आँसू

विजयकान्त द्विवेदी
नई मुम्बई (महाराष्ट्र)

**********************************************

अश्रु नयन के मोती हैं,
नाहक नहीं गिरा लेना।
गहन वेदना के मरहम हैं,
काम है मन सहला देना॥
ये पीड़ा के नहीं पक्षधर,
हैं पीड़ित के बेबस हथियार।
निकले नयन से मन मथ कर,
आँसू व्यथित हृदय के भार॥
हृदय-घाव पर उठे फफोले,
वाष्पीकरण होकर गिरते।
निकले जहाँ दर्द वही जाने,
जो जन जब सहन  करते॥
व्यथा कथा कह जाते मन की,
अश्क नयन के बन  शबनम।
गिरकर गुप्त रहस्य खोलते,
अन्तर प्रदाह पीड़ा घुटन॥
कभी निकल पड़ते हैं आँसू,
हो भक्ति भाव में आत्म विभोर।
अतिशय हर्षोल्लास में आँसू,
उमड़ उठते हैं दृग-कोर॥
आँसू सहज वेदना-बोधक,
युगल नयन में किए मुकाम।
मानव शिला खण्ड बन जाता,
अश्रु ना जो देते भगवान॥
उमड़े कई बार भूमि पर,
रक्तिम अश्रु के सैलाब।
उजड़-उजड़ कर बसी,
दुनिया फिर से हुई आबाद॥
परिचय-मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि मोतिहारी चम्पारण (बिहार) है। आपने प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में प्राप्त की है। फिर स्नातक (बीए)बिहार से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान से सेवा के दौरान ही किया। श्री द्विवेदी का कार्यक्षेत्र भारतीय वायुसेना रहा है। आप वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई (महाराष्ट्र) स्थित खारघर में स्थाई निवासरत हैं। किशोरावस्था से ही कविता रचना में आपकी रुचि रही है, तथा हिन्दी में कविता एवं गीत लिखते हैं। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’(दिल्ली से १९८४) प्रकाशित हुआ है। रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आपको सम्मान के रुप में नई दिल्ली सहित अन्य प्रकाशन और संस्थाओं से साहित्य की सेवा के लिए सम्मान मिले हैं। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव रखने वाले श्री द्विवेदी की लेखनी का उद्देश्य-संस्कृत की तरह हिन्दी भी तिरोहित नहीं हो जाए,और अरबी ऊर्दू में नहाकर हिन्दी के नाम पर छा नहीं जाए,जो भारतीत संस्कृति पर धीमें जहर की तरह असरकारी होकर और अधिक हावी न हो। आप हिन्दी में साहित्य के पुरोधाओं .स्व.श्री मैथिलीशरण गुप्त,श्री दिनकर,श्री पन्त श्री निराला,श्री प्रसाद,श्री बच्चन और माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रव्यापी साहित्यिक वैचारिकता को प्रश्रयदेकर साहित्य को समृद्ध करने के पक्षधर हैं।

Hits: 24

आपकी प्रतिक्रिया दें.