अवसर

शैलश्री आलूर ‘श्लेषा’ 
बेंगलूरु (कर्नाटक राज्य)
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भगवान की दया,करुणा से सबकी जिंदगी हंसी-खुशी संग अच्छी ही चलती रहती है। भगवान सबको अवसर देता है,पर उसी समय यह भी तय है कि भगवान द्वारा दिया गया भाग्य हमारे नसीब में है या नहीं।
मैं इसलिए यह सब कह रही हूं कि,अवसर मुझे भी मिला था सरकारी नौकरी करने की। भगवान ने वह अवसर मेरी झोली में डाला भी था,पर वह भाग्य मेरी किस्मत से किस तरह छूट गया,यही बताने जा रही हूं।
आजकल सरकारी उद्योग मिलना बहुत ही कठिन हो गया है। आबादी के बढ़ने के वजह से हर क्षेत्र में आज बेहद प्रतियोगिता हो रही है,खासकर शिक्षा के क्षेत्र में।
प्राथमिक और उच्चतर शाला के शिक्षक बनने के लिए सरकार ने डी.एड़.-बी.एड. जैसे पाठ्यक्रम रखे हैं,जिन्हें उत्तीर्ण करने के बाद भी शिक्षक बनने के लिए एक और परीक्षा देनी पड़ती है,जिसे हम सब सी.ई.टी.के नाम से जानते हैं।
बात उस समय की है,जब मैं अपने शहर बादामी में शिक्षिका का कार्य कर रही थी,मगर निजी शाला में। निजी शाला में पढ़ाते ही मैंने एम.ए. की,और एम.फिल.भी कर रही थी। तब सालों बाद मेरा शालाओं में शिक्षक भर्ती के लिए सरकार द्वारा पत्रिका में खबर सुनकर खुशी का ठिकाना न रहा। मन-ही- मन सोचने लगी `चलो इस बार कड़ी मेहनत कर सी.ई.टी. परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सरकारी उद्योग पा लूं तो आराम से रह सकूंगी।`
मैं शाला जाते हुए भी बहुत अध्ययन करने लगीl हो न हो,इस बार तो मुझे नौकरी लेनी ही थी। आखिर परीक्षा का दिन आ ही गया। मैंने परीक्षा भी बहुत अच्छी की, खासकर हिंदी परीक्षा तो बहुत ही आसान लगा। मुझे लगा, इस बार मेरी नौकरी पक्की है।
कुछ दिनों बाद मेरी एम.फिल. की परीक्षाएं आने के कारण हफ्तेभर शाला से छुट्टी लेकर मैं विजयपुर गई, जो बादामी से ४-५ घंटे का रास्ता है। वहां जाकर जब दो दिन हुए थे,तभी सरकारी शिक्षकों की चयनित सूची छोड़ी गई। जब मैं शाम को परीक्षा खत्म करके घर पहुंची तो मेरे साथ काम करने वाले शिक्षक का फोन आया और उन्होंने कहा कि हमारे शाला में काम करनेवाले सभी शिक्षकों में से किसी का भी चयन नहीं हुआ है। आप भी आपका परिणाम जल्दी देख लीजिए,और कहिए कि क्या हुआ। मैं अंदर ही अंदर डरने लगी कि,क्या हुआ होगा। सबका नहीं हुआ है तो शायद मैं भी!!…इसी डर से मैं सो गई। मेरे पास तब मेरे परीक्षा के हाल टिकट का नम्बर भी नहीं था। परीक्षा के कारण शहर से दूर रहने के कारण हाल टिकटघर में ही था।
परिणाम के अगले दिन से ही चयनित शिक्षकों के प्रमाण-पत्रों की सत्यापन शुरू हो गए थे। यह सब होने के चार दिन बाद मैं बादामी लौटी और हालटिकट का नम्बर लेकर कम्प्यूटर की दुकान गई तो पता चला कि,मेरा नाम चयनित सूची में हैl वाहहह…मैं सरकारी नौकरी के लिए चयनित हो गई थी,वह भी बहुत अच्छे अंक लेकर। सूची में सातवें क्रम पर मेरा नाम था। बिना किसी जाति,वर्ग के सामान्य प्रावीण्य सूची में ही मैं चयनित हुई थी,पर अफसोस कि मेरे हिंदी विषय का सत्यापन होकर ३ दिन हो गए थेl मैं भैया के साथ बेंगलूर पहुंची,जहां चयनित लोगों का सत्यापन चल रहा था। उस दिन अंतिम दिन था,और मुझे कल आने को कहा गया।
दूसरे दिन जब मैं समय पर वहां पहुंची,तो मेरा भी सत्यापन हो गया। मैं खुश होकर बादामी लौटी। दूसरी बार भी मैं अंतिम सत्यापन के लिए गई,वह भी सफल रहा। मन में खुशियां थींl एक महीने बाद जब आदेश देने के लिए बुलाया गया तो सूची में मेरे नाम के आगे एक सितारे का निशान था,जो मैं समझ नहीं सकी। जब मैं आदेश लेने गई तो वहां के सूचना फलक की सूची में भी मेरे नाम के आगे सितारा था। सबको आदेश दिए जाने लगे,पर मुझे नहीं बुलाया गया। वहां पर सितारा पाए हुए और भी बहुत से लोग थे। हम सब एक जगह पर एकत्रित होकर शाम तक वहीं खड़े रहे। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था। साथ में डर भी लगने लगा कि आदेश देंगे भी,या नहीं। हम सबने मिलकर जब वहां के अधिकारियों से पूछा तो कहा गया-`आप सब लोग समय पर सत्यापन नहीं किए हो,इसलिए आपको छोड़कर सबको आदेश मिल गया है। आप सब थोड़े दिन तक सब्र करें,आप सबके बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा। फिलहाल आप अपने शहर लौट सकते हैं।`
यह सब सुनकर मुझे ऐसा लगा,जैसे ख्वाबों की दुनिया से किसी ने मुझे धक्के मारकर बाहर निकाला हो। वहां पर रोकर भी कोई फायदा नहीं था। घर,शहर जाने का मन भी नहीं कर रहा था। लगा यहीं कहीं आत्महत्या करके मर जाऊं…पर मां-पिता के संस्कार याद कर वापस घर लौटीl सबको हैरानी थी कि ऐसे कैसे हो गया। सबने कहा कि,आप लड़िए,नौकरी मिल जाएगी,पर लड़ने के लिए बार-बार बेंगलूरु जाने के लिए मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। मजबूर होकर धीरे-धीरे उस नौकरी को भूलना पड़ा। तब मुझ पर क्या गुजरी है,ये मैं ही जानती हूँ। फिर उसी निजी शाला में काम करना पड़ा।
इस बात को गुजरे ४ साल हो गए,पर वह दर्द जो मैंने उस समय महसूस किया है,वह मेरे बैरी को भी न आए। भगवान ने अवसर दिया था,पर किस्मत ने साथ नहीं दिया। अब मैं पी.एच-डी कर चुकी हूं,शादी हुई है। फिर परीक्षा दे सकती हूं,पर वह घटना भूल नहीं सकती। आज भी यह घटना याद आती है तो मन मसोसकर रह जाती हूं।

