आस,निराश भई

डॉ.एम.एल.गुप्ता ‘आदित्य’ 
मुम्बई (महाराष्ट्र)

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अन्य दिनों की भांति ही १४ मार्च, बुधवार को भी सही वक्त पर हम आईसीयू में पहुंचे। गेट खुलते ही उस दिन भी सबसे पहले मैं पहुंचा। आईसीयू में मिलने जाने के नियम बड़े कड़े हैं। सिर पर टोपी,मुंह पर मास्क और पांव में जूते-चप्पल के नीचे भी कवर जैसा पहनना पड़ता है। इस कारण कई बार सामने वाले को पहचानने में कठिनाई होती थी,और फिर जो बीमार और बेसुध है,उसके लिए तो और भी कठिन है,इसलिए मैं वहां पहुंचकर अक्सर अपना मास्क नीचे कर देता था ताकि वह मेरी आवाज सुन सके और अगर वह आंख खोलें तो उसे मुझे पहचानने में दिक्कत न हो।
जैसे ही मैं वहां पहुंचा और मैंने कहा-‘जान देखो, मैं आ गया हूं।’ मेरी आवाज़ सुनते ही उसमें बिजली-सी कौंधी। उसने मेरी तरफ गर्दन घुमाई। मैंने देखा, पहली बार,उसकी बाईं आंख थोड़ी खुल रही थी। मैं चौंका, ‘जान तुम्हारी आंख तो खुल रही है,थोड़ी कोशिश तो करो,पूरी आंख खुल जाएगी।’ मैं अपनी उंगलियों के सहारे से उसे आंख खोलने में मदद करने लगा। तब तक नजर पड़ी,उसकी दाईं आंख पूरी तरह खुली हुई थी। मेरे आश्चर्य और खुशी का ठिकाना ना रहा। मैंने कहा,-‘अरे जान, तुम देख पा रही हो। मुझे देखो, देखो मैं आया हूं। देखो तुम्हारी दोनों आंखें खुल रही हैं,अरे बड़ी हिम्मत की है तुमने। मुझे देखो जान,देखो जान।’ वह आंखों की पुतलियां घुमाते हुए मेरी और देखे जा रही थी। ‘वाह ! आज तो तुम दोनों हाथ भी उठा रही हो, बहुत खूब।’ मैंने उसका उत्साह बढ़ाया। मैंने देखा आज उसके चेहरे पर खास तरह की चमक थी लेकिन आंखों में दर्द और बेचैनी साफ पढ़ी जा सकती थी। उसकी पीड़ा को सोचते ही भीतर एक तूफान-सा उठता था,पर आंखों के बादल बरस जाते।
उसकी संभावित चिंताओं को दूर करने के लिए मैंने कहा,-‘तू सुन रही है ना। उत्कर्ष और सोनू बहुत समझदार हो गए हैं। दोनों अपना ही नहीं,मेरा भी बहुत ख्याल रख रहे हैं। चिंता मत कर,जल्दी से अच्छी तरह ठीक हो जा। हम चारों जल्दी ही मुंबई वापस जाएंगे।’ यह कहते-कहते मेरी आंखों से अश्रुधारा बह उठी। ये खुशी के आंसू थे।
चिकित्सक आ गए थे। मैं उनकी तरफ मुड़ा और कामिनी की तबियत पूछने लगा। चिकित्सक ने कहा,-‘हां चेतना तो बढ़ी है, आंखें भी खुल गई हैं। वह सब देख-समझ भी रही हैं,लेकिन एक बात कहूं,खतरे से बाहर अभी भी नहीं हैं। उनका रक्तचाप अभी भी नियंत्रण में नहीं आ रहा है। लीवर काम नहीं कर रहा है। एक बार स्थिति बिगड़ी तो अन्य अंग भी उसकी चपेट में आ जाएंगे।’ भीतर की खुशी मायूसी में बदल गई। मैंने लगभग गिडगिड़ाते हुए कहा,-‘ डॉक्टर साहब अब जो भी कर सकते हैं,आप ही कर सकते हैं। जो भी संभव हो कीजिए,इनकी जान बचा लीजिए।’ बिना उत्तर सुने में कामिनी की तरफ मुड़ गया।
