अर्जुन का शिखंडी सच

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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कृष्‍ण दालान में घूम रहे थे। आज उनका मन उदास नहीं था। राधा से फोन पर बात हो चुकी और इसकी खबर रूक्मणि को भी थी,उसे संजय दृष्टि सम्‍पन्‍न कृष्‍ण ने बना दिया था। सुबह से वह दृष्टि सम्‍पन्‍नता की वजह से मथुरा के बाहरी दृश्‍यों से ओत-प्रोत हो अमरावती की खोज में जुटी थी,जहां से कृष्‍ण ने कभी अपहरण किया था। कृष्‍ण,अर्जुन की प्रतीक्षा कर रहे थे।
पता नहीं आज अर्जुन किस पथ संकट में उलझ गए। अर्जुन तो विशेष मार्ग से भी आ सकते थे। खैर,कृष्‍ण की चिन्‍ता अनुकूल थी। कृष्‍ण ने दायें हाथ की तर्जन को ऊपर उठाया और फिर एक निश्चित कोण बनाते हुए कर्ण के समीप किया और कहा-हे पार्थ आपको आने में १५ मिनट का विलंब हो चला है। कितना समय और पथ पार करने में लगाओगे।
दूसरी ओर से अर्जुन की आवाज गूंजी,-हे वासुदेव पथ संकट नहीं,ना ही किसी कालवश मुझे बाधित किया गया है,बल्कि मैं स्‍वयं को उलझा हुआ महसूस कर रहा हूं। जो समस्‍या हमारे समय में द्रोपदी के साथ हुई थी,उसी तरह की स्थिति सामने दिखाई दे रही है। एक और द्रोपदी का चीर हरण होते देख रहा हूँ। गांडीव का प्रयोग वर्जित है। तलवार चला नहीं सकता,मल्‍ल युद्ध की स्थिति नहीं है। भीम,नकुल सहदेव को सहातार्थ बुला नहीं सकता। वे इस स्‍थान से काफी दूरी पर हैं। स्थिति संकटापन्‍न है। मैं द्रोपदी की रक्षा करना चाहता हूँ,लेकिन पासों की वजह से पांडव अक्षम थे,यहां पांचों की वजह से मैं स्‍वयं को निरीह मान रहा हूं।
हे पार्थ बिना विलंब घटना प्रस्‍तुत करो।
हे वासुदेव। १७-१८ वर्ष की एक कन्‍या बाइक पर जा रही थी। उसे चार पांच बाइक वालों ने लाल बत्‍ती पर घेर रखा है,कोई चुन्‍नी खींचने का प्रयास कर रहा है तो कोई उसके पीछे वाली सीट पर बैठने का प्रयास कर रहा है। वह चीख रही है,लेकिन आसपास खड़े लोग शिखंडि‍यों की तरह देख रहे हैं। कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आ रहा है। मैं अगर हस्‍तक्षेप करता हूँ तो वह प्रशासन का सीधा हस्‍तक्षेप माना जाएगा। वह अधर्म होगा।
हे पार्थ। महाभारत के युद्ध का परिणाम क्‍या था,जो परिणाम आया था, उस अच्‍छे परिणाम के लिए क्‍या आप अपने आपको योग्‍य मानते हैं ?
हे वासुदेव वह तो हमने शिखंडी के बल पर जीता था। अगर मैं शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्‍म पितामह को नहीं मारता तो,वह युद्ध हम कभी नहीं जीत पाते।
हे पार्थ। इंतजार करो। महाभारत का काल बदला,समय बदला है,स्थितियां बदली हैं,हर घर में संजय बैठा है,हर घर में तर्जनी नुमा वाक यंत्र मौजूद हैं,सभी दृष्टि सम्‍पन्‍न हैं,लेकिन आज भी द्रोपदी की रक्षा का भार शिखंडियों पर ही निर्भर है।
हे वासुदेव,आप नहीं आ सकते ? आप उस बाला की रक्षा नहीं कर सकते। आपने जिस प्रकार द्रोपदी की रक्षा की थी,क्‍या आप भी इतने अक्षम हो गए हो, जितना मैं।
हे पार्थ। ऐसा कुछ नहीं है। मैं मछली पकड़कर देने में विश्‍वास नहीं करता। मछली मारना सिखाता हूँ। मैं युद्ध नहीं करता। मैं युद्ध के लिए उकसाता भी नहीं हूं। मैं तो सिर्फ मार्गदर्शन करता हूँ। धर्म की रक्षा के लिए पथ प्रदर्शन करता हूँ। हे पार्थ शिखंडी प्रार्थना करो।
कुछ ही देर में अर्जुन ने देखा। स्‍कूटी वाली कन्‍या को जहां एक ओर बाइक वालों ने घेर रखा था,वहीं उन बाइक वालों को लाल संकेत पर भीख मांगते शिखंडियो ने घेर लिया। एक ने घाघरा थोड़ा उठाकर बताया है,हम तुमसे ज्‍यादा बेशर्म और बदतमीज हैं,एक ने हथौड़ा रूपी हाथ घुमाकर जोरदार रेपट जमा दिया। तीसरे ने एक सुन्‍दर कार्य किया, उसने दो नंबरदारों की बाइक की हवा निकाल दी। मंजर बदल गया। स्‍कूटी वाली लड़की आसानी से निकल गई। बाइक वाले शिखंडियों के हाथ जोड़ते नज़र आए और लाल संकेत पर सतर्क पुलिस उनसे नामा लेकर छोड़ती नजर आई।
हे वासुदेव। आपने सही कहा-स्‍कूटी वाली लड़की को शिखंडियों ने बचा लिया।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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