परिचय-शैलश्री आलूर का साहित्यिक उपनाम-श्लेषा हैl आपकी जन्मतिथि २ सितंबर तथा जन्म स्थान-बादामी हैl वर्तमान में आप देवीनगर(बेंगलूरु)में निवासरत हैं,और यही स्थाई पता भी हैl कर्नाटक राज्य की निवासी शैलश्री आलूर ने एम.ए. और बी.एड. सहित एम.फिल. तथा पी.एच-डी की शिक्षा भी हासिल की है। आपका कार्य क्षेत्र-प्रौढ़ शाला में हिंदी भाषा शिक्षिका का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप अनेक कवि सम्मेलनों में भागीदारी करके सम्मानित हो चुकी हैं। आपकी लेखन विधा-तुकांत-अतुकांत,हाईकु,वर्ण पिरामिड,कहानी, लघुकथा,नाटक,संस्मरण,लेखन,रिपोर्ताज और गीत आदि है। आनलाइन स्पर्धा में आपको महादेवी वर्मा सम्मान(संस्मरण के लिए),प्रताप नारायण मिश्र सम्मान सहित खुर्रतुल-ए-हैदर सम्मान,मुन्शी प्रेमचंद सम्मान भी मिला हैl आप ब्लॉग पर भी कविताएं लिखती हैं। विशेष उपलब्धि एक मंच द्वारा `श्लेषा`,दूसरे मंच द्वारा `लता` उपनाम अलंकरण तथा `श्रेष्ठ समीक्षक` सम्मान मिलना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन की भावनाओं को कलम का रूप देना,साहित्य के जरिए समाज में प्रगति लाने की कोशिश करना और समाज में व्याप्त समस्याओं को बिंबित करके उनका हल करना हैl

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