट कर रह जाता। मजाल है कि  अठन्नी भी बच जाए। महीने के पहले सप्ताह आने वाली पेंशन आठवें दिन का सूरज भी नहीं देख पाती,और छोड़ जाती है महीने भर का ढेर सारा तनाव…।
कल रात ही काका की काकी से खटपट हो गई…। इतना सब करने के बाद भी काकी है कि,खांसती रहती-आज घर में ये नहीं है,आज वो नहीं है। सामने वाले शर्मा जी की थाली में घी को नजरों से चुपड़ती,खुद की थाली को कोसती ही रहती। आखिर करे भी तो क्या,दाल,लूण, नमक-मिर्च के भाव आसमान छू रहे। हर बार बनने वाली अरहर की दाल अब अमीरों की थाली की शोभा बढ़ा रही है। दूध की धार दिन-ब-दिन पतली होती जा रही है। असली घी के दर्शन बरसों पहले हुए थे,जब काकी ने दूध की मलाई से घी बनाया था। महगांई रूपी सुरसा का मुंह इतना चौड़ा हो गया कि,एक बड़ी कॉलोनी विकसित की जा सके। काका की पेंशन कछुआ चाल से चलती,वहीं महंगाई चीते की चाल से सरपट भाग रही है। कोई कहता रूपया ढीला पड़ा तो कोई कहता रूपया कमजोर हुआ,सही भी तो है अगर नोट कागज का होगा तो ढीला भी पड़ेगा और कमजोर भी होगा। वैसे भी इन दिनों हमारे शहर में २-५ के नोट की हालत खस्ता हो चली है,हाथ में नोट लेने से डर लगता है। बीते सालों में अरहर की दाल इतनी इतराई कि मानने को तैयार नहीं,दामों में इतना इजाफा हुआ कि मुनाफा भी शर्मा जाए। वास्तव में हमें भी आदत हो गई है महंगाई को कोसने की। इतना जोर से कोसने के बाद भी मजाल है कि सत्ता पक्ष या विपक्ष कोई ठोस कदम उठाए। हर बार होता यह है कि दाम १० रू. बढ़ाए जाते हैं और फिर नूरा-कुश्ती करते हुए २ रू. घटाकर महगांई कम करने का दावा ठोंका जाता है। सत्तापक्ष लुभाने के लिए दाम कम करता है और विपक्ष अगली बार चुनावी मुददे के रूप में इसका इस्तेमाल करता है। आम आदमी की दाल पतली तो इतनी पतली हो गई कि पूरी पतेली में दो-चार दाने दाल भी मिल जाए तो बहुत है। इस सारे घटनाक्रम में  सत्ता पक्ष हमेशा की तरह उल्ले पर रहेगा,और विपक्ष रोटी सेंकेगा। इस चक्र में बेचारी जनता हर बार की तरह ठगी-सी रह जाती है।
 परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl

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