इतनी-सी है अर्चना…

डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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नूतन ऊषा की किरण,
नवल मधुप के गान।
चुन-चुन कर किरणें करें,
ओस कणों का पान॥

सूरज की कुछ लालिमा,
घन का मधुरिम चीर।
उर को मेरे बांधती,
मनभावन जंजीर॥

यही कहे नित भोर में,
तन को छूकर शीत।
देखो मेरा राज है,
जीत सके तो जीत॥

तन लिपटाऊं मैं वसन,
भरे शीत मुस्कान।
कहती मेरा राज है,
मेरा लोहा मान॥

नभ में घन हैं छा गये,
अब सूरज की बात।
घन की शीतल घात पर,
कहां करे प्रतिघात॥

भोर समय माँ भारती,
वन्दन बारम्बार।
हे वीणापति दीजिये,
पूजन का अधिकार॥

हे माँ वीणावादिनी,
विनवहुं बारम्बार।
मेरी छोटी अर्चना,
करना माँ स्वीकार॥

शब्दों को माँ जोड़कर,
सदा बनाती गीत।
रसना से कविता बहे,
अधरों से संगीत॥

वीणा पति हृदय बसो,
सुन लो करुण पुकार।
सदा भोर में दीजिये,
पूजन का अधिकार॥

बहे लेखनी से सुधा,
कविता की नित धार।
इतनी-सी है अर्चना,
माँ करना स्वीकार॥

मैं नरपशु तू मातु है,
इतना रखना भान।
तू तो नित प्रकाश है,
मैं तम की हूँ खान॥

माता मेरे बोल ना,
बनें किसी के शूल।
माँ नित मेरी भाष ही,
बने नेह का मूल॥

माँ पूजन किस विधि करूं,
मैं अवगुण की खान।
कविता शाखों पर चढ़ूं,
दो इतना वरदान॥

रसना में मधुमास हो,
यही एक अरदास।
अधरों में देना सुधा,
कर रसना में वास॥

माँ मैं भी तो बन सकूं,
तव अर्चन का फूल।
या नित मैं लिपटा रहूं,
बन चरनन की धूल॥

परिचय-डॉ.विद्यासागर कापड़ी का सहित्यिक उपमान-सागर है। जन्म तारीख २४ अप्रैल १९६६ और जन्म स्थान-ग्राम सतगढ़ है। वर्तमान और स्थाई पता-जिला पिथौरागढ़ है। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले उत्तराखण्ड राज्य के वासी डॉ.कापड़ी की शिक्षा-स्नातक(पशु चिकित्सा विज्ञान)और कार्य क्षेत्र-पिथौरागढ़ (मुख्य पशु चिकित्साधिकारी)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करते युवाओं को पशुपालन से जोड़ना और उत्तरांचल का उत्थान करना,पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के समाधान तलाशना तथा वृक्षारोपण की ओर जागरूक करना है। आपकी लेखन विधा-गीत,दोहे है। काव्य संग्रह ‘शिलादूत‘ का विमोचन हो चुका है। सागर की लेखनी का उद्देश्य-मन के भाव से स्वयं लेखनी को स्फूर्त कर शब्द उकेरना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-सुमित्रानन्दन पंत एवं महादेवी वर्मा तो प्रेरणा पुंज-जन्मदाता माँ श्रीमती भागीरथी देवी हैं। आपकी विशेषज्ञता-गीत एवं दोहा लेखन है।

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