आरक्षण वरदान बनाम अभिशाप

शम्भूप्रसाद भट्ट `स्नेहिल’
पौड़ी(उत्तराखंड)

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देश तथा प्रदेश में निर्वाचन के उपरांत सबसे अधिक निर्वाचित सदस्य संख्या वाला बड़ा दल  होने के बाद भी सत्ता सुख प्राप्त करने से वंचित रहना अथवा सत्ता प्राप्ति हेतु गैरवैधानिक तरीके का प्रयोग करना या जोड़-तोड़ की राजनीति का सहारा लेने हेतु मजबूर होना,यह सब उस आरक्षण की विभीषिका के उदाहरण के तौर पर भी देखा जा सकता है,जिस आरक्षण के दुष्प्रभाव से देश का अधिकांश मेहनतकश युवा विगत सत्तर वर्ष से अपनी मेहनत का वास्तविक फल प्राप्त नहीं कर पा रहा है। इसका सीधा असर यह भी दृष्टिगत हो रहा है कि देश को सुयोग्य लोकसेवकों की कार्यदक्षता से वंचित रहना पड़ रहा है। इससे देश के विकास की सच्ची सोच का मानक ही बदलता जा रहा है।
आरक्षण के नाम पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी को कड़ी मेहनत के बल पर ६० से ९५ प्रतिशत अंक प्राप्त कर लेने के बाद भी आरक्षित वर्ग के ३० से ५९ फीसदी अति अल्पतम अंक वालों के सामने हतोत्साहित होकर नौकरी-सेवा प्राप्ति से वंचित रहना पड़ता है। आज यह स्वाद शायद उनको भी लगभग प्रतिकूल ही लग रहा होगा, जो इसी हथियार के सहारे सत्ता सुख पाने की इच्छा पाले रहते हैं। हाल में ही हुए कर्नाटक विधान सभा चुनाव के बाद आए त्रिशंकु विस परिणाम के कारण भाजपा को सबसे बड़ा दल बनने के बाद भी सत्ता से बाहर रहना पड़ा है और सबसे कम सदस्य संख्या वाली जेडीएस को उससे कुछ अधिक सदस्य वाली कांग्रेस का पीछे से समर्थन पाकर सरकार बनाने का स्वर्णिम अवसर मिला। निश्चित ही यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तहत मान्य बहुमत नाम का दुरुपयोग ही है,परंतु इससे अधिक यह जातिगत आरक्षण व्यवस्था के दुष्प्रभाव के रुप में उदाहरण के तौर पर भी देखा जा सकता है।
इसी प्रकार यह सोचें कि,उन बेचारे विद्यार्थियों-अभ्यर्थियों पर क्या असर पड़ता होगा,जो अपनी बुलंद आशाओं के साथ सफलता हेतु कठोर संघर्ष करते और देश की सेवा करने की मन में ठानकर कड़ा परिश्रम करके परीक्षाओं-प्रतियोगिताओं में महत्वपूर्ण सफलता हासिल तो कर लेते हैं,पर  वर्तमान की आरक्षण व्यवस्था के सामने अंत में अपने उद्देश्य प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं। कई-कई तो अपने भाग्य को भी कोसते रहते हैं और भटकाव की ओर बढ़ जाते हैं।
  इसका दुष्प्रभाव यह देश छः से सात दशक से निरंतर भोगता आ रहा है कि,जहां पर सुयोग्यता-मेहनतकश के स्थान पर अल्प अंक प्राप्त अर्थात कम योग्य-अल्प मेहनतकश को स्थान दिया जाता आ रहा है,वहाँ उसका दुष्प्रभाव व दुष्परिणाम देश व समाज को अनेकानेक विपरीत-प्रतिकूलताओं के आधार पर भोगना पड़ रहा है। कोई भी योग्य व मेहनतकश व्यक्ति जहां भी और जिस पद पर भी सेवारत रहेगा,निश्चित ही अपनी कार्यक्षमता के आधार पर उस स्थान व क्षेत्र की गरिमा को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होगा।
इस प्रकार गलत आरक्षण व्यवस्था के शिकार हुए मेहनतकश को मजबूर होकर अपने जीवन यापन हेतु ऐसे तरीके अपनाने पड़ते हैं, जो कि न तो उस संबंधित के लिए अच्छा है और न ही देश व समाज के लिए ही अनुकूल साबित होता है। जिसका खामियाजा देर-सुबेर हम सबको भोगना ही पड़ता है।
