कमजोरियों पर कटु प्रहार करने वाले संत

डाॅ.देवेन्द्र जोशी 
उज्जैन(मध्यप्रदेश)

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स्मृति शेष मुनि तरूण सागर जी …………………………..


अपने कड़वे प्रवचनों से समाज सुधार का अलख जगाने वाले दिगम्बर जैन मुनी तरूण सागर जी का देवलोक गमन हो गयाा। वे एक ऐसे संत के रूप में सदा याद किए जाएंगे जिनने अपनी कृष काया के बावजूद सामाजिक विसंगतियों पर जबरदस्त प्रहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक आध्यात्मिक संत होते हुए भी सामाजिक- राजनीतिक चेतना को झकझोरने में उन्होंने जो योगदान दिया,उसे कभी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा। भारत में संतों,आचार्यों और समाजसुधारकों की जो समृद्ध परम्परा रही है उसे और समृद्ध करने में जैन मुनि तरूण सागर जी का अवदान किसी प्रखर प्रज्ञा चेतनाशील महामानव से कम नहीं है। जहाँ आम जैन संत राजनीति और नेताओं से दूरी बनाए रखते हैं,वहीं तरूण सागर जी ने कभी किसी पेशे के लोगों से कोई परहेज नहीं किया। राजनीति से तो बिलकुल नहीं। यही वजह है कि उनकी धर्म सभाएं आम भक्तों के बीच ही नहीं,  राजनेताओं,जेल के कैदियों और अन्य वर्ग के लोगों के बीच भी हुई। वे संभवतः पहले संत थे जिन्होंने राज्य की विधानसभाओं में भी अपनी अमृत वाणी से ज्ञान वर्षा कर राजनीति के आंगन में धर्म का परचम लहराने का काम किया। २६ जून १९६७ को मध्यप्रदेश के दमोह जिले में जन्मे तरूण सागर जी का पूर्व नाम पवन कुमार जैन था। छठी तक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात महज १३ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और २० जुलाई १९८८ को युग संत आचार्य पुष्पदंत जी महाराज से दीक्षा गृहण कर वे मुनि बन गए। आध्यात्मिकता के प्रति रूचि उनमें बचपन से ही थी। जैन धर्म के दो हजार वर्षों के इतिहास में आचार्य भगवंत कुन्दकुन्द के पश्चात इतनी कम आयु में संन्यास गृहण करने वाले वे पहले राष्ट्र संत थे। उन्हें विश्व प्रसिद्धि तब मिली,जब उनके प्रवचन ‘महावीर वाणी’ का दिल्ली के लाल किले से प्रसारण हुआ जिसे १२२ देशों में दिखाया गया। प्रवचन के अलावा उनके विचार उनके असंख्य अनुयायियों के बीच पहुंचने का जरिया उनकी संस्था का मुख पत्र ‘अहिंसा महाकुंभ’ (मासिक)भी रहा। कत्लखानों और मांस निर्यात के विरोध में वे लगातार अहिंसात्मक वैचारिक आन्दोलन की अगुवाई करते रहे। उनकी पहचान देश में सर्वाधिक सुने और पढ़े जाने वाले संत के रूप में रही। उनके ओजस्वी धारा प्रवाह प्रवचन आम जनमानस को सदा आन्दोलित और उद्धेलित करते रहे। उनकी प्रवचन देने की विशिष्ट शैली के उनके चाहने वाले कायल थे। पहले सामान्य तरीके से विषय को उठाना फिर कुशल अध्यापक की तरह उसे बार-बार दोहरा कर समझाना,जब श्रोता का ध्यान पूरी तरह गिरफ्त में आ जाए तो उसी बात को लगभग चीखने वाले अंदाज में उतनी ही तेज गति के साथ बोलते हुए एकदम खामोश हो जाना। उनका यह अनूठा अंदाज हजारों-लाखों की संख्या में जुटने वाले अनुयायियों की धर्मसभा में विशेष आकर्षण का केन्द्र होता था। प्रवचन देते हुए बच्चों जैसी मोहक मुस्कान बिखेरना और गाल पर हाथ धरकर एकदम चुप हो जाना उनका अपना विशिष्ट भाव था जो श्रोताओं को बहुत भाता था। यही नहीं,गंभीर से गंभीर बात को सहज हास-परिहास के माध्यम से व्यक्त कर देना और मुल्ला नसरूद्दीन के किस्सों और मजेदार चुटकले तथा बोध कथाओं से प्रवचन की बोझिलता कम कर जीवन सुधार की सीखभरी बातें चुटीले अंदाज में कह देना तरूण सागर जी की अपनी मौलिक शैली थी,जो उन्हें अन्य प्रवचनकारों से अलग करती है। जहाँ ज्यादातर धर्म प्रचारक लोक-परलोक,जीवन-मरण,आत्मा-परमात्मा और दान-धर्म की चर्चा अपने प्रवचनों में करते हैं,वहीं तरूण सागर जी के प्रवचन इस सबसे अलग सामाजिक मुद्दों और जीवन सुधार पर केन्द्रित होते थे। वे रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़े प्रसंगों पर आधारित दृष्टांतों से समाज की विसंगतियों और विद्रुपताओं पर इतना कटु प्रहार करते थे कि सुनने वाले पानी-पानी हो जाते थे। इसीलिए उनके विचारों को कड़वे प्रवचनों की संज्ञा दी जाती है। उनकी शैली