आरक्षण..नए सिरे से चिंतन की जरूरत

ललित प्रताप सिंह
बसंतपुर (उत्तरप्रदेश)
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`आरक्षण` नाम तो सबने सुना ही होगा,एक छोटा-सा शब्द है,जो दलितों को आगे बढ़ाने में बहुत ही सहायक है। आरक्षण किसी का भी पुश्तैनी हक नहीं है,और न ही विरासत हैl अब सवाल ये उठता है कि,आरक्षण का क्या सदुपयोग हो रहा है। इसको लागू करने की नीति क्या है ?

आरक्षण को बाबा साहब ने दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए लागू किया था,जिससे कि उनका शोषण बन्द हो और वो आगे बढ़ सकेंl
क्या अब आरक्षण की आवश्कता है ? मेरे ख्याल से तो नहीं,आज आप सबने दलितों को ये कहते सुना होगा हम किसी से कम नहीं हैं,और हमें किसी के एहसान की जरूरत नहीं है,हमें अपना हक चाहिएl उनसे कोई ये पूछे-आरक्षण आपका हक कैसे हो गया ? ये तो दस वर्ष के लिए था आज कितने वर्ष हो गए हैं ?
दरअसल आरक्षण के कारण ही आज योग्य लोग पीछे होते जा रहे हैंl अगर बात करें नौकरियों की तो वहां तय रहता है कि कितनी जगह पिछड़े और दलितों के लिए है। देखा जाए तो जब दलित लोग साथ बैठकर पढ़ाई करते हैं तो बराबर ही तो पढ़ रहे हैं,कहाँ हो रहा है शोषण ? वो ही बताएं ?
क्या आरक्षण से सबका भला हो रहा है,हर विभाग में,अगर प्राध्यापक के लिए अर्हता देखी जाए तो परास्नातक ५५ फीसदी अंकों के साथ सामान्य वर्ग के लिए जरूरी हैं,और दलित को ५० फीसदी आवश्यक हैl दोनों जब अध्यापक बन जाते हैं तो ५० वाला और ५५ वाला कौन बेहतर पढ़ा सकता है तो सबका जवाब होगा ५५ वाला,क्योंकि वो ज्यादा योग्य है।

इसी तरह कोई भी विभाग देख लीजिए,सबमें दलितों को फीस में छूट,आयु में छूट और कुर्सी तक आरक्षित है कि कितने दलित और कितने पिछड़े लोग लिए जाएंगेl अब मानो दलितों की प्रावीण्यता कम बनती है,मगर जगह आरक्षित होने के कारण कम अंक वाले को ही नौकरी दे दी जाती हैl सामान्य वर्ग में अंक अधिक जाने के कारण प्रतियोगिता बढ़ती जाती है,और इसी के साथ बेरोजगारी भी बढ़ रही है।

अब पर्चे की फीस की बात करें,तो दलितों से कम ली जाती है,ये क्यों ? सरकार बताए ? क्या इनके पर्चे लेने में कम खर्चा आता है ? माना कि आर्थिक रूप से कमजोर हो सकते हैं लेकिन क्या बाकी वर्ग कमजोर नहीं हो सकते हैं ?
जिसमें लगन होती है,उसकी राह खुद बनती जाती हैl बाबा साहब उसी का उदाहरण हैं। आज सब लोग उनका लिखा मान रहे हैं,मगर ये क्यों नहीं मान रहे कि दस साल तक के लिए ही लिखा था उन्होंनेl अब सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे,मतों का लालच न करके समानता लानी होगीl इसका एक ही उपाय है `किसी भी नौकरी में जाति का वर्ग(कालम) ही हटा दिया जाए`l जो परीक्षा में ज्यादा अंक पाए,वही चुना जाएl
इससे थोड़ी दिक्कत तो होगी,मगर `नोटबन्दी` की तरह कुछ सालों में सब समर्थन करेंगे। इससे छुपी हुई प्रतिभाएं निकलकर सामनें आएंगी,जिससे देश आगे बढ़ेगा। कोई खुद को ठगा-सा महसूस नहीं करेगा।

 परिचय : ललित सिंह का निवास जिला रायबरेली स्थित ग्राम बसंतपुर (उत्तरप्रदेश)में है ।वर्तमान में बीएससी की पढ़ाई के साथ ही लेखन भी जारी है । लेखन में आपको श्रृंगार विधा में लिखना अधिक पसंद है । कई स्थानीय पत्रिकाओं में आपकी रचना प्रकाशित हुई है । ललित प्रताप सिंह का साहित्यिक उपनाम-ललित है। जन्मतिथि ४ जुलाई १९९९ और जन्मस्थान-होशियारपुर(पंजाब) है।कार्यक्षेत्र में आप विद्यार्थी हैं,तो लेखन विधा-कविता और ग़ज़ल जो श्रृंगार रस में लिखना हैl प्रकाशन में श्री सिंह का साझा काव्य संग्रह शीघ्र ही आने वाला हैl आप ब्लॉग पर भी अपनी बात रखते हैंl आपकी नजर में लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी का प्रचार करना हैl

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