योग्यता व मेहनती किसी भी जाति, धर्म व वर्ग में हो सकता है,शायद जिसे कि अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए किसी आरक्षण की आवश्यकता नहीं होगी,और आरक्षण के आधार पर योग्यता सिद्ध करनी पड़े,तो हमारी दृष्टि में संभवतः वह कतई योग्य नहीं हो सकता। फिर तकनीकी व महत्वपूर्ण नीतिगत तथा सुरक्षा संबंधी पदों पर यह व्यवस्था कतई अनुकूल प्रतीत नहीं होती है। इसके उदाहरण-समय-समय पर घटिया स्तर के निर्माण आदि कार्य की गुणवत्ता के कारण घटित पुल दुर्घटना तथा प्रतिकूल स्वास्थ्य सेवाओं आदि के रूप में दिखाई देता रहे हैं।
निश्चित ही हम किसी भी रूप में आरक्षण का विरोध नहीं करते, लेकिन यह अवश्य चाहते हैं कि देश व समाज हित में योग्य व्यक्तित्व या किसी असहाय व निर्धन को ही आरक्षण की सुविधा दी जानी चाहिए,न कि किसी जाति,संप्रदाय या धर्म के आधार पर। आज दुर्भाग्य है कि राजनीतिक दल अपने स्वार्थ-लाभ को देखते हुए कभी भी इस सच्चाई को जानने की न तो कोशिश करेंगे और न ही बहुसंख्य जनता की आवाज को स्वीकार करेंगे,क्योंकि दलों को देश में योग्यता से अधिक एक ऐसे संगठित वर्ग की आवश्यकता है,जो अपने कुछ लोगों की एकता के बल पर इनका राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध कर सके।
सामान्य वर्ग के हित पर यदि ध्यान नहीं भी देते तो कोई बात नहीं, लेकिन देश व वृहद् समाज के हित में तो इस प्रकार की वर्गवादी जातिगत आरक्षण के स्थान पर बदले में देशहित में जो महत्वपूर्ण हो,वह व्यवस्था ही लागू की जाए। यह सर्वविदित है कि गरीबी व असहायपन किसी जाति या वर्ग देखकर नहीं आती,इस परेशानी से कोई भी दुष्प्रभावित हो सकता है।
 न्यायालय द्वारा हाल ही में लिए गए  इस निर्णय कि-किसी भी ऐसे वाद के सापेक्ष नामजद अपराधी को तब तक गिरफ्तार न किया जाए,जिसके विरुद्ध किसी वर्ग-जाति विशेष के विधि विरुद्ध कार्य का वाद दायर किया गया हो,जब तक कि सक्षम स्तर से पूर्ण जांच कर इसकी अनुकूलता सिद्ध न हो जाए, इस निर्णय के विरोध में तथा अपनी विभिन्न मांगों को मनवाने हेतु किए गए २अप्रैल २०१८ को भारत बंद के दौरान आन्दोलित समूह के कुछ जनों द्वारा किए गए गैरकानूनी कार्य जैसे-राष्ट्रीय व सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाकर आम जनमानस को परेशानियों में डालने की ताकत के प्रयोग से भारतीय संविधान के साथ-साथ राजनीतिक तुष्टीकरण के तहत प्रदत्त जातिगत आरक्षण की सफलता सिद्ध हो गई है।
जब कोई इतना सक्षम हो जाता है कि वह किसी को भी कष्ट देने व परेशानी में डालने की क्षमता प्राप्त कर लेता है,तो तब वह निर्बल नहीं होता है,वह आम साधारण जन से अधिक प्रभावशाली व सबल हो जाता है। इस प्रकार इतना ज्यादा प्रभावशाली कि व्यवस्था के साथ ही देश की आम जनता को भी झकझोर कर रख सकता है और यहाँ तक कि सार्वजनिक मंचों पर भी संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के तहत बोलने की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी बोल देने से इस महत्वपूर्ण अधिकार की व्यवस्था को भी तार-तार करने में पीछे नहीं रहते।
अब प्रश्न आता है कि क्या इतने सक्षमजनों को आरक्षण अभी-भी दिया जाना चाहिए ? शायद अधिकांश का मत यही होगा कि-नहीं,लेकिन राजनीतिक तुष्टीकरण व स्वार्थ कहाँ इस बात को समझने की कोशिश करता है। यही तो विडम्बना है,क्योंकि यहाँ ‘आम’ नहीं ‘कुछ खास’ चाहिए।
जहाँ तक हमारा मत है-पहले तो आरक्षण हो ही नहीं और यदि आरक्षण आवश्यक ही है तो किसी वर्ग,समुदाय, संप्रदाय व जाति व्यवस्था से हटकर जरूरतमन्द अर्थात जो आर्थिक रूप से निर्धन हो,उसे ही इसका लाभ दिया जाए, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि गरीबी जाति देखकर नहीं आती, गरीबी से कोई भी प्रभावित हो सकता है। हमारा विश्वास है कि यदि आरक्षण का आधार आर्थिक निर्धनता पूर्व से ही निर्धारित हुआ होता,तो निश्चित ही आज देश विश्व के सर्वोच्च स्तर पर अवश्य होता,  जिसे संसार की कोई भी शक्ति आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती।