आदर्शात्मक न होकर व्यंग्यात्मक होने के कारण उनकी कही गई बात की अपील इतनी जबर्दस्त होती थी कि लोग तिलमिला उठते थे,जिसे समाज कड़वे प्रवचनों की संज्ञा देता है। दरअसल हिंसा,भ्रष्टाचार,रूढ़िवादिता के खिलाफ उनके बेलाग कटु प्रहार होते थे,  जिनके मूल में समाज को बेहतरी के रास्ते पर लाने की गंभीर सीख छिपी होती थी। इसीलिए लोग उनके कड़वे प्रवचनों को मीठी लोरी की तरह सुनने के लिए हजारों-लाखों की संख्या में जुटते थे। अपने प्रवचनों के माध्यम से देश के विभिन्न प्रांतों का भ्रमण कर जन-जन में ‘अहिंसा परमो धर्म’ एवं ‘जियो और जीने दो’ का अलख जगाने वाले तरूण सागर जी आमजन में इतने लोकप्रिय थे कि उनके प्रवचन को सुनने सिर्फ जैन धर्म ही नहीं,अन्य समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में जुटते थे। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं,लेकिन उनकी तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें अब भी उनके अनुयायियों का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। इन पुस्तकों की दो लाख प्रतियाँ प्रति वर्ष प्रकाशित होती है,इसलिए उन्हें सर्वाधिक पढ़े जाने वाले संतों में शुमार किया जाता है। संन्यास दीक्षा से लेकर महाप्रयाण तक उनके जीवन का एक ही मकसद रहा-भगवान महावीर के जियो और जीने दो के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना। तलवार की धार की तरह समाज की कमियों और खामियों पर तीव्र वैचारिक प्रहार करने वाले मुनिश्री को अपनी आक्रामक भाषण शैली के कारण ‘क्रांतिकारी संत’ की उपाधि कर्नाटक में मिली,जहाँ वे सन् २००६ में  महामस्तकाभिषेक के अवसर पर पूरे ६५ दिन तक पैदल चलकर बेलगाम से सीधे कर्नाटक पहुंचे थे। राष्ट्र संत वे सन् २००३ में इन्दौर में घोषित किए गए। वे पहले ऐसे जैनाचार्य थे,जिन्हें अनेक राज्यों का राज्य अतिथि होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुनि तरूण सागर जी के संत बनने की दास्तान भी कम रोचक नहीं है। टी.वी. शो ‘आपकी अदालत’ के लिए रजत शर्मा को दिए विस्तृत साक्षात्कार में अपने जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों का बेबाकी से रहस्योद्घाटन करते हुए उन्होंने बताया था कि बचपन में उन्हें जलेबी बहुत पसंद थी। वे जब कक्षा छठी में पढ़ते थे तो एक दिन शाला से लौटते हुए मिठाई की दुकान पर बैठकर जलेबी खा रहे थे। समीप ही किसी पाण्डाल में जैन मुनि के प्रवचन चल रहे थे। प्रवचन में मुनि महाराज भक्तों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि-तुम भी भगवान बन सकते हो। यह वाक्य जैसे ही १३ वर्षीय बालक पवन के कानों में पड़ा,उसका जलेबी का रस तो जाने कहाँ जाता रहा और आध्यात्मिकता का रंग ऐसा चढ़ा कि वे २० वर्ष की उम्र में मुनि तरूण सागर जी बनकर क्रांतिकारी राष्ट्र संत के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे अपने वैराग्य को ईश्वर उपहार मानते थे। सांसारिक लोगों को उनका कहना था कि मैंने भगवान को पाने के लिए घर छोड़ दिया,तुमने संसार को पाने के लिए भगवान को छोड़ दिया। उनका कहना था कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं,कुछ करना पड़ता है। तरूण सागर जी कहते थे कि- मैंने अपने जीवन में कभी मुर्दा नहीं फूंका,लेकिन एक दिन भगवान महावीर मानो मुझसे कह रहे हों कि तुम्हारा जन्म मुर्दा फूंकने के लिए नहीं,समाज में प्राण फूंकने के लिए हुआ है। उनका मानना था कि मुनि वो होता है जो समाज की नग्नता को ढंकने के लिए अपने वस्त्र तक उतार कर फेंक देता है। पिच्छी,जलपात्र (कमण्डल) धारण करने मात्र से कोई मुनि नहीं हो जाता। जिसके पैरों में जूता,सिर पर छाता,बैंक में खाता,परिवार से नाता नहीं हो वह जैन मुनि कहलाता है। जिसके तन पर कपड़े,मन में लफड़े,वचन में झगड़े,जीवन में रगड़े न हो वह जैन मुनि है। उनके अनुसार दिगम्बर जैन मुनि को नाई की,लुहार की,सुनार की,तेली की, मोची की,धोबी की जरूरत नहीं पड़ती। अगर आपको खुद जीना आ गया तो दुनिया को खुद जीना सिखा दोगे,यह है महावीर के जियो और जीने दो का सही अर्थ। कुछ पाने के लिए कुछ और सबकुछ पाने के लिए सबकुछ छोड़ना पड़ता है।

