आलू की आत्मकथा

वन्दना पुणताम्बेकर
इंदौर (मध्यप्रदेश)
*******************************************************

बात उन दिनों की है,जब आलू को धरती से निकाला जा रहा था। मट्टी में सना आलू अपने-आपको पहचान नहीं पा रहा था। थोड़ी देर में आलू की मिट्टी साफ की गई। कई लोग मिलकर उसे साफ-सुथरे बोरों में भर रहे थे। अपनी इतनी इज्जत और सेवा देखकर आलू अपने बारे में सोचने लगा। वाह..,मैं कितना सुंदर मोटा ओर गोरा,गोरा हूँ। वह अपने रूप पर इतराने लगा। एक दिन उसने देखा कि,

पास खेत में मैथी इठला रही थी। वह उसके पास गया। मैथी भी उसे देख बहुत खुश हुई।

नरम-नरम,हरी-हरी मैथी को देख आलू के मन में लड्डू फूटने लगे। उसने मैथी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। मैथी ने खुशी से शादी का प्रस्ताव स्वीकार किया। दोनों बहुत खुश थे,लेकिन समय की मार से कौन बचा है।अचानक तेज बारिश में बेचारी नाजुक-सी मैथी गल गई, और मर गई। आलू को बहुत दुःख हुआ,उसका अकेलापन कटता नहीं था।

कुछ समय बाद वह सैर पर निकला,तो उसने देखा तो सामने उसे बहुत ही नाजुक-सी हरी-हरी सुंदर भिंडी नजर आई। उसने भिंडी को देखा और अपने अकेलेपन के बारे में बताया। फिर शादी का प्रस्ताव रखा।

भिंडी अकड़कर बोली..,-“में कितनी सुंदर हरी-भरी और तू भद्दा मोटा ना तेरा कोई रूप ना आकार,चला बड़ा मुझसे शादी करने भाग यहाँ से।” भिंडी के अपमान से आलू दुःखी हो गया। सामने खेत में खड़ी गोभी दोनों की बातें सुन रही थी। उसे भिंडी का यह व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आया।वह आलू के पास आकर बोली,-“क्या मैं तुम्हारी दोस्त बन सकती हूँ। अपने से बड़ी गोभी को देख आलू खुश हो गया।आलू के साथ गोभी को जाते देख और भी सब्जियां मटर,टमाटर,पत्तागोभी सभी दौड़-दौड़कर आई। सभी आलू की दोस्त बनाना चाह रही थी।

आलू अचानक इतने सारे दोस्तों को पाकर बहुत खुश हो गया। अब उसे अपने अपमान का कोई मलाल नहीं रहा।

आलू के साथ सभी सब्जियों को देख भिंडी तिलमिला उठी।अब उसे अपना अपमान महसूस हो रहा था। वह अकेली ही रो रही थी। अब कोई उसे अपने साथ नहीं रखता,सदा अकेली ही रहती।

एक बार सभी सब्जियां आलू के साथ खेल रही थी,तो आलू ने एक सवाल पूछा। जिसके साथ मेरी शादी हुई थी,उसका नाम बताओ।

सभी सब्जियां एक साथ चीख उठी मैथी….मैथी। आलू ने कहा कि-“तुम सब तो मेरी दोस्त हो,बीवी नहीं।” तो सबने कहा-हम तो उसका नाम बता रहे थे। जब आलू को समझ आया तो वह खूब जोर-जोर से हँसने लगा। सभी सब्जियां भी उसके साथ खिलखिला उठी। भिंडी अकेली खड़ी यह तमाशा देख रही थी। मन मसोसकर खड़ी थी। दोस्तों,आज भी भिंडी अकेली ही पकती है,और आलू सबके साथ इसीलिए कभी भी अपने रूप और गुणों पर घमण्ड नहीं होना चाहिए। रूप-रंग सब मिट जाते हैं। इंसान का अच्छा व्यवहार ही उसके साथ जाता है। आलू ने अपने से सभी सब्जियों को अपना बना लिया,और आज सब्जियों का प्रधान बन देश और स्वाद का मान बढ़ाकर चल रहा है।

परिचय:वन्दना पुणतांबेकर का स्थाई निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। इनका जन्म स्थान ग्वालियर(म.प्र.)और जन्म तारीख ५ सितम्बर १९७० है। इंदौर जिला निवासी वंदना जी की शिक्षा-एम.ए.(समाज शास्त्र),फैशन डिजाईनिंग और आई म्यूज-सितार है। आप कार्यक्षेत्र में गृहिणी हैं। सामाजिक गतिविधियों के निमित्त आप सेवाभारती से जुड़ी हैं। लेखन विधा-कहानी,हायकु तथा कविता है। अखबारों और पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं,जिसमें बड़ी कहानियां सहित लघुकथाएं भी शामिल हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-रचनात्मक लेखन कार्य में रुचि एवं भावनात्मक कहानियों से महिला मन की व्यथा को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है। प्रेरणा पुंज के रुप में मुंशी प्रेमचंद जी ओर महादेवी वर्मा हैं। इनकी अभिरुचि-गायन व लेखन में है।

Hits: 11

आपकी प्रतिक्रिया दें.