…और माँ स्तब्ध रह गई

रश्मि चौधरी ‘रिशिमा’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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घुटनों से रेंगते-रेंगते कब मैं बड़ी हो गई,पता ही नहीं चला। माता- पिता और चार भाई-बहनों का परिवार है हमारा। पिताजी का तबादला होता रहता था,अतः हम चारों भाई-बहन माँ के साथ ही ज्यादा रहे। मेरी माँ का सबसे बड़ा सपना था कि अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाएं और उन्होंने ये कर दिखाया।
माँ की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है कि हम सभी भाई-बहन निडर हैं।भूत,प्रेत,जादू,टोने-टोटके में हमारा किसी का विश्वास नहीं है। माँ ने हम लोगों को गंडे-ताबीजों से दूर ही रखा। ऐसा नहीं कि वे नास्तिक हैं,परन्तु उनकी सोच बड़ी वैज्ञानिक है। मुझे याद नहीं कभी उन्होंने हमारी नज़र भी उतारी हो। माँ ने हम सबको बड़ा ही निडर और हिम्मती बनाया है।
बात उस समय की है,जब परिवार कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा था। माँ बहुत बैचैन रहती थीं।  क़रीब ग्यारह बजे का समय था,मैं विद्यालय जाने के लिए तैयार हो रही थी,तभी बाहर कोई डरावना-सा भिखारीनुमा फ़कीर आया। माँ बाहर ही थी,उसके कहने पर न जाने क्यों उन्होंने अपनी हथेली आगे कर दी। शायद मानसिक रूप से परेशान होने पर व्यक्ति जानकर भी गलती कर बैठता है,उसने माँ की हथेली पर गणेशजी की मूर्ति रख दी और कहा-‘इसको घर में रख आओ और मुझे पानी भी पिला दो…तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे।’ मैंने अंदर से देखा कि वह फ़क़ीर बार-बार घर के अंदर देख रहा था और उसकी निगाह माँ की सोने की चैन पर थी। वह फ़क़ीर समझ रहा था,माँ घर पर अकेली हैं। मैं तुरंत बाहर आई और जोर से उस फकीर पर चिल्लाई कि-‘ तुम अंदर कैसे आए ? कोई पानी नहीं पिलाना है हमें।’ वो तुरंत भाग गया। तब हमने देखा कि उसके कुछ साथी थोड़ी दूर रिक्शा में बैठे हैं,माँ इस अप्रत्याशित घटना से स्तब्ध थी। कुछ अनहोनी होने वाली थी,ये सोचकर माँ रोने लगी…पर कुछ देर में सामान्य हो गई।
अाज भी इस घटना को याद कर मैं और मेरी माँ सिहर जाते हैं। आज भी उस फ़क़ीर का वीभत्स चेहरा हमें याद है। तब मैंने जाना कि माँ ने हमें कितनी सही शिक्षा दी है। मेरी हर उपलब्धि में माँ की खुशी छुपी है,अतः बस यही चाहती हूँ कि माँ को हर ख़ुशी दे पाऊं।
बरबस ही मुझे मुनव्वर राणा जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
‘ऐ अँधेरे!! देख ले तेरा मुँह काला हो गया,
माँ ने आँखें खोल दी,घर में उजाला हो गया।’

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