अस्तित्व

सोनू कुमार मिश्रा
दरभंगा (बिहार)
*************************************************************************
अस्तित्व के साथ खिलवाड़ का,खेल खेले हर कोई,
पर वह खेल जीत ना सका,सर पटक-पटक कर रोये।
सर पटक-पटक कर रोये,जब सूरज बरसे आग,
कट रहे छंट रहे मिट रहे वृक्ष तो,कैसे बरसे बरसात।
जीव-जंतु रोये निसदिन छूट गए हैं रूठ गए हैं पंचतत्व,
वह मनुज भला मनुज कहाँ जो मिटाने चले अस्तित्व॥
अस्तित्व भला कहाँ बचे जब,ऑक्सीजन का क्षय हो जाये,
बढ़े कार्बन डाई ऑक्साइड,जीवन में रोगों का भय हो जाये।
रोगों का भय हो जाये,बढ़ते जलवायु परिवर्तन से,
जीवन पर खतरा मंडराए,नित होते विकास के समर्पण से।
जब प्रकृत विस्मय में रहे,खतरे में हो स्वामित्व,
तो भला बताओ कैसे बचेगा,मनुज तेरा अस्तित्व॥
अस्तित्व पर जब खतरा,पाश्चात्य का छाया हो,
देख बढ़ता स्वरूप जब,भारतीय सभ्यता घबराई हो।
भारतीय सभ्यता घबराई हो,विश्व शांति कैसे साकार होगी,
वसुधैव कुटुम्बकम की विचारधारा,तब कैसे आकार लेगी।
खतरे की घण्टी बजेगी,खतरे में होगा सम्प्रभुत्व,
मानव ही मानव से शत्रुता करे,खतरे में होगा अस्तित्व॥
अस्तित्व बचाना है,हरियाली बचानी होगी,
संस्कृति सभ्यता देशज,उसको फिर अपनानी होगी।
उसको फिर अपनानी होगी,कलम की धार से,
सींचना होगा धरा को अम्बुज से,रक्तधारा गवानी होगी।
अनुशासन मानवीयता का अपना,बचाना प्राणी का भविष्य,
तब जाकर कहीं फलेगा-फूलेगा, फिर मानव का अस्तित्व॥
परिचय-सोनू कुमार मिश्रा की जन्म तारीख १५ फरवरी १९९३ तथा जन्म स्थान दरभंगा(बिहार )है। वर्तमान में ग्राम थलवारा(जिला दरभंगा)में रहते हैं। बिहार राज्य के श्री मिश्रा की शिक्षा -स्नातकोत्तर(हिंदी) है। आप कार्यक्षेत्र में शिक्षक हैं। सामाजिक गतिविधि के तहत समाजसेवी हैं। लेखन विधा-कविता है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक चेतना जागृत करना औऱ वर्तमान में मातृभाषा हिन्दी का प्रचार करना है। 

Hits: 8

आपकी प्रतिक्रिया दें.