जरा उन क्रांतिकारियों की शहादत को भी याद करें,जिन्होंने एक स्वर्णिम भारत की परिकल्पना कर अपने प्राणों की आहुति देकर हमें स्वाधीन कराया-
‘ऐ! मेरे वतन के लोगों,जरा आंख में भर लो पानी।
जो शहीद हुए हैं उनकी,जरा याद करो कुर्बानी॥’
इसलिए आरक्षण यदि आवश्यक ही है तो जाति से ऊपर उठकर सार्वजनिक हितार्थ आर्थिक आधार पर सुनिर्धारित किया जाए। यही हमारे पूर्वजों का संदेश भी है कि-‘नंगे को वस्त्र,प्यासे को पानी, भूखे को खाना और निर्धन को धन’ देने से ही दिए जाने वाले दान की सार्थकता सिद्ध होती है। इसके अलावा दिखावा या अपना प्रभाव जमाने हेतु,स्वार्थपरक अथवा एहसान दिखाने के लिए दिए गए  दान तथा सहयोग-सहायता को निरर्थक बताया गया है,इसलिए इस विषय पर गहनता से सोचने व समझने की आज परम आवश्यकता है।
यह भी हम जानते हैं कि,कोई भी राजनीतिक दल जब तक सत्ता प्राप्ति के अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर देश व वृहद समाज के हित की बात को महत्व देने की बात नहीं सोचेगा,तब तक कभी भी इस पूर्व व्यवस्था को नहीं बदलेंगे और न ही शायद इस प्रकार बहुसंख्यक जनता के हित में निर्णय लेने का किसी में साहस भी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो भी परिस्थिति रही होंगी,लेकिन वर्तमान में उच्च सोच व विचार के मद्देनजर और देश की उभरती हुई विश्वस्तरीय छवि को देखते हुए इस प्रकार समाज को अलग-अलग रूप में समझना व देखना न तो देश हित में है और न ही आने वाले समय में शायद दलों के ही हित में होगा।
अतः गंभीरता से सोचें व मनन करें कि, कैसे इस विभीषिका से निजात पाई जा सकती है। निश्चित ही वही होना चाहिए,जो देश व समाज हित में आवश्यक हो-
‘विचार हमारे और निर्णय आपके।
है अभिलाषा यही हमारी कि
हो वही…
बढ़े राष्ट्र सम्मान व विकास गति
जिसके सहारे॥’
परिचय-शम्भूप्रसाद भट्ट का साहित्यिक उपनाम-स्नेहिल हैl जन्मतिथि-२१आषाढ़ विक्रम संवत २०१८(४ जुलाई १९६१) और जन्मस्थान ग्राम भट्टवाड़ी (रूद्रप्रयाग,उत्तराखण्ड) हैl आप वर्तमान में उफल्डा(श्रीनगर पौड़ी,उत्तराखंड) में रहते हैं,जबकि स्थाई निवास ग्राम-पोस्ट-भट्टवाड़ी (जिला रूद्रप्रयाग) हैl उत्तराखण्ड राज्य से नाता रखने वाले श्री भट्ट कला एवं विधि विषय में स्नातक होने के सात ही प्रशिक्षु कर्मकाण्ड ज्योतिषी हैंl आप राजकीय सेवा से स्वैच्छिक रुप से सेवानिवृत्त हैंl  सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत विविध साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं में प्रतिभागिता-सहयोगात्मक मदद करते हैंl शम्भूप्रसाद भट्ट की लेखन विधा-पद्यात्मकता तथा गद्यात्मकता के तहत सम-सामयिक लेख,समीक्षात्मक एवं शोध आलेख आदि हैl ३ पुस्तकें प्रकाशित होने के साथ ही तथा देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हुआ हैl आपको साहित्यिक-सामाजिक कार्योंं हेतु स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ४० से अधिक उत्कृष्टतम सम्मान-पुरस्कार प्राप्त हुए हैंl साथ ही अलंकरणों से भी विभूषित हो चुके हैंl इनकी दृष्टि में विशेष उपलब्धि-सन्तुष्टिपूर्ण जीवन और साहित्यिक पहचान ही हैl श्री भट्ट की लेखनी का उद्देश्य-धर्म एवं आध्यात्म,वन एवं पर्यावरणीय,सम-सामयिक व्यवस्था तथा राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ ही मातृभाषा हिंदी का बेहतर प्रचार-प्रसार करना हैl

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