एकता में बल

वाणी बरठाकुर ‘विभा’
तेजपुर(असम)
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खुशबू गर्मी की छुट्टी में मामा के घर गई थी। उसे वहाँ राजहंस देखकर बहुत खुश हुई। जबसे घर आई,पिताजी के समक्ष जिद की कि वो भी राजहंस पालेगी। पहले से ही उनके घर में एक जोड़ी बतख है। जो भी हो जीव पालन करना उचित बात है,यह याद रखकर खुशबू के पिता भी एक जोड़ी राजहंस ले आए थे। उसका सफेद शरीर और लम्बी गर्दन देखने में बहुत सुन्दर दिखाई देती थी। उनके घर के पिछवाड़े में एक पोखर है,पोखर के तट पर एक छोटा-सा घर बनाकर बतख और राजहंस एकसाथ रखते थे ।
राजहंस जब से आए हैं,बतखें कुछ उदास रहने लगी थी।मादा बतख ने बोलने लगी-‘ये बहुत घमंडी है,देखने में सुन्दर है,इसलिए किसी को आवाज भी नहीं देते हैं। जब देखो,तब गर्दन मोड़कर पंख में सिर छिपाकर बैठे रहते हैं।’ नर बतख बस उनकी बात सुनता रहता था। राजहंसिनी कभी-कभी उनके साथ बात करना चाहती थी,लेकिन अक्सर मादा बतख कुछ-न-कुछ कहकर उसका मजाक उड़ाती थी। फिर भी राजहंस को जब भी कहीं दाना मिलता था,बतखों को बुलाकर एकसाथ खाते थे। वे हमेशा सोचती थी कि उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि बतखें उनको पसंद नहीं करते हैं!
कुछ महीने बीत गए,मादा बतख अंडे देने लगीं। अब वो राजहंसिनी का और मजाक उड़ाने लगी। फिर भी राजहंसिनी हमेशा खामोश रहती थी। एक दिन रात को तेज तूफान आया,और रात को ही उनके घर की छत उड़ा ले गया। तूफान थमते ही कहीं से एक जंगली बिल्ली आई और अंडे पर बैठी मादा बतख को ही उठा ले गई। नर बतख रोने लगा,-‘अरे अब क्या होगा! बिचारी को तो बिल्ली खा गई, अब अंडे में से बच्चे भी नहीं निकलेंगे। मेरा सारा सपना टूट गया।’
राजहंसिनी ने उसे आश्वासन देते हुए कहा-‘भाई,आप दुखी न हो,भाभी चले जाने का हमें भी दुख है,लेकिन तब कुछ नहीं कर सकी। अब इन अंडों पर मैं बैठूंगी।’
नर बतख ने उसे गले लगाते हुए कहा-‘हम तुम्हें कितना गलत समझते थे। मुझे क्षमा कर दो।’ उस दिन से राजहंसिनी बिना खाए-पिए अंडों पर बैठी रही। लगभग बीस दिन बाद उन अंडों में से छोटे बच्चे निकलने लगे। अब सबकी खुशी का ठिकाना न रहा। तीनों मिलकर बच्चों की देखभाल करने लगे।
महीने बीत चुके थे,अब बच्चे भी बड़े हो गए हैं। फिर भी वे हमेशा माता-पिता के संग ही घूमते रहते थे। उस दिन भी सभी एकसाथ खेल रहे थे, कभी पेड़ की छाँव में बैठे कभी इधर-उधर दौड़ते। ठीक उसी समय राजहंस की नजर जंगलों में छिपे नेवले पर पड़ी।  वो बतखों पर नज़र टिकाए खड़ा था। राजहंस ने चुपके से सबको बात बता दी। तब सबने एकसाथ शोर मचाते हुए उसे भगा दिया। ऐसे ही वे हमेशा मिल-जुलकर एक साथ रहने लगे। सबने अपने शत्रुओं से जीत हासिल करके ‘एकता में बल’ की बात को साबित कर दिया।

परिचय:श्रीमती वाणी बरठाकुर का जन्म-११ फरवरी और जन्म स्थान-तेजपुर(असम)है। इनका साहित्यिक उपनाम ‘विभा’ है।  वर्तमान में शहर तेजपुर(शोणितपुर,असम)में निवास है। स्थाई पता भी यही है। असम प्रदेश की विभा ने हिन्दी में स्नातकोत्तर,प्रवीण (हिंदी) और रत्न (चित्रकला)की शिक्षा पाई है। इनका कार्यक्षेत्र-शिक्षिका (तेजपुर) का है। श्रीमती बरठाकुर की लेखन विधा-लेख,लघुकथा,काव्य,बाल कहानी,साक्षात्कार एवं एकांकी आदि है। प्रकाशन में आपके खाते में किताब-वर्णिका(एकल काव्य संग्रह) और ‘मनर जयेइ जय’ आ चुकी है। साझा काव्य संग्रह में-वृन्दा,आतुर शब्द तथा पूर्वोत्तर की काव्य यात्रा आदि हैं। आपकी रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में सक्रियता से छपती रहती हैं। सामाजिक-साहित्यिक कार्यक्रमों में इनकी  सक्रिय सहभागिता होती है। विशेष उपलब्धि-एकल प्रकाशन तथा बाल कहानी का असमिया अनुवाद है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-नूतन साहित्य कुञ्ज है। इनकी विशेषज्ञता चित्रकला में है। माँ सरस्वती की कृपा से आपको सारस्वत सम्मान (कलकत्ता),साहित्य त्रिवेणी(कोलकाता २०१६),सृजन सम्मान(पूर्वोत्तर हिंदी साहित्य अकादमी,तेजपुर २०१७), महाराज डाॅ.कृष्ण जैन स्मृति सम्मान (शिलांग),बृजमोहन सैनी सम्मान (२०१८) एवं सरस्वती सम्मान(दिल्ली) आदि मिल चुके हैं। एक संस्था की अध्यक्ष संस्थापिका भी हैं। आपकी रुचि-साहित्य सृजन,चित्रकारी,वस्त्र आकल्पन में है। आप सदस्य और पदाधिकारी के रुप में कई साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-हिंदी द्वारा सम्पूर्ण भारतवर्ष एक हो तथा एक भाषा के लोग दूसरी भाषा-संस्कृति को जानें,पहचान बढ़े और इससे भारत के लोगों के बीच एकता बनाए रखना है। 

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