कब के बिछड़े हुए…आज कहाँ आ के मिले

विनोद वर्मा `आज़ाद`
देपालपुर (मध्य प्रदेश) 

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नगर सेठ ने अपने बेटे की शादी बहुत धूमधाम से की। अच्छे परिवार की गुणवान बेटी को बहू के रूप में पाकर सेठ जी ने घर की चाबी राजरानी को थमा दी और निकल गए चार धाम की यात्रा पर।
     राजेश्वर और राजरानी जैसे एक दूजे के लिए ही बने थे। दोनों एक-दूसरे का बहुत ख़्याल रखते थे। किसी को भी थोड़ी-सी परेशानी होती तो उदास हो जाते और घर के सारे नौकरों को दौड़ लगवा देते।
     प्रेमपूर्वक जीवन-यापन चल रहा था। दिनभर नौकरानियां काम करती रहती और सेठ-सेठानी को हर बार कुछ नया बनाकर खिलाती रहती। सेठानी दिनभर खाना-पीना कर गद्दे पर आराम करती रहती,जबकि सेठ दिनभर काम में व्यस्त रहते। खूब मेहनत करते,अपने पिता के कारोबार को बहुत बढ़ा लिया था। दोनों पति-पत्नी के दिन खूब मजे से कट रहे थे,प्रेम भी अटूट बन्धन-सा था।
        एक रात सेठानी के शरीर मे सूल चुभना शुरू हुई। रातभर सो नहीं पाई। प्रातः सेठ राजेश्वर ने सेठानी राजरानी को नगर वैद्य को बुलाकर उनकी परेशानी बताई,तब वैद्य ने उन्हें कुछ दवाई दी। दो रात आराम के बाद पुनः परेशानी हुई,फिर दूसरी दवाई दी।
       फिर रोज-रोज तकलीफ बढ़ती गई। कई चिकित्सक,वैद्य,नीम-हकीम को बताया,लेकिन कोई भी उन्हें ठीक नहीं कर पाया। सेठ बहुत परेशान रहने लगे,सेठानी को तकलीफ बढ़ती जा रही थी। कोई भी दवाई लाग नहीं कर रही थी। फिर एक नौकर ने सुझाया कि सेठानी जी को मोटे गद्दे पर सुलाया जाए,दो दिन मोटे गद्दे पर आराम मिला, तीसरे दिन से पुनः सूल चुभना शुरू।
      फिर एक नौकरानी ने कहा-सेठानी जी को फूलों की सेज पर सुलाया जाए तो आराम मिल सकता है,वही किया गया,आराम भी मिला। प्रति रात्रि फूलों की मात्रा बढ़ाते गए,किन्तु कब तक और कितनी ?
     पुनः सेठानी का चीखना-चिल्लाना शुरू। फिर एक बुजुर्ग ने सुझाया-सेठानी को इनके मायके भेज दो,शायद पानी बदल होने से ठीक हो जाएं।
     राजेश्वर ने यात्रा का प्रबंध कर राजरानी को कुछ सखियों (नौकरानियों को सखी यानी बहनों के रूप में मानती थी और उन सभी से बहुत प्रेम भी करती थी) को उनके पीहर के लिए रवाना किया। विभिन्न साधनों से सफर करते हुए रास्ते मे पड़ने वाली नदी की बहती धारा पर नाव से अब सफर प्रारम्भ हुआ। वर्षों बाद पीहर जाने की खुशी में ऐसा लग रहा था,सेठानी का दर्द कम हो रहा है। तेज हवा का चलना,नाव डगमग करते हुए अपने गंतव्य की और बढ़ रही थी। रोमांचक सफर में सारी सखियाँ उनसे मायके की बातें पूछ रही थी कि वहां क्या-क्या है ? कोई मन्दिर,बगीचा, आम के बड़े-बड़े पेड़ ? तो राजरानी बता रही थी नारियल का झुंड लिए ऊंचे -ऊंचे आकाश को छूते पेड़ है वहां,मीठे और लाल अमरूद,बादाम,काजू के पेड़,इसी बीच एक सखी बोली-अरे मैं तो एक पोटली बादाम बांध लाऊंगी वहां से,तो दूसरी बोल पड़ी मैं तो एक नारियल का थैला लाकर अपने गांव के मंदिर पर दुकान लगा लूंगी। सेठानी उन सब की बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती। वे तो बातों में इतनी मशगूल थी कि दूर से आ रहे हवाई तूफान का उन्हें ज़रा भी भान नहीं हुआ और नाविक कुछ बोल पाता, तब तक नाव ऊंची-ऊंची लहरों से हिचकोले खाकर पलट गई।
