आपातकाल…अनुशासन पर्व जरुरी

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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भारतवर्ष विदेशियों द्वारा लगभग २००० वर्ष गुलाम रहा। सन १८५७ के ग़दर से लेकर १९४७ तक संघर्षरत रहकर गुलामी से मुक्त हुए। हम स्वतंत्र होकर स्वच्छंद हुए। कोई भी व्यक्ति अनुशासन नहीं चाहता। बच्चा आज ६ माह के बाद मनमानी करना शुरू कर देता है। आज बच्चे से आप टी.वी. का रिमोट या मोबाइल या उसकी मनचाही वस्तु को छुड़ाकर देखो…। अनुशासन यानि नियंत्रण,हर व्यक्ति अपनी स्वंत्रता में बाधा नहीं चाहता। अच्छी बात यह होती है कि उसे स्वयं जानकारी नहीं होती कि वह स्वच्छन्दता कर रहा है या नहीं। ऐसा नहीं कि बालक  ही  अनुशासनहीनता करता है,वरन सब करते हैं। इसका उदाहरण स्वयं आज अपने घरों में देख लें। क्या आप अपने घर में अनुशासनहीनता बर्दाश्त करते हैं,जब परिवार में नहीं सहन करते हैं तो समाज,देश और राजनीतिक दल क्यों बर्दाश्त करें। क्या हम अनुशासन प्रिय नहीं होना चाहते या सिर्फ प्रवचन,भाषण तक सीमित हैं..कर्म में नहीं उतारना चाहते। फिर क्यों अनुशासन की वकालत करना चाहते हैं ?
यदि एक दृष्टिकोण से समझें तो हम आज स्वतंत्र होते हुए भी नियमों से परतंत्र या गुलाम हैं। क्या आज हम मनमानापन नहीं कर पा रहे हैं या हम नियमों के अधीन नहीं रह रहे हैं। क्यों हम बाएं हाथ से चलते हैं,कारण नियम बनाए गए हैं हमारी सुविधा,सुरक्षा के लिए। यदि हम उलटे चलेंगे तो दुर्घटना के अवसर बढ़ जाते हैं और नियम भंग होने पर दंड के अपराधी होते हैं।
आज वर्तमान में भी हम अनुशासन पर्व या अप्रत्यक्ष्य में आपातकाल में नहीं रह रहे हैं। जैसे किसी कैदी को लोहे की हथकड़ी न पहनाकर सोने की हथकड़ी या बेड़ियाँ पहना दो,तब भी वह बेड़ियाँ या हथकड़ी नहीं कहलाएंगी क्या ? जैसे वर्तमान में समाचार-मीडिया सिर्फ शासन के विरुद्ध अधिक समाचार प्रकाशित नहीं कर पा रहा। मात्र सत्तासीन शासक  की भारी प्रशंसा का उद्यम बना हुआ है। कहीं भी विरोध हुआ,तो उसके ऊपर अनेक हथकंडे अपनाकर उसे दोषी बनाकर कार्यवाही करते हैं,जो नियमानुसार की श्रेणी में आते हैं।
आपातकाल में भी संविधान में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था,मात्र उनका क्रियान्वयन किया गया था। उसके कारण जो असंवैधानिक या नियम विरुद्ध कार्यवाही में लिप्त रहे,उनको कष्ट रहा बाकी उस समय भी समय से काम होना,रेलगाड़ियां समय पर चलती थी। कर्मचारी समय से नौकरी करते थे और जीवन शैली में एक नवीनता का संचार हुआ। कष्ट उनको ही रहे,जिन्होंने नियम विरुद्ध कार्य किए थे,पर हम लोगों के  स्वच्छंदता के पोषक होने से वह समय अपचनीय रहा। क्या आज भी सरकार अनुशासन हीनता पसंद कर रही है ? आज सत्ता के पास मजबूत समर्थन होने से वह भी वे ही कदम उठा रही है,जो पूर्व में सरकार ने उठाए थे। उस समय आपातकाल घोषित था तो आज अघोषित है। उस समय