ऐसे लाएं रिश्तों में मिठास

शैलश्री आलूर ‘श्लेषा’ 
बेंगलूरु (कर्नाटक राज्य)
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मानव सामाजिक प्राणी है। समाज मानव से बना है, प्रकृति का एक हिस्सा मानव है। जब सृष्टिकर्ता ने मानव को बनाया,तभी से मानव एक-दूसरे के साथ रहने का आदी बन गया। उसके इर्द-गिर्द,आसपास के लोगों को अपना बनाने लगा और उनके साथ एक सुखद,सुमधुर, खुबसूरत रिश्ता जोड़,पारिवारिक सदस्यों का महत्व जानकर रहने लगा है।
जब तक मानव की आयु भगवान ने तय की है तब तक तो सबको जीना ही होगा। इस जिंदगी को खुशी से जीने के लिए रिश्तों की जरूरत है। रिश्ता निभाना जितना जरुरी है, उसे बरसों तक ले जाना भी उतना ही जरूरी है।

रिश्ते खासकर दो तरह के होते हैं-
पारिवारिक रिश्ता तथा व्यावहारिक या सामाजिक रिश्ता। पारिवारिक रिश्ता यानी कि परिवार के सदस्यों के साथ निभाने वाला रिश्ता जो खून का रिश्ता कहलाता है। इसके अंतर्गत मां,पिताजी,दीदी,भाई,बहन,चाचा,चाची,नाना, दादा,पति,पत्नी आदि सदस्य इस पारिवारिक संबंध को निभाते हैं। एक परिवार सुखद परिवार तब बनता है,जब ये सभी लोग एक-दूसरे के साथ प्यार से रहकर संस्कारी जीवन अपनाते हैं। इन सबका रिश्ता बहुत ही खास है।
दूसरा व्यावहारिक या सामाजिक रिश्ता,जो सगे संबंधी न होने पर भी उनके जैसे ही या उनसे भी ज्यादा प्यार देते हैं। प्रायशः कुछ काम के या व्यवहार से सिलसिले में इनसे मित्रता या रिश्ता बना रहता है,पर वह सिर्फ काम के लिए सीमित न रहकर उससे भी कई ज्यादा बन जाता है। इसमें पाठशाला के मित्र,सहेली और कार्यालयों में साथ काम करनेवाले आदि हैं।
अब साहित्यिक रिश्ता ही लीजिए, एक साहित्य मंच पर अनेक राज्यों के सदस्यों का हर दिन मेल-मिलाप, वार्तालाप होने से कुछ ही दिनों में वे सब उस मंच यानी उस साहित्यिक परिवार का हिस्सा बन जाते हैं। उनका मिलन भी होता है। सब एक-दूसरे से परिचित बन खुश भी होकर उस रिश्ते को दीदी,गुरू,भाई, मित्र जैसे कई नाम देकर सब एक रिश्ते में बंध जाते हैं।
अब ये देखते हैं कि इन रिश्तों में मिठास कैसे लाएं, तो इसके लिए हमें कुछ नियम अपनाने होंगे,जो बहुत सरल हैं।

हमें एक दूसरे के लिए जीना चाहिए,
प्यार देने से प्यार वापिस मिल जाता है-सिर्फ प्यार पाना ही नहीं,देना भी जरूरी है,
रिश्ता निभाने के लिए थोड़ा-से संयम की आवश्यकता है, क्योंकि इसके न रहने से संबंध बिगड़ सकते हैं,
अगर अहम को मन में जगह देकर रिश्ता निभाना चाहते हैं तो यह असंभव है। हमारा अभिमान रिश्तों को दूर करता है,
सबसे खास बात,सबके साथ हंसते हुए जीना सीखो, क्योंकि हमारी हंसी सबको हमारे पास लाती है,
गुस्सा,दुरभिमान,दुर्गुण रिश्ते निभाने नहीं देते हैं,
परिवार में रहे हर एक सदस्य की विभिन्नता को जानकर उनका आदर करने से रिश्ते में मिठास खुद-ब-खुद आ जाती है,
एक-दूसरे की रुचियों की,इच्छाओं की कदर करना सीखिए,
परिवार और समाज में सबका अपना ही एक मूल्य होता है,चाहे बड़े हों या छोटे-सबको सबका आदर-सम्मान करना चाहिए,
संस्कारी गुणों को अपनाना बहुत जरूरी है
अगर इन नियमों का पालन हम सब करते हैं,तो रिश्ते में मिठास बहुत दिनों तक रहती है।
चार दिन की जिंदगी में सबके साथ एक अच्छा और सौहार्दपूर्ण रिश्ता निभाकर जाना चाहिए। क्या पता मरने के बाद हमारे बनाए हुए रिश्ते ही हमें कंधा दे…।

परिचय-शैलश्री आलूर का साहित्यिक उपनाम-श्लेषा हैl आपकी जन्मतिथि २ सितंबर तथा जन्म स्थान-बादामी हैl वर्तमान में आप देवीनगर(बेंगलूरु)में निवासरत हैं,और यही स्थाई पता भी हैl कर्नाटक राज्य की निवासी शैलश्री आलूर ने एम.ए. और बी.एड. सहित एम.फिल. तथा पी.एच-डी की शिक्षा भी हासिल की है। आपका कार्य क्षेत्र-प्रौढ़ शाला में हिंदी भाषा शिक्षिका का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप अनेक कवि सम्मेलनों में भागीदारी करके सम्मानित हो चुकी हैं। आपकी लेखन विधा-तुकांत-अतुकांत,हाईकु,वर्ण पिरामिड,कहानी, लघुकथा,नाटक,संस्मरण,लेखन,रिपोर्ताज और गीत आदि है। आनलाइन स्पर्धा में आपको महादेवी वर्मा सम्मान(संस्मरण के लिए),प्रताप नारायण मिश्र सम्मान सहित खुर्रतुल-ए-हैदर सम्मान,मुन्शी प्रेमचंद सम्मान भी मिला हैl आप ब्लॉग पर भी कविताएं लिखती हैं। विशेष उपलब्धि एक मंच द्वारा `श्लेषा`,दूसरे मंच द्वारा `लता` उपनाम अलंकरण तथा `श्रेष्ठ समीक्षक` सम्मान मिलना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन की भावनाओं को कलम का रूप देना,साहित्य के जरिए समाज में प्रगति लाने की कोशिश करना और समाज में व्याप्त समस्याओं को बिंबित करके उनका हल करना हैl

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