और दंभ के मारे लोग…!

अनुपम आलोक
उन्नाव(उत्तरप्रदेश)
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झूठे यश की आत्ममुग्धता,
और दंभ के मारे लोग।
कदम-कदम पर घूम रहे हैं,
धरती पर दुखियारे लोग।
पग धरती पर नयन गगन में,
कंचन मृग की चाह लिए।
मुट्ठी में मृगतृष्णा बांध,
सकल जगत की डाह लिए।
कैसा हुआ विडंबित जीवन,
चिंतन मन का पथराया है-
हाथ पसारे पंचवटी में,
मांग रहे मतिमारे लोग।
झूठे यश की आत्ममुग्धता,
और दंभ के मारे लोग।
मन मलीन,तन धवल,हृदय में,
किंचित भी परमार्थ नहीं।
छल प्रपंच से लक्ष्य भेदते ,
बाहों में पुरुषार्थ नहीं।
छोड़ साधना,लिए याचना,
मंदिर-मंदिर भटक रहे-
लगा मुखौटा अभिनय करते,
कर्म पथों पर हारे लोग।
झूठे यश की आत्ममुग्धता,
और दंभ के मारे लोग।
कीर्ति-कीर्ति से कुंठित होकर,
झूठे ढोंग रचाती है।
पार्थ और कुरुवंश साथ लख,
मानवता शर्माती है।
मुख में गीता,हृदय हलाहल,
आँखों में कंचन काया-
दोनों हाथों धरती का सुख,
लपक रहे रतनारे लोग।
झूठे यश की आत्ममुग्धता,
और दंभ के मारे लोग॥
परिचय-अनुपम ‘आलोक’ की साहित्य सृजन व पत्रकारिता में बेहद रुचि है। अनुपम कुमार सिंह यानि ‘अनुपम आलोक’ का जन्म १९६१ में हुआ है। 
बाँगरमऊ,जनपद उन्नाव (उ.प्र.)के मोहल्ला चौधराना निवासी श्री सिंह ने वातानुकूलन तकनीक में डिप्लोमा की शिक्षा ली है। काव्य की लगभग सभी विधाओं में आप लिखते हैं। गीत,मुक्तक व दोहा में विशेष रुचि है। आपकी प्रमुख कृतियाँ-तन दोहा मन मुक्तिका,अधूरी ग़ज़ल(साझा संकलन)आदि हैं। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपको सम्मान में साहित्य भूषण,मुक्तक प्रदीप,मुक्तक गौरव,मुक्तक शास्त्री,कुण्डलनी भूषण, साहित्य गौरव,काव्य गौरव सहित २४ से अधिक सम्मान हासिल हुए हैं।

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