आधुनिक युग में हिन्दी उपेक्षित क्यों ?

राजेश पुरोहित
झालावाड़(राजस्थान)
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हिन्दी हमारी राजभाषा है। ये जन-जन की भाषा बने,इस हेतु हम सभी प्रयासरत हैं। आज़ादी के ७२ वर्ष के बाद भी हिन्दी उपेक्षित है। आधुनिक युग की भाषा अंग्रेजी बनकर रह गई है। पूरे राष्ट्र को एक करने के लिए जिस भाषा का आज़ादी की लड़ाई में प्रयोग किया,वह हिन्दी थी। आज हम हिन्दी बोलना पसन्द नहीं करते हैं। हम सब दोषी हैं,हम अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में हमारे बच्चों को मोटा शुल्क देकर पढ़ने भेजते हैं। जब वही बच्चा अंग्रेजी कविता सुनाता है तो हमें गर्व होता है। हम प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाते हैं,वक़्ता मंच पर जो विराजित रहते हैं उनके पुत्र भी अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में पढ़ते हैं। वही मंच पर बड़े-बड़े भाषण देकर कहते हैं हिन्दी बोलो। अपने बच्चों को हिन्दी में पढ़ाओ। अरे हम कहाँ तक झूठ बोलेंगे। हिंदी उपेक्षित नहीं रहेगी तो क्या होगा!
“सबकी जुबान पर जब अंग्रेजी होगी,
फिर कैसे उनन्त हमारी हिंदी होगी।”
आज हम पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने लगे हैं। जूते पहनकर खड़े खड़े भोजन करना। गिट-पिट अंग्रेजी बोलना,किटी पार्टी,टी-पार्टी,ये सब क्या है ? इससे क्या हिंदी समान्नित होगी। आज विवाह होता है,निमंत्रण पत्र अंग्रेजी में छपे होते हैं। सभी काम ऑनलाइन हो रहे हैं। व्यक्ति डिजिटल युग में जी रहा है। हिंदी कहाँ है अब। अंग्रेजी का बोलबाला चारों ओर दिखता है।
बड़े समारोहों में हिंदी भाषी को मंच नहीं दिया जाता। देश के नेता-अभिनेता दूरदर्शन आकाशवाणी के साक्षात्कार में हिन्दी कम अंग्रेजी अधिक बोलते हैं। उन्हें गर्व होता है। लोग हमसे कितने प्रभावित होंगे,हमें अंग्रेजी बोलना होगी, ये उनकी सोच बन गई है।
हिन्दी आज भी राजभाषा है,राष्ट्रभाषा नहीं। हिन्दी १५० विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है,लेकिन हमारे देश में उपेक्षित है। भारतेंदु ने कहा था-
“निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा के,मिटत न हिय को सूल॥”
जिस देश की भाषा प्रगति पर है,वह देश उन्नति करता है। हिन्दी राजभाषा सम्पर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के तौर पर देश को एकता के सूत्र में बांध सकती है। आज अहिन्दी राज्यों ने हिन्दी भाषा के आयोजन करना प्रारम्भ कर दिया है,जो हम सबके लिए खुशखबरी है। हिंदी भाषा लोक भाषाओं की विशेषताओं से सम्पन्न होती है। हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है। मात्राएं,स्वर व्यंजन,अनुस्वार आदि देवनागरी में सम्मिलित हैं। हिंदी सीखना आसान है। भाषा में वर्ण,शब्द, वाक्य संरचना आदि सरल तरीके सेसीख सकते हैं।
आज कम्प्यूटर के युग में  हिंदी का प्रचलन समाप्त हो रहा है। हिंदी विदेशी सीखने लगे हैं,लेकिन अपने देश के लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। वार्तालाप के दौरान अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग देखा जा सकता है।
रोजमर्रा के काम में हम अंग्रेजी का प्रयोग करने लगे हैं। आज हिंदी दोयम दर्ज़े की भाषा बन गई है। १४ सितम्बर  १९४९ को संविधान ने हिंदी को राजभाषा घोषित किया। आज हम सुबह उठते ही एक दूसरे से ‘गुड मॉर्निंग’ बोलते हैं। ‘सुप्रभात,शुभ प्रभात’,ये शब्द अब सुनाई नहीं देते। जब दोपहर होती है ‘गुड नून’,शाम ढलते ही ‘गुड इवनिंग’ एवं रात होते ही ‘गुड नाईट।’ ये सब हम ही बोलते हैं। हिन्दी की उपेक्षा का कारण हर वह व्यक्ति है,जो भारत में रहकर भी हिंदी नहीं बोलता,न ही हिंदी लिख पाता है। आज हमारे बच्चे न अंग्रेजी ठीक से बोल सकते हैं,  न हिन्दी का शुद्ध उच्चारण करते हैं।
हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि कबीर,तुलसी,सूरदास,रसखान,बिहारी के साथ ही सभी कवियों ने हिन्दी में ही साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया। हमारे शास्त्रों की भाषा हिंदी है। हम स्वयं की भाषा का कैसे त्याग कर सकते हैं। बच्चा जब छोटा होता है सबसे पहले ‘माँ’ बोलता है,जो हिंदी का शब्द है।
आज हिन्दी वैश्विक स्तर पर सम्मान पा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रधानमंत्री हिंदी में भाषण देते हों,लेकिन आज भी हिंदी उपेक्षित है। हिंदी भाषा जन-जन की भाषा तभी बनेगी,जब हिंदी का प्रचार-प्रसार होगा,हर क्षेत्र में हिंदी लिखना व बोलना सरकार अनिवार्य न कर देगी।
आज हिन्दी सीखकर विदेशी शोध कर रहे हैं। हमारे देश की सभ्यता व संस्कृति सीख रहे हैं। हिंदी से फायदा लेकर भारतीय संस्कृति के मुख्य विषय योग सीखने लगे हैं, लेकिन हम अपने ही घर में अंग्रेजी के मोह में पड़े हैं। हिंदी अभी भी वीर विहीन और विचार विहीन नहीं हुई है,बस इतना ध्यान रखें। हिन्दी का प्रचार-प्रसार स्वामी दयानंद व महात्मा गांधी ने गुजरात में  किया था। सुभाषचन्द्र बोस व रवींद्रनाथ टैगोर ने बंगाल में किया था। तिलक ने महाराष्ट्र में हिंदी का प्रचार किया। जब अंग्रेजों का शासन था,कड़ा पहरा था। अंग्रेज यातना देते थे। ऐसे समय में हमारे क्रांतिकारियों ने हिंदी का प्रचार कर दिया था तो आज हम क्यों नहीं कर सकते। आज तो हम आजाद हैं। आइए,हिंदी का प्रचार करें। स्व.अटल बिहारी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में अपना भाषण दिया था। आज हमें उनके बताए मार्ग पर चलना होगा।
“आओ हिन्दी का,मिलकर हम सम्मान करें।
बोले हिन्दी,लिखें हिंदी,हिंदी में ही हर काम करें॥ ” 

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