अवरोधक जनप्रतिनिधियों का चुनाव बहिष्कार अनिवार्य

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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संविधान निर्माताओं को भविष्य का ज्ञान न होने के कारण वर्तमान में भारतीय मानस को बहुत अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है,उसका मुख्य कारण संविधान निर्माता सैकड़ों की संख्या में थेl जब वहाँ मतभेद और मनभेद रहे तो उसका प्रभाव संविधान पर पड़ा,जिसे `प्रजातंत्र की गीता` कहते हैं,और गीता पूरी राग,द्वेष,क्रोध,मान,माया, लोभ और हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील और परिग्रह से भरी पड़ी हैl इसी गीता के आधार पर राम राज्य की कल्पना की गईl गीता और रामायण दोनों में अत्यंत विरोधाभास है। संविधान निर्माताओं को ये नहीं मालूम था कि,भविष्य के कर्णधार इतने निकम्मे और घटिया मानसिकता के होंगे,अन्यथा वे पहले ही संविधान में कुछ सुधार कर अव्यवस्था की नसबंदी कर देते। संविधान निर्माताओं ने चार स्तम्भ बनाए-विधायिका,न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता,पर पता नहीं कहाँ गलती हुई कि,उन्होंने ये दायित्व भले के दिए थे,लेकिन अपराधी, लुच्चे-लफंगे,हत्यारे,भ्रष्टाचारी,चरित्रहीन और नैतिकता से दूर लोगों का इसमें , आना शुरू हुआ। वास्तव में कुछ जबरदस्त नेता थे और कुछ जबरदस्ती के नेता बन गए। स्वतंत्रता के बाद समाज के लोग नेता चुनते थे,पर लगभग अब उसका उल्टा हुआ और अब नेता समाज से कहता है कि-हम आपके नेता हैं। यहाँ तक तो ठीक था,पर जबसे नेताओं को पद,धन,प्रतिष्ठा और घूस की लत लगी है, तब से राजनीति व्यवसाय बन गया है। हर व्यापार एक निश्चित मापदंड पर रहता है,पर राजनीति असीमित भूख का प्रतीक है। इसमें बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता है। इसमें बहुत लाभ मिलने के कारण चुनाव लड़ने वाले पूरी ताकत से जी-जान लगाकर चुनाव जीतते हैं तो हारने वाला भी पूरी शक्ति से जीतने का प्रयास करता है,किंतु हिंदुस्तान की जनता भेड़िया धसान है,मतलब जहाँ दम वहाँ हम। विगत तीस वर्षों से राजनीतिक क्षेत्र में इतनी अधिक गिरावट आ चुकी हैं कि अब नियम,धरम,चरित्र नैतिकता की बात करना मूर्खता बताती है। हां,चोरी, हत्या,घूसख़ोरी के सिद्धांत पर राजनीति स्थिर है। पहले पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी इस क्षेत्र में आकर अपना योगदान देता था,पर जबसे गुंडों,असामाजिक तत्वों और २ नम्बर का धन खरच करने वाले सिरमौर बन गए,तब से इन्होंने भी हाथ पीछे कर लिए हैं। ‘जैसा बीज,वैसा फल’ या कहें कि,जब गंगोत्री ही अपवित्र हो चुकी तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी। जब उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया तब निम्न स्तर से क्या अपेक्षा रखेंगे। इस मानसून सत्र में प्रधानमंत्री को संसद में बहुमत में होने के बाद सत्र न चलने पर हताशा,निराशा और अकुशलता के कारण दीनता पर उतरते देखा है। जैसे पक्षी के दोनों पक्ष जब तक साथ नहीं देते,वे उड़ान नहीं भर सकते , वैसे ही संसद भी है। संसद में इस समय कोई भी पक्ष असमर्थ रहा है अपनी बात कहने और सुनाने में। सत्ताधारी बहुमत में असहाय रहे हुए तो,विपक्ष एकजुट न होने पर सक्षम विरोध नहीं कर सका और दिन-रात श्वान प्रवृत्ति के दृश्य राज्यसभा, लोकसभा में एवं राज्यों की विधानसभा में भी देखने को मिले। ये सबने खुलेआम देखे और जनता अपनी