असली सौन्दर्य

मानकदास मानिकपुरी ‘ मानक छत्तीसगढ़िया’ 
महासमुंद(छत्तीसगढ़) 
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जब यह तन अचल होता है,
तभी मन का भ्रम मिटता है।
वह चमक-दमक वह चिकनी चमड़ी,
सिकुड़ फूलकर बेढंग दिखता हैll

सारे लेप इत्र की खुशबू,
पल-पल तन से दूर हटता है।
तब चूमने वाला होंठ भी,
उल्टी पर उल्टी करता हैll

सत्य समझ आता है उसी दिन,
जब सारा तन गंदा दिखता है।
भीतर हाड़-मांस के लोथड़े,
जीवात्मा को भी अजीब लगता हैll

अंतर्मन से असली सौन्दर्य की कोई,
मन ही मन परिभाषा लिखता है।
कर्म व्यवहार चरित्र है असली सौन्दर्य,
युगों-युगों तक वही टिकता हैll

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