उधार के पहिये

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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शाम को सात-सवा सात बजने को थे। गली के नुक्कड़ से घिसयाते हुए सायकल स्टैण्ड की आवाज सुनकर, चकरे ने दौड़ लगा दी,पापा आए…..पापा आए….। मैं भी चकरे को देखकर कचौरी की तरह फूल गया। पहली तारीख थी…इसलिए घरवाली भी बन-संवर कर बैठी होगी, सायकल के कैरियर पर टंगी जलेबियाँ महक रही थी। कचौरी-चटनी के साथ बात कर रही थी। घर पहुंचते ही चकरे को बड़े गर्व से गोदी में उठाया और कचौरी-जलेबी चकरे को थमा दी, मानो सारा लाड़ आज ही उड़ेल दिया हो। ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान तीस दिन का पसीना आज तनख्वाह के रूप में घर आ रहा था,जिसका वजन तक जेब सहन नहीं कर पा रही थी। दोनों जेब इतना वजन देखकर जी चुरा रही थी। जैसे-तैसे घर की दहलीज तक पसीना द्रवित रूप में पहुंच चुका था।
घर में सीना तानकर प्रवेश किया,पर बीवी का पिचका चेहरा देख सारी मुस्कान डस्टबिन में जा पहुंची…..। “क्या बात है लाजौ,यह ले इस बार की पूरी तनख्वाह।” जैसे ही हमने ऊँट के मुँह में जीरा डाला,वह सकुचा गई। और उसने भी मुझ जैसी चींटी पर पहाड़ लाद दिया,मतलब एक-एक करके सारे बिल थमा दिए। नगर निगम का,बिजली का,पानी और गुड़-धानी का,पुरोहित जी दूध वाले का बिल…। सारे दिन की थकान एक बार फिर शाम होते-होते चारों कोने चित्त हो गई। चार दिन से ड्रेनेज चौक है,और उसकी शिकायत किए पौने चार दिन होने को आए,लेकिन मजाल है जो किसी ने आकर झांका हो। तिल-तिल मरा हूँ, तब कहीं जाकर यह मकान खड़ा हुआ है,उस पर भी ये बिल…। मेरे हाथ में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों का भार मेरे हाथ तो क्या,कंधे भी सहन नहीं कर पा रहे थे। चकरे की जलेबियां खत्म होते ही उसने हमारे पीले पड़ते चेहरे का कारण पूछा….तो हमने भी एक-एक करके सारे बिल की मदें गिना दी-जल कर,मल कर,स्वच्छता कर, संपत्तिकर,इत्यादि…। चकरे के दिमाग की चकरी दौड़ी और उसने मुझे इशारा किया….”पापा,घर के पीछे ड्रेनेज चौक है,फिर मल कर काहे का,जल आता नहीं,आता भी है तो पहले गंदा और बंद होते-होते चार बाल्टी मिल जाए तो गनीमत,सफाई होती नहीं और आप कि,कर जमा करने की बात को लेकर बोझ तले दबे जा रहे हैं…! चकरे की बात सुनकर मैं अनुत्तरित रह गया। हालांकि,चकरे ने अपनी अल्पबुद्वि से जो कहा ठीक ही तो है,लेकिन मैं कर भी क्या सकता हूँ इस नकली घी के जमाने में। मेरी आवाज उन तक जाती नहीं और पहुंचे भी कैसे!,शहर में कितना शोर प्रदूषण है। कितनी चिल्ला-पों है। सड़कें उधड़ी है,ड्रेनेज चौक,तो कहीं बिजली गुल है,ऊपर से
धड़धड़ाता यह कागज का टुकड़ा…..। दूधवाले को देखो,दूध के भाव ने, पनीयल दूध ने हमारे बल्ली को कभी बल्ले नहीं बनने दिया। परचून के बिल पर नजरें पड़ते ही पसीना बिन बात के बहने लगता है,गरीब की दाल-रोटी को मानो किसी की नजर लग गई हो..। ऊँट के मुँह में जीरे समान तनख्वाह पर एक-एक करके सहपरिवार लक्ष्मी पर हाथ घुमाए,लेकिन मजाल है जो एक नोट भी बढ़ गया हो। अभी पिछली रुकी सूची पूरी नहीं हो पाई थी कि,आगे फिर प्रतीक्षा सूची हो चली। काकू भाई तनु भाई का उधार चुका नहीं कि फिर किसी दूसरे के सामने हाथ पसारने के लिए तैयार होना पड़ेगा।

मुडडे पर बैठा-बैठा न जाने कब पसर गया,मालूम न चला। तभी गर्मा-गर्म पकौड़े की खुशबू ने हमें अचेतन से चेतन किया और पत्नी ने चाय के साथ पकौड़े रखे…”अरे जाने भी दो,सब देख लेगें। मैं जो हूँ,तुम्हारे साथ! इन बिलों का भुगतान मिलकर देंगे। मैं भी सिलाई जानती हूँ,कपड़े सिलकर आज से मैं भी आपका हाथ बंटाऊँगीं। बीवी के इस अदम्य साहस वाले शब्दों ने मानो,बेजान शरीर में प्राण फूंक दिये हों। सौन्दर्य और दिमाग के इस मिलन से पहली बार एहसास हुआ कि,ऊँट के मुँह में भले ही जीरा हो,चींटी पर भले ही पहाड़ लदा हो…पर सब साथ हों तो…फिर चकरे-चकरी के संग सारी थकान जाती रही और हमारी गाड़ी उधार के पहियों पर चलती रहेगी….।

परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl

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