किस्मत पर रो रही थी,हताश-निराश थी कि,हमने कैसे (ना)लायकों को चुनकर भेजा। जिनका काम अपनी समस्याओं पर देना चाहिए था,वे केकड़ा प्रवृत्ति से एक-दूसरे की टांग खींच रहे थे और पूरा सदन चुपचाप संसद का चीरहरण देख रहा था। द्रोपदी का चीरहरण कौरवों ने किया था,पर वर्तमान में पांडवों ने भी कौरवों का साथ दिया है। संसद की कार्यवाहियां जनता ने खुलकर देखी और हमारे चुने हुए सांसदों का व्यवहार,नंगा नाच देखा-सुना,तब यह बात सुनिश्चित करने का मन है कि,इन चुने हुए सांसदों,विधायकों को इस बार (किसी भी दल के हों)चुनाव में हराओ, उनके चुनाव का बहिष्कार करो या उनकी जगह अयोग्यतम प्रत्याशी को ‘मत’ दें। नया सांसद कुछ तो भय के कारण सामान्य काम में मदद करेगा और वह इतना उद्दंड नहीं होगा। जिस देश का प्रधानमंत्री सत्ता में बहुमत होने के बाद लाचार,निरीह,पंगु बन गया,उससे जाहिर हुआ है कि,वह संसद की कार्यवाही में भाग नहीं लेना चाहते थे,या विपक्ष सत्ता से ज्यादा शक्तिशाली रहा। इसके कारण सत्ताधारी सांसदों ने अपना वेतन और भत्ता त्याग दिया, पर उससे क्या फरक पड़ेगा। इस कारण सत्तापक्ष को अपनी कमजोरी का अहसास हुआ। इसके बदले में कितना गुना पैसा सरकार का संसद संचालन में लगता है,कोई समझने को राजी नहीं है।  इसमें विपक्ष भी कम दोषी नहीं हैं,पर विपक्ष अपने धरम का पालन करता है और पक्ष संसद संचालन में अपनी भूमिका निभाए। इस सत्र से यह समझ में आया कि,सरकार की अपनी भूलें उजागर न हों,उससे बचने के लिए बहिष्कार का सहारा लिया तो विपक्ष कुछ ऐसे मुद्दे को लेकर हठवादिता पर उतारू रहा। इससे जनमानस पर विपरीत प्रभाव पढ़ा। इससे देश के विकास के साथ समस्यायों पर किसी का निराकरण करने का मन नहीं हैं तो क्यों ऐसे असामाजिक सांसदों को चुनाव से मुक्त रखा जाए। इसके लिए हम जागरूक मतदाता ऐसे सांसदों का चुनाव में बहिष्कार करें या उन्हें हराएं, तभी उन्हें समझ आएगी और यही होगा स्वर्णिम भारत का भविष्य। हमारे प्रधानमत्री भाषण और बातें तो बहुत अच्छी करते हैं,पर ४ वर्ष में जनता को जो लाभ मिला है,वो ये है कि,मंहगाईं ने कमर तोड़ दी है। उनकी विदेश यात्रा या कितने देशों से कितनी भीख मांगी और उनको कितना सम्मान मिला या भारत की नाक कितनी ऊँची हुई,इससे जनता को कोई मतलब नहीं। हमारे दाल-चावल ,गेंहू,तेल-शक्कर,पेट्रोल कितना सस्ता हुआ और सस्ता मिले,इससे मतलब नहीं है। आप खूब खाओ या न खाओ,इससे क्या मतलब। ऐसा नहीं है कि,आप या आपका दल दूध का धुला और साफ़ पाक है। चुनाव में धन प्राप्त करना ही मुख्य लक्ष्य होता है,ठीक है खूब कमाओ पर गुंडे सांसदों का चुनाव में बहिष्कार या हराना पहला लक्ष्य और दूसरा मंहगाईं का कम न होना मुद्दा है,इससे आगामी चुनाव में दल की स्थिति धूमिल होगी। सत्ता पार्टी को क्या जरुरत है संसद की बैठक बुलाने की,जनता देखती है नंगा नाच और शरमाती है। सोचती है किसे भेजा किस काम के लिए और,बड़ा दुःख होता है जब नियम बनाने वाले नियम तोड़ते हैं। विगत पांच वर्षों में मात्र शब्द जालों की प्रगति हुई है,व्यापारी रो रहे, बेरोजगार मर रहे,किसान फांसी पर चढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री जबसे प्रधानमंत्री बने  हैं,आज़ादी दूर हो गई है। कुल मिलाकर संसद की इस हलचल ने जनमानस का विश्वास डिगा दिया है,जिस पर सबको ध्यान देना होगा।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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