        एक बूढ़ा व्यक्ति और उसकी बूढ़ी पत्नी जो कम आयु के होकर भी उम्र दराज़ लग रहे थे,एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। वे बेख़ौफ नदी किनारे विचरण करते,पास के इलाके में जाकर मज़दूरी करते और पुनः अपनी झोपड़ी में आकर दाना-पानी ग्रहण करते। वर्षों पूर्व उनकी एक बेटी नदी में बह गई थी,उसकी आस में(याद में) वे नदी किनारे ऊंचाई पर झोपड़ी बनाकर रहते थे। प्रातः काल दैनिक क्रिया करते हुए जब स्नान करने के लिए वृद्ध जाने को उधृत हुए तो अचानक एक बेजान-सी महिला पर निगाह पड़ी,जो किनारे पर पड़ी थी। बूढ़ा जोर से चिल्लाया-रानी की माँ देख,तेरी बेटी आ गई,तेरी बेटी आ गई…।
     बूढ़ी महिला जिसकी आंखों के चारों और काली झाई पड़ गई थी,शायद बेटी के गम में रो-रोकर ही ऐसा हुआ होगा! वह बेतहाशा दौड़ते हुए नदी के किनारे पहुंची और उस महिला को दोनों वृद्ध उठाकर झोपड़े में लाए। नाड़ी और हृदय की धड़कन चल रही थी,किन्तु ठंडे पड़ चुके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की मालिश करना शुरू कर दिया। चूंकि पेट हल्का ही था,इसलिए उन्हें लग गया कि पानी पेट में नहीं भराया है पर ठंड के कारण शरीर अकड़-सा गया था।
बूढ़े व्यक्ति ने झट से अंगीठी जलाई और हाथ पैर सिर पेट को कपड़े की बॉल से  तवे पर रख-रखकर शरीर को गर्माने लगा।
        दोनों बातें करते हुए मालिश करते हुए और कपड़े की गर्मी देते जा रहे थे,शरीर में हलचल होने लगी। बूढ़ी बोली -देखा भगवान ने आज हमारी सुनली,हमारी रानी आज हमारे पास वापस भेज दी।
बच्ची के रूप में गई थी,गंगा मैया की गोद में बड़ी होकर वापस हमारे पास आ गई है।
     तो बूढा बोला-रानी की मां,मैं तो भोले बाबा से हमेशा मन्नत मांगता और कहता–है भोले भंडारी तू हमारी सुन ले,मेरी रानी बेटी को वापस ला दे। फिर चाहे तो मेरे प्राण हर ले,पर मेरी बेटी को उसकी मां से मिला दे,तो आज हमारी पुकार भोले बाबा ने सुन ली।
      बूढ़ी भी कहने लगी-मैं तो मालवा की रानी से अपनी रानी को वापस करने की गुहार लगाती थी। मैया पार्वती ने ही तो भोले बाबा को मनाया होगा! और अब जा के भोले बाबा माने होंगे और आज हमारी रानी बेटी को वापस भेज दिया।
      उनकी बातों-बातों में उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि वह अल्हड़-सी रानी उनकी सारी बातें सुन रही है और दो बार आंख भी खोलकर उन्हें देखकर मुस्कुराई है।
    ‘वर्षों के बिछड़े हुए आज…कहाँ आ के मिले’ ये दोनों के मनोभावों से प्रकट हो रहा था।
     बूढ़ी माता ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा और अपनी गुमी हुई बेटी ही मानकर ढेर सारे चुम्बन जड़ दिए। बाप यानी वृद्ध ने भी प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए उसे रानी बिटियां कहते हुए आंखों से बहते नीर के साथ अपनी छाती से लगा लिया। तब वृद्धा की आंखें भी छल-छला आई। काफी देर के बाद जब सारे आंसू सूख गए,तब बूढ़ी को ध्यान आया-अरे मेरी बेटी भूखी होगी ? उसने जल्दी-जल्दी रोटी-चटनी बनाई और बेटी को दोनों अपने हाथों से खाना खिलाने लगे। उन दोनों का प्रेम देखकर राजरानी खाना खा रही थी,और उनकी हर बात पर गौर कर सोच भी रही थी।
    उसके माता-पिता तो बचपन में ही मर गए थे,भाई ने पाला था। उसके स्मृति पटल पर मायका चल रहा था और इधर ये दूसरा मायका तैयार हो गया था।
      खाना खाकर उसने उन दोनों से भी खाना खाने का कहा और वह थोड़ा उठकर चलने लगी। झोपड़ी के बाहर आकर उसने खूबसूरत नजारा देखा। दिल में बैठी तूफान की दहशत सूर्य की तेज रोशनी और पेड़ों की लंबी होती परछाई देखकर कम हो रही थी।