इंदिरा गाँधी घोषित तानाशाह थी तो आज मोदी अघोषित तानाशाह के रूप में जाने जाते हैं। उस समय इंदिरा गाँधी दुर्गा के अवतार के रूप में ख्यात थी तो आज मोदी स्वयं हिटलर के समान नहीं पर हिटलर जैसे आचरण के माने जाते हैं। व्यक्ति स्वनिरीक्षण नहीं कर पाता है,पर कार्य शैली उसी के अनुरूप है। आज सत्ता में मोदी तो दल में अमित शाह के बिना पत्ता नहीं हिल सकता। इसे अनुशासन कहें या हिटलर शाही। जितनी योजना आई,अधिकांश असफल हैं और जो भी उपलब्धि मिली वह पूर्व सरकार की विरासत पर अपनी प्रशंसा पाना है।
मोदी आत्मचिंतन करें कि, उनके द्वारा जो नोटबंदी की गईं,एक राष्ट्र-एक कर,आधार योजना,बेरोजगारी की समस्या,नए उद्योगों का आना और कितने निवेशक अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वापिस चले गए। पाकिस्तान द्वारा की गई कार्यवाही के विरुद्ध कितनी सफता मिली,व्यापार की स्थिति का मूल्यांकन करें,कर को बढ़ोत्त्तरी से व्यापार में कितना बढ़ावा मिला,नकली नोट जमा हुए थे कि आज जो नोट मिल रहे हैं वे नकली हैं।
मोदी जी आकंड़ों के खेल से किसी का पेट नहीं भरता। कितनी जीडीपी बढ़ी या घटी,ये सट्टा के लोगों का काम है। जनता सिर्फ रोटी,कपड़ा और मकान के लिए संघर्षरत है। आप ‘मन की बात’ या अन्य मंचों से ऊँची आवाज में चिल्ला-चिल्लाकर उद्घोषणा करते हैं पर जमीनी हकीकत दूसरी है। शौचालयों का हाल बेहाल है,फ़र्ज़ी आंकड़ों से गदगदायमान हो रहे हैं। स्वच्छ भारत के नाम पर धन का दुरूपयोग और जमीनी हकीकत दूसरी है।
एक बात माननी होगी कि,यदि आपातकाल नहीं लगा होता तो आप लोगों को अवसर मिल गया। इसके  लिए आप लोगों को इंदिरा जी का ऋणी होना चाहिए,पर वर्तमान में मोदी जी का रवैया बिलकुल हिटलर प्रणाली पर चल रहा है। उन्होंने हिटलर जैसे कई प्रचार मंत्री तैनात किए हैं जो मोदी जी के गुणों के बखान के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं। यही उनके लिए नुकसानदायक और घातक होगा। अनुशासन पर्व के बिना राष्ट्र का विकास नहीं है,नैतिकता का अभाव,ईमानदार होना,जनता अपना उत्तरदायित्व समझे और शासक मर्यादा में रहें,पर वर्तमान में राजा दूसरों के अहंकार को नष्ट करना चाहता है,इससे कलुषिता बढ़ती है।
घटनाएं परिस्थिति के अनुरूप बनती है,कोई भी सत्ता का त्याग नहीं करना चाहता। उसके लिए इतिहास में प्राण पिपासु हो जाते हैं। क्या आज वरिष्ठतम लोगों को दरकिनार कर स्वयं सत्ता में आसीन नहीं हैं! जब सत्ता सुख का स्वाद मिल जाता है,तब कोई भी व्यक्ति जो उनके अनुरूप नहीं होता उसे तिरस्कृत कर दिया जाता है। उस समय का मूल्यांकन आज के परिप्रेक्षय में करना उचित नहीं है,क्योंकि आज जम्मू- कश्मीर में आपने राज्यपाल शासन लगाया। इसका मूल्यांकन कुछ समय के बाद करिएगा तो उसमे कुछ न कुछ गलतियां मिलेंगी।
परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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