अर्जुन का संघर्ष विराम

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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हे वासुदेव अब तो युद्ध समाप्‍त हो चुका है। अब क्‍या करना होगा। हे पार्थ जब युद्ध समाप्‍त हो जाता है तो अपनों से युद्ध करना होता है। तुमने भी अपनों से युद्ध किया है,लेकिन वह युद्ध गांडीव के बल पर लड़ा गया। अब जो युद्ध करना है,उसके लिए गांडीव की आवश्‍यकता नहीं है। अब तुम्‍हारा युद्ध उन शक्तियों के खिलाफ है,जो युद्ध के दौरान तुम्‍हारे साथ थीं और वे ही शक्तियां अब तुम्‍हारे खिलाफ रहेंगी। 
हे वासुदेव तो इस स्थिति को कैसे समझा जाए ?
पार्थ इस स्थिति को संघर्ष विराम कहा जाता है। दोनों पक्ष शांत तरीके से छदम युद्ध करते हैं। संघर्ष विराम की आड़ में एक दूसरे के मनोबल और जनता में अपनी छवि बनाने के लिए तत्‍पर रहते हैं। 
हे वासुदेव इस स्थिति में मुझे क्‍या करना होगा ?
पार्थ यह स्थिति सबसे ज्‍यादा भयानक होती है। इस स्थिति में तुम्‍हारे अकर्मण्‍य मन के कारण जो कार्य नहीं हुए हैं, उन्‍हें इस तरह प्रस्‍तुत करना होगा कि यह कार्य तुम्‍हारी वजह से नहीं,बल्कि किसी और कारण से नहीं हो पाए हैं। इसमें तुम्‍हारा दोष लेशमात्र नहीं है। 
हे वासुदेव युद्ध समाप्‍त होते ही हजारों युवक बेरोजगार हो गए हैं। राज्‍य के पास इतना धन नहीं है कि उन्‍हें खाली समय में तलवार भांजने के लिए वेतन दिया जाए। वे अब कृषि योग्‍य भी नहीं रहे। उनमें लड़ने की क्षमता है,लेकिन युद्ध के अभाव में किससे लड़ें ? 
हे पार्थ। यह एक साधारण समस्‍या है,इसका निदान भी आसान है। जो बूढ़े सैनिक हैं,जो अब काम करने की स्थिति में नहीं हैं,उन्‍हें  रोजगार की अब आवश्‍यकता नहीं हैl उन्‍हें कुछ स्‍वर्ण देकर पदमुक्‍त कर दो और उनके स्‍थान पर युद्ध के लिए नए युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दो। बूढ़े सैनिकों के पद रिक्‍त होने से उन्‍हें दिए जाने वाले वेतन से राज्‍य के विकास के छद्म विज्ञापनों पर खर्च करो। 
हे वासुदेव,अचानक युद्ध के समय जब सैनिकों की आवश्‍यकता होगी तो उस समय,युद्ध के अलावा भी अन्‍य कार्यों के लिए सैनिकों की आवश्‍यकता को कैसे पूरा किया जाएगा ?
पार्थ मैं पहले ही कह चुका हूं। इस स्थिति में तुम्‍हें शत्रु पक्ष के योद्धाओं की खरीद-फरोख्‍त कर तथा शिखण्‍डि‍यों के बल पर युद्ध को अपने पक्ष में करना होगा।
हे वासुदेव,इस युद्ध से मुक्ति कब मिलेगी ?
 हे पार्थ,जीवन एक युद्ध है। इस युद्ध में जीवन को जीते रहना ही सतकर्म है। युद्ध घर से लेकर बाहर तक फैला हुआ है। इस युद्ध में अपनी साख और पैसा बचाने के लिए अपनों के खिलाफ ही लड़ना होता है। इस युद्ध में हथियार के रूप में कलयुग के महात्‍मा गांधी की शरण में जाना होगा। उनसे ज्ञानार्जन करना होगा।
हे वासुदेव,उनके युद्ध में विजय होने के बाद तो स्थिति और भयावह हो गई थी।
पार्थ,यही समझाने की मैं कोशिश कर रहा हूं। महात्‍मा गांधी ने जिन हथियारों का उपयोग युद्ध के दौरान किया था, उन्‍हीं हथियारों का उपयोग जब अपनों के लिए करना चाहा तो वे निष्‍फल हो गए। जो युवा उनके साथ थे,वे बूढ़े हो चुके थे। नए युवाओं में आक्रोश था। उनकी इच्‍छाओं का दमन होने लगा था। उनके अधिकारों का बूढ़ों द्वारा दुरूपयोग होने लगा तो,उस आक्रोश के कारण रोष झेलना पड़ा। 
हे वासुदेव,तो क्‍या मेरी मृत्‍यु अटल है!
हां पार्थ,अब तुम्‍हें मरना होगा। यह राजपाट उस जनता को सौंपना होगा जो कभी तुम्‍हारी गुलाम थी। महात्‍मा गांधी में समाए महात्‍मा और गांधी को अलग-अलग करना होगा। महात्‍मा में महात्‍म्‍य (स्‍वांग) और गांधी में रंग बदलने की कला का सृजन करना होगा। धर्म को आगे कर चक्रव्‍यूह तोड़ना होगा। अभिमन्‍यु की मृत्‍यु का कारण भी वही रहा कि,उसने धर्म के अनुसार रंग परिवर्तन नहीं किया। पार्थ तुम्‍हें फिर से युद्ध भूमि में गांडीव का त्‍याग कर धरना-प्रदर्शन-जुलूस का सहारा लेना होगा। अपनी व्‍यवस्‍था के खिलाफ खुद को खटिया पर पड़े रहने का स्वांग करना होगा। 
हे वासुदेव,आपकी भूमिका क्‍या रहेगी ? 
पार्थ,मैं कभी मरा नहीं और न ही कभी मरुंगा। मेरा शरीर मरेगा,मेरी आत्‍मा कभी नहीं मरेगी। मेरा तो बस स्‍वरूप परिवर्तन होगा। मैं कलयुग में जातिय अवतार के रूप में यत्र-तत्र सर्वत्र व्‍याप्‍त रहूंगा। जो मेरे अवतार की पूजा करेगा,मेरे माध्‍यम से जातीय विध्‍वंस की रचना करेगा,वही राजा होगा। मैं विभिन्‍न जातियों में-धर्मों में विभिन्‍न रूपों में पाया जाऊंगा। मैंने तुम्‍हारे साथ युद्ध में हथियार नहीं उठाए और युद्ध से विनाश भी करवाया,उसी प्रकार मैं अब भी हथियार नहीं उठाउंगा और जातिवादी-धर्म युद्ध करवाता रहूंगा। 
हे पार्थ,मेरा तुम्‍हारे युग में प्रेमावतार था,लेकिन इस कलयुग में प्रेम का लोप होगा। जातियता का विस्‍तार होगा। इस युग में,मैं जातिय अवतार के रूप में युगों-युगों तक स्‍मरण किया जाता रहूंगा। 
हे वासुदेव,अब मैं क्‍या करुं ?
अर्जुन,अब तुम जनता में जनता के विरोधियों और जनता के हितैषियों के बीच फूट डालो। तुम्‍हें अनव‍रत शासन की प्राप्ति होगी। 
प्रणाम वासुदेव।  
सत्‍तासीन भव:l   
परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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