अचानक मुझे कामिनी की बहुत पतली और कमजोर-सी आवाज सुनाई दी। उसने कहा- ‘सोनू’। मैं चौंका ! ऑक्सीजन मास्क लगे होने के बावजूद और शरीर में तनिक भी ताकत न होने के बावजूद उसने किस तरह हिम्मत करके बेटी को पुकारा होगा ? एक शब्द से आगे उसकी आवाज न निकली। उसने मास्क लगे होने के बावजूद एक शब्द भी कैसे निकाला,यह समझ से परे था। बच्चों से मिलने की उसकी तड़प को मैंने भांप लिया। ‘मैं हड़बड़ाते हुए एक बार फिर चिकित्सक की तरफ मुड़ा,-‘डॉक्टर साहब,डॉक्टर साहब ! देखो बच्चों की मां अपने बच्चों को बुला रही है। प्लीज,प्लीज उन्हे भी अंदर आने दीजिए। चिकित्सक ने हालात को समझते हुए कहा,-‘ठीक है बुला लीजिए।’
मैं लगभग दौड़ता-सा बाहर की तरफ गया और भाई से कहा,-‘दोनों बच्चों को जल्दी अंदर भेजो।’ ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी ने विरोध किया और कहा कि एक बार में एक ही व्यक्ति अंदर जा सकता है। ‘डॉक्टर से पूछ लिया है,तुम चाहो तो पूछ लो, उन्होंने अनुमति दे दी है-‘ मैंने उसे समझाया। चिकित्सक से पुष्टि करने के बाद उसने दोनों बच्चों को अंदर आने दिया। उत्कर्ष और सोनू दोनों बच्चे और मैं उसके बिस्तर के दोनों तरफ खड़े हुए थे। कुछ कहने के लिए वह बार-बार अपने मास्क को हटाने की कोशिश कर रही थी,लेकिन उसके बस में न था। वहां एक नर्स खड़ी थी,मैंने उससे अनुरोध किया-सिस्टर हो सके तो एक मिनट के लिए ही सही, ऑक्सीजन मास्क हटा दो। देखो ना,मां अपने बच्चों से कुछ कहना चाह रही है,प्लीज।’
नर्स को दया आ गई। उसने कहा, -‘ठीक है हटा देती हूं।’ फिर अचानक उसका विचार बदला, उसने कहा,-‘आप दोपहर बाद आएंगे,तब हटा दूं तो ?’ घबराई -सी बेटी सोनू ने कहा-‘ठीक है, चलिए शाम को हटा देना।’ वह डर रही थी कि कहीं ऑक्सीजन मास्क हट जाने से कोई मुश्किल न पैदा हो जाए,लेकिन कामिनी अभी भी बार-बार मास्क को हटा कर कुछ कहने के लिए कोशिश कर रही थी। असफल होते ही दोनों हाथों को जोड़ लेती थी। ‘कभी-कभी लगता था कि वह दोनों हाथ जोड़कर हमें आखरी प्रणाम कर रही है। उसकी कातरता देख कर आंखें भर आती थी,लेकिन वहां रोने की अनुमति भी तो न थी। देखते ही देखते एक घंटा बीत चुका था और अस्पताल के नियमों के अनुसार आईसीयू में रुकना संभव न था। सीने पर पत्थर रखते हुए मैं बाहर की तरफ लौट आया। मेरी हालत पर तरस खाकर कर्मचारी मुझे समय से ५ मिनट अधिक रुकने का समय तो पहले ही दे चुके थे।
