औरत होने की सजा

सुनीता सिंह
दालखोला(प.बंगाल )
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जब तक थी मैं,माँ के गर्भ में,
भेद न जहाँ में,मेरा कोई कर सका।
धरती पे पड़ते ही,कदम ज्यों,
लड़की है,लड़की जन्मी है,लड़की!
अब भी धीमी तान क्यों सुनाई देती।
अपने ही घर-आंगन,अपनों को ही,
खुलेआम भेद-भाव करते,दिखता नज़ारा,
ठेस हृदय में,ज्ञात होती जब यह
रिश्तों के अनगिनत रुप में है औरत।
पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला रही,
अकेली बाहर निकलते,सहमी क्यों औरत।
नोंचा जाती आबरु जिसकी,
आरोप उसी पे लगाता जमाना।
उँगली उठती,पहनावे पे जिसके,
वह निर्दोष-सी,लाचार है औरत।
मासूमों को भी अपना शिकार बनाते,
उसपे पाँच मीटर की साड़ी कैसे लपेटे औरत।
जहाँ चाँद पे पहुँच गई औरत,
वहीं किसी अँधेरे में बिक रही औरत।
अब भी बाबुल हाथ जोड़ शीश झुकाते,
हिफाजत में,जिसके वह है औरत।
सासरे में करती जब उत्पीड़न का विरोध,
माँ-बाप ने क्या सिखाया-सवाल करते
जिसपे,वह है सर्वगुण सम्पूर्ण औरत,
आत्म सम्मान के साथ जीने की चाहत तो रखती
घर न बसा पाई,ताना सुनती औरत।
संतान सह अर्धांगिनी को ठुकराते भी,
जो पति की नहीं,किसी की नहीं
तोहमत लगाते जिसपे,वह है औरत।
इंसाफ के लिए अगर अदालत जाते,
दिख पड़ती,जो उनमें है औरत।
माँ न बन सके,तो सम्पूर्ण नहीं जो है औरत!
हो साँवली तो,कोई अभिशाप नहीं,
जिसपे ताना देते,वह है औरत।
कोयले-सा काला हो दूल्हा,पर क्या,
दूध-सी गोरी दुल्हन सबकी चाह।
आती बारी जब विवाह की क्या खूब!
तौला-मोला जाता मानो,
किसी बनिये की वस्तु हो औरत।
जहाँ सजा़ न मिली हो,
कहीं जन्मी है ऐसी औरत…ll

परिचय-सुनीता सिंह की जन्म तिथि ४ मई १९८४ तथा जन्म स्थान दालखोला है। आपका वर्तमान निवास राज्य पश्चिम बंगाल स्थित जिला उत्तर दिनाजपुर के दालखोला(श्री अग्रसेन महाविद्यालय)में है। स्थाई पता भी यही है। आपने एम.ए.(हिन्दी)किया है और पेशे से कार्यक्षेत्र में प्राध्यापिका हैं। सामाजिक गतिविधि में नारी सशक्तिकरण के लिए कई कार्य करती हैं। सुनीता बंग की लेखन विधा-कविता और लेख है। २ साझा काव्य संग्रह में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है,और जल्दी ही एकल संग्रह की तैयारी है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक कल्याण और हिंदी भाषा की बेहतरी है।

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