उम्मीद की जंग…असल भारतीय परिपक्वता

इदरीस खत्री
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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फिल्म समीक्षा………………

निर्देशक माजिद,सत्यजीत रे से गहरे प्रभावित हैं और यह उनकी इस फिल्म
‘उम्मीदों की जंग'(बियॉन्ड द क्लॉउड)
में यह साफ झलकता है। इस फिल्म में मानवीय संवेदनाओं का खूबसूरती से फिल्मांकन देखने को मिला है।
फिल्मांकन,कहानी,चयन,स्थल, फ़िल्म के सभी आयामों में फ़िल्म खरी उतरती है।
फ़िल्म में बादलों से दूर देखते वक्त बाराहा डैनी की ‘स्लमडॉग’ की याद ज़हन में दौड़ने लगती है और फ़िल्म उसे टक्कर देती नज़र आती है।
एक उम्मीद जिसको पूरा करने के  सपने में इंसान या तो जिंदगी संवार लेता है, या नेस्तनाबूत कर बैठता है,लेकिन रोज सुबह इंसान यही उम्मीद लेकर आंखें खोलता है कि आज कुछ अच्छा होगा।
इस फ़िल्म का तकनीकी पक्ष बहुत शानदार होकर काबिले तारीफ है।
कहानी के अनुसार आमिर(ईशान) और उसकी बहन तारा(मालविका)  दोनों के मां-बाप की मौत के बाद साथ रहते हैं,लेकिन तारा का पति शराबी होकर घर में बहुत मारा-कूटी करता है। इससे तंग आकर १३ साल का आमिर घर छोड़कर भाग जाता है,लेकिन किस्मत फिर दोनों भाई-बहन को साथ ले आती है। ऐसे में आमिर की पिछली ज़िंदगी इस कदर मुश्किल हालात से गुजरी है,जहां कुछ भी बेहतर नही था।
अब आमिर कुछ पैसा कमाकर ज़िंदगी आरामतलब बनाना चाहता है,उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े।
वहीं धोबी घाट पर ५० साल का अर्शी(गौतम घोष)रहता है,जो तारा पर गलत नज़र रखता है। उसी के चलते वह तारा को हवस का शिकार बनाना चाहता है तो तारा बड़े पत्थर से उसका मुंह कुचल देती है,जिसके बदले तारा को जेल जाना पड़ जाता है।
यहां से कहानी में कई मोड़ आते हैं,जो कि अनपेक्षित होते हैं।
एक खास बात इस फ़िल्म को लेकर कि,यह कोई मनोरंजक फ़िल्म नहीं है,न भारतीय मसाला फ़िल्म। यह पूर्ण रुपेण माजिद मजीदी की फ़िल्म है,जिसमें उन्होंने विश्व स्तर पर भारतीय तस्वीर
उकेर के रख दी है।
न मसाला,न हास्य और न लड़ाई, लेकिन फ़िल्म बांधने में सफल होती है। फ़िल्म को समानांतर (ऑफ बीट या कला फ़िल्म सिनेमा की श्रेणी में ही रखा जाएगा,तो
भारतीय दर्शक की गिनती उंगलियों पर ही खत्म हो जाएगी।
यह फ़िल्म फिछले साल विश्व स्तर पर धूम मचा चुकी है तो दर्शक संख्या उंगलियों से पार निकलने की उम्मीद है। अदाकारी पर बात करें तो ईशान खट्टर के माता-पिता दोनों अभिनय में सिद्ध अभिनेताओं में शुमार होते हैं,और ईशान ने खुद के किरदार को तो जीवंत कर दिया है।
मालविका मलयालम फिल्मों से सफर करके आई है..लेकिन सहज और उम्दा किरदार निभाया है। छोटा किरदार तनिष्ठा चटर्जी भी सहजता से निभा गई है।
फ़िल्म का फिल्मांकन अनिल मेहता ने किया है जो कोण,फ्रेम,और कला निर्देशन फ्रेम के टेक्चर्स(पीछे के बेक ग्राउंड) से निश्चित आपकी वाह कहला देंगे।
संगीत पर कुछ खास नहीं लिख पाऊंगा,क्योंकि रहमान यहां प्रभावित नही करते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि फ़िल्म एक मास्टर पीस है,जो खुद आपको  अपनी तरफ खींच लेगी। भरोसा है कि,यह फ़िल्म समीक्षकों का दिल जीत लेगी।
इसी के साथ में लगी है हास्य हॉरर
‘नानू की जानू’ अभय स्टारर, जबकि ‘दास देव’ का प्रदर्शन आगे बढ़ा दिया गया है।
परिचय इंदौर शहर के अभिनय जगत में १९९३ से सतत रंगकर्म में इदरीस खत्री सक्रिय हैं,इसलिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। परिचय यही है कि,इन्होंने लगभग १३० नाटक और १००० से ज्यादा शो में काम किया है। देअविवि के नाट्य दल को बतौर निर्देशक ११ बार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व नाट्य निर्देशक के रूप में देने के साथ ही लगभग ३५ कार्यशालाएं,१० लघु फिल्म और ३ हिन्दी फीचर फिल्म भी इनके खाते में है। आपने एलएलएम सहित एमबीए भी किया है। आप इसी शहर में ही रहकर अभिनय अकादमी संचालित करते हैं,जहाँ प्रशिक्षण देते हैं। करीब दस साल से एक नाट्य समूह में मुम्बई,गोवा और इंदौर में अभिनय अकादमी में लगातार अभिनय प्रशिक्षण दे रहे श्री खत्री धारावाहिकों और फिल्म लेखन में सतत कार्यरत हैं। फिलहाल श्री खत्री मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में अभिनय प्रशिक्षक हैंl आप टीवी धारावाहिकों तथा फ़िल्म लेखन में सक्रिय हैंl १९ लघु फिल्मों में अभिनय कर चुके श्री खत्री का निवास इसी शहर में हैl आप वर्तमान में एक दैनिक समाचार-पत्र एवं पोर्टल में फ़िल्म सम्पादक के रूप में कार्यरत हैंl 

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