लगातार मेरे जहन में एक ही बात आ रही थी कि इस हालत में किस प्रकार आईसीयू में वह एकदम अकेले बीमारी से जूझ रही होगी। न तो वह किसी से अपना दर्द कह सकती थी और न ही अपने किसी को देख सकती थी। आईसीयू के एक बिस्तर पर वह मौत से जूझ रही थी,एकदम अकेले। सोचकर ही कलेजा मुंह को आता था,लेकिन इस बात की खुशी भी थी कि आज उसे होश आ गया है तो स्थिति में और सुधार होने की संभावना बन गई है। इसी के चलते कई दिन बाद मैंने उस दिन खाना ठीक से खाया।
सुबह के बाद दोपहर ४ से ५ बजे तक का मिलने का समय होता था। निगाहें तो घड़ी पर ही थी कि कैसे ४ बजे और मैं दौड़कर उसके पास जाऊं। जैसे ही अनुमति मिली टोपी,मास्क वगैरह पहनकर मैं दौड़ते हुए उसके पास जा पहुंचा। मेरी आहट सुनते ही एक बार फिर उसके शरीर में बिजली-सी दौड़ी। अब भी लगभग वही स्थिति थी। आंखें खुली थी पर वह कुछ कहने के लिए बार-बार मास्क को हटाने की कोशिश कर रही थी। उसकी बेचैनी और बढ़ गई थी। कुछ न कह पाने की उसकी बेबसी आंखों से टपक रही थी। आखिरकार मैंने ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक से अनुरोध किया,-‘डॉक्टर साहब,वो कुछ कहना चाह रही है। एक मिनट के लिए मास्क हटा सकें तो !’ मैंने फिर कहा,-‘सिस्टर ने कहा था, शाम को एक -दो मिनट के लिए ऑक्सीजन मास्क हटा देंगे, देखो,देखो वह कुछ कहना चाह रही है।’ ‘यह संभव नहीं है।’ चिकित्सक ने मुझे समझाते हुए कहा,-‘ देखिए पेशेंट की स्थिति ठीक नहीं है,हमें ऑक्सीजन का लेवल बढ़ाना पड़ा है। ऐसे में ऑक्सीजन मास्क हटाना रिस्की है । हम मास्क नहीं हटा सकते।’ चिकित्सक की बात सुनकर जैसे मुझ पर वज्रपात-सा हो गया, उसकी तड़प,क्या उसके मन की बात मन में ही रह जाएगी।’ मन बहुत उदास हो गया,लेकिन कामिनी की कुछ कहने की तड़प जारी थी। पस्त होने पर भी वह बार-बार लगातार कुछ कहने के यह मास्क हटाने की कोशिश कर रही थी। वह कुछ कहना चाह रही है,लेकिन कह नहीं पा रही यह सोचकर ही दिल बैठ रहा था। आखिर में दोबारा फिर जाने के लिए‌ मैं बाहर आ गया,ताकि अन्य लोग भी उससे मिल सकें।
चिकित्सकों की राय के अनुसार हम आज ज्यादा रिश्तेदारों को अंदर नहीं जाने दे रहे थे। चिकित्सक का कहना था,-‘आपकी पत्नी तो आपको,बच्चों को और बहुत करीबी लोगों को ही देखना चाहेगी। आप तो भीड़ लगा रहे हैं यहां।’ उसके माता- पिता और मेरे माता-पिता भाई के मिलने के बाद एक बार फिर मैं वहां पहुंचा,बेटी भी वहीं थी। बेटा मिलकर जा चुका था। बेटी ने अपनी मां से कहा,-‘मम्मी,अब मैं जाती हूं। मिलने के लिए सुबह आऊंगी।’ यह कहते हुए वह बाहर की तरफ जाने लगी। उसके इस कथन पर मैंने देखा कामिनी बेचैन हो गई। उसने जवाब में न जाने के लिए गर्दन हिलाई। जैसे ही यह मैंने यह देखा,मैंने बेटी को आवाज देकर रोका। ‘रुको,रुको बेटा रुको,लौट आओ,मम्मी बुला रही है।’ वह लौट आई। ऐसा लगा जैसे कामिनी की सांसें लौट आई होंं,लेकिन अस्पताल में भावनाओं की नहीं,नियमों की चलती है। बेटी अंततः कुछ देर बाद बाहर चली गई।
