उसका हो न सका…

सलिल सरोज
नौलागढ़ (बिहार)

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मैं उसके दिल में रहा,पर उसका हो न सका,
किराए पे रह कर भी तो सदी गुजरती है।
हर दीए से रोशनी आए ये कोई शर्त तो नहीं,
पहाड़ों से छिटक कर भी रोशनी बिखरती है।
आईना ही आखिरी मुंतजिर नहीं हुस्न का,
धूल और मिट्टी में भी मूर्तियाँ सँवरती हैं।
आसमाँ को तो कई दफे इत्तिला ही नहीं होता,
जब धूप खिली हो,तब भी बारिश बरसती है।
ये धुआँ यूँ ही नहीं उठने लगा है यहाँ से,
पास ही किसी हादसे में बच्चियाँ गरजती है।
ये आँखों से बहे हैं ‘सलिल’,रंग जरूर लाएँगे,
मंसूबों में आह न हो तो ये नहीं ढलकती हैं॥
परिचय-सलिल सरोज का जन्म ३ मार्च १९८७ को बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)हुआ है। आपकी आरंभिक शिक्षा कोडरमा (झारखंड) से हुई है,जबकि बिहार से अंग्रेजी में बी.ए तथा नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए सहित समाजशास्त्र में एम.ए.भी किया है। एक निर्देशिका का सह-अनुवादन,एक का सह-सम्पादन,स्थानीय पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया है। सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र ही आपकी सम्प्रति है। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिशकरते हैं। ३० से अधिक पत्रिकाओं व अखबारों में इनकी रचनाओं का निरंतर प्रकाशनहो चुका है। भोपाल स्थित फॉउंडेशन द्वारा अखिल भारतीय काव्य लेखन में गुलज़ार द्वारा चयनित प्रथम २० में आपको स्थान मिला है। कार्यालय की वार्षिक हिंदी पत्रिका में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।

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