आरक्षण से पंगु होता देश

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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आरक्षण का अभिप्राय किसी को रक्षित करने से है,जिसके द्वारा उसका अस्तित्व नष्ट हो हो सके,जबकि इसका वर्तमान स्वरूप पात्र को हटाकर अपात्र को लाना हो गया है जिसका परिणाम आज का भारतीय परिवेश है। २१वीं सदी का भारतीय समाज निरन्तर जातियता की आग में झुलस रहा है। जातिवाद को बुरा कहकर दशकों से तोड़ने की बात हो रही है। समाज की सबसे बड़ी बुराई के रूप में जातिवाद को माना जाता है। समाज में ऊँच-नीच की भावना एवं छुआछूत के संवाहक का जिम्मेदार जातिवाद को ठहराया जाता है,यह तथाकथित आरक्षण उसका सबसे बड़ा पोषक है।
जातियता की भावना सामाजिक मान में विभेद करती है तो आरक्षण की व्यवस्था आर्थिक मूल्य में। इन दोनों से ही समाज बँट रहा है। दोनों ही विषमता की द्योतक हैं। दोनों ही समाज में समरसता एवं साम्यता स्थापित करने की दिशा में बाधक हैं। इसका सबसे विद्रूप पहलू उच्च जाति के गरीब लोग एवं निम्न जाति के अमीर लोग के रूप में है। उच्च जाति का गरीब मान एवं मूल्य दोनों ही रूपों में खुद को ठगा महसूस करता है,जिसके लिए कोई अफ़सोस करने वाला भी नहीं है। निम्न जाति का अमीर भी धनपशु होता जा रहा है। ‘करेला नीम चढ़ा’ वाली कहावत तब और चरितार्थ हो जाती है,जब जातिगत आरक्षण का लड्डू लेने की होड़ लग जाती है किन्तु किसी को जातिगत सम्बोधन करने से वह नाराज होकर आपको सहज ही जेल भिजवा सकता है। अर्थात् आम आरक्षित के लिए और गुठली अनारक्षित के लिए है।
देश का भविष्य बच्चे होते हैं जिनकी सीखने की क्षमता बहुत अधिक होती है। भविष्य का देश,देश के इन्हीं भविष्यत् कंधों पर टिका होगा जबकि आज के बच्चों को देश किस सोच का परिवेश दे रहा है,ये छिपा नहीं है।
चिंता तब और बढ़ जाती है जबकि विद्या मंदिर में नामांकन का आधार जातिय है और सुविधाएँ भी,फिर उस विघटित परिवेश में किस मानसिकता के शिक्षित पैदा होंगे !
‘जब हंस चुनेगा दाना,कौआ मोती चुन चुन खाएगा’ तो भारत विकसित दुनिया की निचली पायदान पर बैठा नज़र आएगा।
योग्यता विवश होकर विदेशों का रुख करेगी और भारत अयोग्यों का जमघट बन जाएगा। आरक्षण को फलित करने वाले समस्त सक्षम लोग विदेश में चिकित्सक से इलाज करवा रहे हैं और अधिकांश मामलों में वह चिकित्सक भारतीय होता है। हमारी प्रतिभाएँ विदेश के काम आ रही हैं और उन्हीं की प्रतिभाओं से निर्मित अत्याधुनिक सामान हम आयात कर रहे हैं। बच्चों को पैदा करके पालन-पोषण हम कर रहे हैं,वर्षों तक निजी और सरकारी सुविधाएँ हम लुटाकर बच्चों को योग्य बना रहे हैं,और फायदा मिल रहा है विदेशों को। ‘हर्रय लगे न फिटकरी,रंग चोखा होय’ की तर्ज पर हमारे कुशासन का लाभ कोई और पा रहा है। इसका एकमात्र कारण जातिय आरक्षण है जिसके चलते हमारे योग्य नौनिहाल मजबूर होकर रोजगार के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं और अयोग्य उनके पहले ही सरकारी बाबू बनकर देश के विकास के जनाजे में मर्शिया गा रहे हैं। हम जैसे आपजन सक्षम होकर भी पितामह की तरह मौन धारण किए हुए हैं।
हम अभी भी नहीं सुधरे तो आने वाले समय में हम विश्व समुदाय में आदि मानव-सा नजर आएँगे। हंसों के बीच में बगुला की भाँति। कहीं देर न हो जाए,और हम सोते ही रहें।
परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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