‘मंजिल मिले न मिले ये,  मुकद्दर की बात है।                                                 

हम कोशिश ही न करें,ये तो गलत बात है।

संत जलते हुए दीपक की भांति हैं। उन्हें ऊंचे आसन पर इसलिए बिठाया जाता है कि,  समाज को उनकी रोशनी मिलती रहे। एक बार मुनि तरूण सागर जी से पूछा गया कि अहिंसा के पुजारी की सुरक्षा में हिंसा के बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी की तैनाती कहाँ तक उचित है,तो उनका कहना था कि दीवार पर कुछ न लिखें ये बताने के लिए कुछ लिखना ही पड़ता है। अपने कड़वे प्रवचनों का राज खोलते हुए वे कहा करते थे कि शुरू के १० वर्ष तक जब मैं बहुत मीठा (मधुर) बोलता था तो कोई सुनने ही नहीं आता था। जो गिने-चुने लोग आते,वे भी प्रवचन को लोरी की तरह सुनते थे और पाण्डाल में सो जाते थे। तब एक दिन महावीर ने मुझे कहा ये अंधे-बहरे लोग हैं। इससे मुझे लगा कि दीवार पर कीकनी है तो हथौड़ा तो चलाना ही पड़ेगा। मेरे प्रवचन हथौड़े की तरह हैं। यह मेरी खुशनसीबी है कि मैं कड़वा बोलता हूँ,फिर भी लोग सुनते हैं। संत समाज का पथ प्रदर्शक होता है। उसका गलत को गलत कहना सर्वथा उचित है। सती प्रथा और संथारा (जैन धर्म में मरणासन्न व्यक्ति की मृत्यु प्रक्रिया ) में अंतर बताते हुए तरूण सागर
जी का कहना था कि सती प्रथा में राग है और संथारा में वैराग्य है। अपना बच्चा रोता है तो दिल में दर्द होता है और जब पड़ोसी का बच्चा रोता है तो सिर में दर्द होता है। जीवन को उत्सव बनाना हो तो गीता के पास जाएँ,मृत्यु को महोत्सव बनाना हो तो महावीर के पास जाएँ। त्याग और आसक्ति के अंतर को वे अपने अंदाज वे कुछ इस तरह बताते थे-“जो जनता के द्वारा दी गई कुर्सी को स्वीकारता है,वह राष्ट्रपति बन जाता है और जो उसे ठुकराता है वो राष्ट्रपिता बन जाता है।”

