आत्मावलोकन

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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दोहा:
रूप रंग धन बल नहीं,नहिं बल बुद्धि सुजान।
सुर सुघड़ न लेखनी,न लेखन  को  ज्ञान॥
चौपाई:
रूप-रंग धन बल के मारे,
बबुआ कुछ न पास हमारे।
फटे बाँस सों कण्ठ हमारो,
नेह सुधारस एक सहारो।
लेखन को भी ज्ञान नहीं है,
शब्दन की पहचान नहीं है।
जोड़-तोड़ कर गीत बनावहुं,
चाह यही बस तोहि रिझावहुं।
जब-जब पायो प्यार तुम्हारो,
निज गीतन माँ सब भरि डारो।
हमरे पास कछू न भईया,
नाव हमारी तुम्ही खेवईया।
तुम लेखन के भूप सरीखे,
तुम्हें देख हमहूँ कुछ सीखे।
गीत तुम्हारे परम पुनीता,
जैसे तुम रच दीन्ही गीता।
सूर निराला शीश नवाऊँ,
तुलसी मीरा के गुण गाऊँ।
कबीरा सह रसखान सुहाए,
प्रिय रहीमजी अति मन भाए।
और मैथिली दिनकर भारी,
सतसैया को कहें बिहारी।
उक्त कविगण गुरू हमारे,
नेह नयन के सब ही तारे।
अब को कहाँ रह्यो जग माहीं,
प्रियवर तुमहू तो कम नाहीं।
तुमने मोंसों नेह जतायो,
पटल हमारो अति मन भायो।
नमन मित्रगण आपको,प्रीत पुनीता प्यार,
अभिनन्दन है आपका,नेह-स्नेह आधार।
परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है। 

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