      दूसरे दिन सुबह वह भी अपने बूढ़े मां-बाप के साथ काम करने के लिए चल पड़ी। कहने लगी-मैं अकेली यहां क्या करूँगी ? मैं भी काम करूँगी तो ज्यादा रुपए आएंगे। सुबह से शाम तक वह  दोनों बुज़ुर्गवार के साथ काम करती रही। वापस शाम को झोपड़े में आई और थकान के कारण सुस्ताने के लिए जमीन पर ही लेट गई। उसकी आंख लग गई। फिर बूढ़ी मां ने उठाया और उसे अपने हाथों से भोजन कराया। भोजन के बाद पुनः खुली जमीन पर ही लेट गई और उसे गहरी नींद लग गई।
     इस प्रकार वह रोज काम पर जाती, शाम को लौटती और जमीन पर लेट जाती। नींद आ जाती,फिर उसको बूढ़े माँ-बाप उठाते और रोटी-चटनी खिलाते।  फिर खुद खाते और वह भी नींद के आगोश में समा जाते। इससे उसकी बीमारी रफूचक्कर हो गई थी। काम करते हुए थकान के कारण उसके सूल का दर्द जाता रहा।
       काफी दिनों के बाद उनको आज मजदूरी की रकम मिलने वाली थी। तहसीलदार ‘मनरेगा’ की मजदूरी अपने सामने बंटवाने के लिए आते थे।
     शाम को तहसीलदार आए। सब मजदूरों को मज़दूरी दे रहे थे,जब रानी और माता-पिता (वृध्दजनों)  के पास आए तो रानी पर निगाह पड़ते ही तहसीलदार के मुंह से निकल पड़ा !! दीदी….और आश्चर्य,अवाक़् से रह गए सभी। ‘कब के बिछड़े हुए आज कहाँ आ के मिले…।’
      फिर सभी जनों के बीच बहुत सारी  बातें हुई। दोनों माँ-बाप को रानी उर्फ राजरानी अपने साथ ले गई।
परिचय-विनोद वर्मा का साहित्यिक उपनाम-आज़ाद है। जन्मतिथि १ जून १९६२ एवं जन्म स्थान देपालपुर (जिला इंदौर,म.प्र.)है। वर्तमान में देपालपुर में ही बसे हुए हैं। श्री वर्मा ने दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर सहित हिंदी साहित्य में भी स्नातकोत्तर,एल.एल.बी.,बी.टी.,वैद्य विशारद की शिक्षा प्राप्त की है,तथा फिलहाल पी.एच-डी के शोधार्थी हैं। आप देपालपुर में सरकारी विद्यालय में सहायक शिक्षक के कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत साहित्यिक,सांस्कृतिक क्रीड़ा गतिविधियों के साथ समाज सेवा, स्वच्छता रैली,जल बचाओ अभियान और लोक संस्कृति सम्बंधित गतिविधियां करते हैं तो गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षण सामग्री भेंट,निःशुल्क होम्योपैथी दवाई वितरण,वृक्षारोपण,बच्चों को विद्यालय प्रवेश कराना,गरीब बच्चों को कपड़ा वितरण,धार्मिक कार्यक्रमों में निःशुल्क छायांकन,बाहर से आए लोगों की अप्रत्यक्ष मदद,महिला भजन मण्डली के लिए भोजन आदि की व्यवस्था में भी सक्रिय रहते हैं। श्री वर्मा की लेखन विधा -कहानी,लेख,कविताएं है। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचित कहानी,लेख ,साक्षात्कार,पत्र सम्पादक के नाम, संस्मरण तथा छायाचित्र प्रकाशित हो चुके हैं। लम्बे समय से कलम चला रहे विनोद वर्मा को द.साहित्य अकादमी(नई दिल्ली)द्वारा साहित्य लेखन-समाजसेवा पर आम्बेडकर अवार्ड सहित राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा राज्य स्तरीय आचार्य सम्मान (५००० ₹ और प्रशस्ति-पत्र), जिला कलेक्टर इंदौर द्वारा सम्मान,जिला पंचायत इंदौर द्वारा सम्मान,जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा सम्मान,भारत स्काउट गाइड जिला संघ इंदौर द्वारा अनेक बार सम्मान तथा साक्षरता अभियान के तहत नाट्य स्पर्धा में प्रथम आने पर पंचायत मंत्री द्वारा १००० ₹ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही पत्रिका एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित हुए हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-एक संस्था के जरिए हिंदी भाषा विकास पर गोष्ठियां करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा के विकास के लिए सतत सक्रिय रहना है।

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