मिलने का समय समाप्त हो रहा था,कुछ मिनट ऊपर ही हो चुके थे। मैं निरंतर आंसूओं को संभालते हुए कामिनी से बातें कर रहा था। मैंने उससे कहा,-‘जान मैं क्या करुं,चिकित्सक तो मास्क नहीं हटा रहे। चिंता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।’ उधर से कोई जवाब नहीं आ रहा था। मैं बोलता जा रहा था। केवल आंखों की प्रतिक्रिया से मैं बातों को आगे बढ़ा रहा था। ‘मैं बच्चों का ध्यान रख रहा हूं। तेरी मम्मी- बाबूजी और माँ-पिताजी,भाई-भाभी सभी तेरा इंतजार कर रहे हैं। सब नीचे बैठे हैं तेरे इंतजार में। बच्चे मेरा बहुत ध्यान रख रहे हैं । सब ठीक हो जाएगा। हम तेरा इंतजार कर रहे हैं जल्दी ठीक हो जा। हिम्मत रख,सब ठीक हो जाएगा’।
इतने में अस्पताल का कर्मचारी मुझे बुलाने के लिए आ गया था उसने कहा,-‘सर देखिए समय हो चुका है। अब आप बाहर चलिए।’ आखिरकार मैं जान से विदा लेने लगा। मैंने कहा,-‘जान अब तो मुझे जाना पड़ेगा। क्या करुं, अस्पताल वाले रुकने ही नहीं दे रहे। कल सुबह फिर तुझसे मिलने आऊंगा। मैं जाऊं ना ?’ मैंने पूछा। आंखों में कातरता लिए उसने ‘ना’ में अपनी गर्दन हिलाई और उसके साथ ही आंखों की दोनों छोरों पर आंसूओं की बूंदें उभर आई। उसकी बेबसी आंखों से टपक रही थी,मानो आंखों से गिड़गिड़ा कर,रोकर मुझे रोक रही है और कह रही है,-‘मेरे पास ही रहो,मत जाओ ना।’ वह मुझे जाने से रोक रही थी लेकिन अस्पताल के नियमों का पालन करते हुए बेबसी में आंसूओं को रोकते हुए एक बार फिर मैंने पलटकर उसकी तरफ देखा और धीरे-धीरे कमरे से बाहर आ गया। बाहर आते-आते धैर्य का बांध टूट चुका था,आंसुओं का सैलाब बह चला था।
नीचे मिलने वाले परिजनों की भी काफी भीड़ थी। आशा-निराशा, दर्द,आशंका और भावनाओं के भंवर के बीच डूबता-उबरता-सा मिलने वालों से बातें कर रहा था। उनके सहानुभूति के शब्द भी मानो जख्म को कुरेद देते और किसी तरह रोककर रखे आंसूओं के बांध को तोड़ देते थे।
जहां एक और दर्द था,वहीं उम्मीद भी जाग उठी थी। उसने आज न केवल आंखें खोली थी बल्कि वह हाथ-पांव भी हिला पा रही थी। हर बात का गर्दन हिलाकर प्रत्युत्तर भी दे रही थी। हालांकि,चिकित्सक की बातें आशंकाओं को भी जगा रही थी। डर भी बना ही हुआ था। आशा और निराशा के झौंके मन को बेचैन किए हुए थे।
छोटे भाई सतीश ने कहा,-‘अब घर चलो,बैठने का तो कोई फायदा नहीं है। ऊपर आईसीयू में तो कोई जाने न देगा। मैं रुक जाता हूँ।’ रोज की भांति मैं घर लौट आया। भतीजे पुलकित के साथ दुबारा एक बार अस्पताल जाकर आना था। यह तो मैं जानता था कि मिलने के समय के अलावा तो कोई मिलने नहीं देता,फिर भी दिल की तसल्ली के लिए एक बार जाता था। भतीजा देर पर देर किए जा रहा था। उधर मेरी बेचैनी बढ़ रही थी।
