उजड़ने का दुख

डॉ.संध्या गंगराड़े
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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ये क्या जगह है दोस्तों………….,
मौसम बदलते हैं,प्रकृति अपने विभिन्न रूप दिखाती है;कभी धानी चुनरी पहन मन मोह लेती है तो कभी षोडषी का सिंगार कर,बासंती रूप धारण कर,पुष्प खचित,तारा अंकित घाघरा चोली पहन लेती है। शरद में चांदनी बिखेरती है तो ग्रीष्म में तपन से झुलझाती है। उसकी नदियों की कल-कल धारा कानों में रस घोलती है तो बाढ़ में रौद्र रूप धारण कर काल बन बिना भेदभाव के जड़-चेतन सबको लील लेती है। कभी भूकम्प का ताण्डव होता है और कभी सुनामी का कहर।
मौसम बदलते हैं,मौसमों का बदलना प्राकृतिक है। मानव के वश के बाहर है, परन्तु जब यह कहर मानव निर्मित हो, प्रशासन की क्रूरता और शासन द्वारा निर्मित हो,तथा निर्ममता से उपजा हो तब कलेजा टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। लगता है इसे तो रोका जा सकता था,परन्तु अंधेरा आमावस का ही नहीं होता,अंधेर का भी अंधेरा होता है। इसी अंधेर को, इसी निर्ममता को,इसी क्रूरता को बिना सुनामी,बिन भूकम्प भोगा-झेला है ३० जून २००४ को हरसूद वासियों ने।
उफ…! ये कहर,ये त्रास…इक बंगला बने न्यारा तो सबका सपना होता है कुछ का पूरा भी होता है परन्तु उजड़ना,टूटना, ढहना भयावह होता है। जब वह टूटता है तो एक इमारत नहीं टूटती,एक घर टूटता है,जिसमें इन्सान ही नहीं छिपकली, कुतिया,चुहिया भी होते हैं।
वाह रे बाँध और वाह री बिजली की आँख-मिचौनी का खेल तूने क्या खेला, नन्हें बच्चों की आँख-मिचौनी के साथी ही छीन लिए। छिन गया उनका घर आँगन..उजड़ गया सब-कुछ,बस रह गई दुखद त्रासदाई वीरानगी अंदर भी बाहर भी। वीरानगी,रिक्तता,खालीपन वहाँ रह गया,जहाँ कभी पानी भरने वाला है। पानी जो जीवन है,प्राण है वही प्राण ही ले गया।
अब विस्थापन और मुआवजा। विस्थापन एक शब्द नहीं,पूरी संस्कृति है। व्यक्ति विस्थापित नहीं होते,विस्थापन होता है संस्कृति का। १९४७ में विस्थापन हुआ था तब छाया था ‘तमस‘, हो गया था ‘पिंजर‘ यह देश। ‘झूठा-सच‘ देश को विभाजित करता है तो आतंकवाद भी कम बरबादी नहीं लाता। कश्मीर के पण्डित विस्थापित हुए तो क्या अपने कश्मीर के शैवमत को विस्थापित कर पाए ? वो कहीं पीछे ही छूट गया। हरसूद से विस्थापित होकर कहाँ बस पाया है कोई। विशालकाय वृक्षों को फिर से रोप जा सकता है भला! जड़ों से कटना कितना त्रासदायी है,ये तो उन्हीं से जाना जा सकता है जो जड़ों से कटा हो।
मुआवजा! चंद रुपए मुआवजे के रूप में बाँटे गए। मकान डूब में है,आँगन डूब में नहीं। चलो आँगन को,मकान का तो मुआवजा दे दिया और उस पेड़ का क्या जिस पर प्रेमातिरेक में नाम लिख दिया था,मिलन जिसका गवाह था,वो लम्हा था,उन भावनाओं का-संवेदनाओं का मुआवजा कौन देगा ? और क्या चाहकर भी दिया जा सकेगा उस मज़ार का मुआवजा,जिस पर मन्नत मानी थी। टूटी ईंटों का ढेर देखकर वो नन्हीं बालिका सहसा कह उठी-यहाँ तो हमारा विद्यालय था। फिर तो सभी को उन ताजे खण्डहरों,निर्मित खण्डहरों में से अपने घर,दुकान,बाजार,झोपड़ी,मंदिर की घण्टी,मस्ज़िद की अज़ान,ईद की सिंवईया,दीपावली की गुझिया,प्रेम की पेंग,नयनों की गोपन भाषा,प्रियतम के प्रथम स्पर्श की सिहरन,दादा की अंतिम बिदाई झाँकने लगी। और ये क्या जगह है दोस्तों…ये तो हरसूद नहीं,ये तो उजाड़ है, खण्डहर है,वीरान…है।

परिचय-डॉ.संध्या गंगराड़े का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में ही है। आप पेशे से सरकारी कन्या महाविद्यालय में प्राध्यापक (हिन्दी)हैं।

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