‘जिनमें अकेले चलने के हौंसले होते हैं। 
एक दिन उनके साथ काफिले  होते हैं॥’

अपने प्रवचनों में पारिवारिक घरेलू विषयों की चर्चा के सवाल पर मुनि तरूण सागर जी का कहना था कि मैंने संसार छोड़ा है,समाज नहीं।इसी समाज में रहता हूँ तो उसी के सुधार की बात करना अपना फर्ज मानता हूँ।

‘कोई जागे न जागे ये मुकद्दर उसका।
मेरा फर्ज है आवाज लगाते जाएँ।’ 

परिचय-डाॅ.देवेन्द्र जोशी का निवास मध्यप्रदेश के उज्जैन में हैl जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६२ और जन्म स्थान-उज्जैन (मध्यप्रदेश)है। वर्तमान में उज्जैन में ही बसे हुए हैं। इनकी पूर्ण शिक्षा-एम.ए.और पी-एच.डी. है। कार्यक्षेत्र-पत्रकारिता होकर एक अखबार के प्रकाशक-प्रधान सम्पादक (उज्जैन)हैं। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप एक महाविद्यालय-एक शाला सहित दैनिक अखबार के संस्थापक होकर शिक्षा,साहित्य एवं पत्रकारिता को समर्पित हैं। पढ़ाई छोड़ चुकी १००० से अधिक छात्राओं को कक्षा १२ वीं उत्तीर्ण करवाई है। साथ ही नई पीढ़ी में भाषा और वक्तृत्व संस्कार जागृत करने के उद्देश्य से गत ३५ वर्षों में १५०० से अधिक विद्यार्थियों को वक्तृत्व और काव्य लेखन का प्रशिक्षण जारी है। डॉ.जोशी की लेखन विधा-मंचीय कविता लेखन के साथ ही हिन्दी गद्य और पद्य मेंं चार दशक से साधिकार लेखन है। 
डाॅ.शिवमंगल सिंह सुमन,श्रीकृष्ण सरल,हरीश निगम आदि के साथ अनेक मंचों पर काव्य पाठ किया है तो प्रभाष जोशी,कमलेश्वर जी,अटल बिहारी,अमजद अली खाँ,मदर टैरेसा आदि से साक्षात्कार कर चुके हैं। पत्रिकाओं सहित देश- प्रदेश के प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों में समसामयिक विषयों पर आपके द्वारा सतत लेखन जारी है। `कड़वा सच`( कविता संग्रह),`आशीर्वचन`,आखिर क्यों(कविता संग्रह) सहित `साक्षरता:एक जरूरत(अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष में प्रकाशित शोध ग्रन्थ) और `रंग रंगीलो मालवो` (मालवी कविता संग्रह) आदि आपके नाम हैl आपको प्राप्त सम्मान में प्रमुख रुप से अखिल भारतीय लोकभाषा कवि सम्मान, मध्यप्रदेश लेखक संघ सम्मान,केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड सम्मान,ठाकुर शिव प्रतापसिंह पत्रकारिता सम्मान,वाग्देवी पुरस्कार,कलमवीर सम्मान,साहित्य कलश अलंकरण और देवी अहिल्या सम्मान सहित तीस से अधिक सम्मान- पुरस्कार हैं। डॉ.जोशी की लेखनी का उद्देश्य-सोशल मीडिया को रचनात्मक बनाने के साथ ही समाज में मूल्यों की स्थापना और लेखन के प्रति नई पीढ़ी का रुझान बनाए रखने के उद्देश्य से जीवन लेखन,पत्रकारिता और शिक्षण को समर्पण है। विशेष उपलब्धि महाविद्यालय शिक्षण के दौरान राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद स्पर्धा में सतत ३ वर्ष तक विक्रम विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व और पुरस्कार प्राप्ति हैl आपके लिए प्रेरणा पुंज-माता स्व.श्रीमती उर्मिला जोशी,पिता स्व.भालचन्द्र जोशी सहित डाॅ.शिवमंगल सिंह सुमन,श्रीकृष्ण सरल,डाॅ.हरीश प्रधान हैं। आपकी विशेषज्ञता समसामयिक विषय पर गद्य एवं पद्य में तत्काल मौलिक विषय पर लेखन के साथ ही किसी भी विषय पर धारा प्रवाह ओजस्वी संभाषण है। लोकप्रिय हिन्दी लेखन में आपकी रूचि है।

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