आखिरकार अस्पताल जाने के लिए हम बाहर निकले। देखा पिताजी आंगन में अंधेरे में अकेले कुर्सी पर बाहर बैठे थे। इतने मच्छरों में अंधेरे में वे अकेले बाहर क्यों बैठे हैं ? मुझे कुछ अजीब-सा लगा। मैंने पूछा,-‘आप अकेले बाहर क्यों बैठे हैं ? ‘ ‘यूं ही’ उन्होंने छोटा-सा उत्तर दिया और चुप हो गए। जाने की जल्दी में मैंने भी बहुत ध्यान नहीं दिया। गाड़ी में बैठे-बैठे मैंने कामिनी का मोबाइल देखना शुरु किया। उसके व्हाट्सैप संदेशों में मैंने एक संदेश देखा,जो उसने बेटी को उस दिन भेजा था जब हम दिल्ली के लिए चलने वाले थे और उसकी तबियत काफी खराब हो चुकी थी। उसने लिखा था,-‘सोनू आई लव यू। अपना और सबका ख्याल रखना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी।’
संदेश पढ़कर मैं चौंका,’उस दिन जब उसकी आवाज बंद हो रही थी,हाथों ने उठना बंद कर दिया था,ऐसे में उसने किस तरह से इस संदेश को टाइप किया होगा? संदेश पढ़कर एक बार मैं फिर भावनाओं में बह उठा था। उसकी जीवटता और हमारे प्रति उसकी चिंता व स्नेह का ऐसा प्रतिमान था,जिसे समझ पाना भी कठिन था।

सोचते-सोचते हम जल्द ही अस्पताल पहुंच गए। सामने छोटा भाई सतीश और उसके दो -तीन दोस्त लॉन में ही खड़े हुए थे। गाड़ी से उतरकर उनकी तरफ बढ़ा तो भाई ने कहा-आ जाओ भाई,फिर संयत होते हुए अचानक उसने कहा,-‘भाई, भाभी चली गई।’ लगता था अचानक पूरा आसमान मेरे ऊपर आ गिरा। एकाएक किसी ने मेरी पूरी दुनिया छीन ली।’
मैं कामिनी से मिलने के लिए पागलों की तरह अस्पताल की तरफ दौड़ा। ऊपर पहुंचकर मैं चिल्लाया,-मुझे जल्दी मिलवाओ, जल्दी मिलवाओे भाई। लगता था शरीर की सारी शक्ति खत्म हो गई है। चिल्लाने की ताकत भी नहीं। मुझे लगा था कि वह अभी आईसीयू में अपने बिस्तर पर होगी। हम आईसीयू के बाहर खड़े थे। क्रंदन करते हुए मैंने कहा,-‘जल्दी दिखाओ’ छोटे भाई ने कहा,-‘मिलवाते हैं,रुको तो सही।’ वहीं बगल में एक बड़ा- सा बॉक्स भी रखा था। अचानक एक कर्मचारी ने बक्से को खोल दिया। उसमें मेरी जान एक कपड़े में लिपटी हुई पड़ी थी। उसकी नाक और मुंह में रूई ठूंस दी गई थी। बड़ी बेअदबी से मेरी जान को एक बॉक्स में लिटा रखा था। यह बेहद तकलीफदेह और असहनीय था। यह दृश्य देख ऐसा लगा कि मेरे पूरे शरीर में एक साथ करोड़ों बिच्छू डंक मार रहे हों। दिमाग साथ छोड़ रहा था,कुछ सूझ नहीं रहा था। निराशा और विषाद में भरा में छटपटा रहा था।
सब कुछ समाप्त हो चुका था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मेरे शरीर से मेरी जान निकल गई है और मैं मृत हो चुका हूं। दिन में जगी आस रात होते-होते पूरी तरह निराशा में बदल चुकी थी।

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