कश्मीर हर हिन्दुस्तानी का

हेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट(मध्यप्रदेश)
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टैग डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी जयंती(६ जुलाई)विशेष………….

डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ऐसे महान देशभक्त थे जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की बलिवेदी पर अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। वह एक साथ ही शि‍क्षाविद्,सासंद,राजनीतिज्ञ और मानवतावादी कट्टर देशभक्त थे। इन्होंने विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की और शीध्र ही एक प्रख्यात शि‍क्षाविद् और प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। उनकी इस उपलब्धि को मान्यता उस समय प्राप्त हुई जब १९३४ में कलकत्ता विश्विद्यालय के कुलपति नियुक्त होने वालों में वह सबसे कम आयु के थे। डॉ.मुखर्जी स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में से थे। उनका जन्म ६ जुलाई १९०६ को हुआ था। वे उन नेताओं में से थे,जो खुद आगे आकर जोखिम झेलते हैं। उनके लिए भारत प्रथम था और भारत की अखण्डता और वैभव ही प्रमुख लक्ष्य था।

जान दे दी,पर कश्मीर जाने नहीं दिया। मंत्रीमंडल को ठोकर मार दी,लेकिन सिंद्धातों से समझौता नहीं किया। ‘हाँ,मैं हिन्दू हूँ’,‘इस देश का राष्ट्रत्व हिन्दू है’ यह अटल सत्य है,पर इसका अर्थ यह नहीं कि हिन्दू किसी दूसरे मजहब या उपासना पद्धति के विरूद्ध है। ऐसा होता तो इतिहास ही कुछ और होता। कश्मीर हर हिन्दुस्तानी का है। हर दिल में कश्मीर के लिए दर्द उठना चाहिए जो हनीफुद्दीन और अजय आहूजा के दिलों में उठा।

डॉ.मुखर्जी ने अपने जीवन और अपने बलिदान,दोनों से ही इस देश को प्राण दिए। उनके लिए भारतीय होने का अर्थ राजनीति के कपट जाल में फॅंसना नहीं,वरन् उस कपट जाल को तोड़ना था। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि आज जो पंजाब और बंगाल का हिस्सा भारत में दिखता है,उसके पीछे डॉ.मुखर्जी का जुझारूपन और आंदोलन मुख्य कारण रहे हैं। डॉ.मुखर्जी के वह शब्द इतिहास में प्रसिद्ध हैं,जब उन्होंने कहा था-‘कांग्रेस ने हिन्दुस्तान का बॅंटवारा किया और मैंने पाकिस्तान का।’ इस देश का दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्र,किन्तु खंडित भारत की कमान उस व्यक्ति के हाथों में सौंपी गई,जिसे भारतीयता किवां हिन्दुत्व से चिढ़ थी और स्वयं को देश का अंतिम ब्रिटिश शासक कहलाने में गर्व का अनुभव करता था।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने देखा कि विभाजन की भीषण त्रासदी झेलकर जो हिन्दू भारत पहुँच रहे हैं,और जो पाकिस्तान में रह गए हैं,उनके प्रति पंडित नेहरू बेहद उपेक्षापूर्ण और बहुत हद तक निर्मम नीति अपना रहे हैं। इस बिन्दु पर सरदार पटेल और पं.नेहरू में गम्भीर मतभेद पैदा हो गए थे। सरदार पटेल तो यहाँ तक चाहते थे कि पूर्वी पाकिस्तान से कुछ जमीन ले लेनी चाहिए। भले ही इसके लिए सशस्त्र पुलिस कार्यवाही ही क्यों न करनी पड़ेl पं.नेहरू ने लियाकत अली से समझौता कर हिन्दूओं के भविष्य को पूरी तरह पाकिस्तानी दरिन्दों के हाथों में छोड़ दिया। यह देखकर डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी आग-बबूला हो उठे और उन्होंने उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री के पद से त्याग-पत्र दे दिया। अपना त्याग-पत्र देते समय उन्होंने इसके पीछे के कारणों का विस्तार से उल्लेख किया,जो आज भी एक ऐतिहासिक तथा प्रेरणास्पद दस्तावेज के रूप में माना जाता है।

मंत्रीमण्डल से त्याग-पत्र देने के बाद डॉ.मुखर्जी ने संसद में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का निश्चय किया, लेकिन वह जल्दी ही समझ गए कि प्रतिपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाने के लिए संगठित दल बनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से वह प्रतिपक्ष के राजनीतिक मंच के गठन की संभावनाओं को तलाशने की ओर अग्रसर हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी किसी सशक्त व्यक्तित्व के नेतृत्व में राजनीतिक दल प्रारंभ किए जाने की जरूरत महसूस कर रहा था। डॉ.मुखर्जी और स्वयंसेवक संघ दोनों ही जिस बात की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे,वह समान थी और इसी में से अक्टूबर १९५१ में भारतीय जनसंघ का उदभव हुआ, जिसके संस्थापक अध्यक्ष डॉ.मुखर्जी थे।

डॉ.मुखर्जी को अपने जीवन में बड़ी चुनौती का समना दो वर्ष बाद १९५३ में करना पड़ा। जम्मू और कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पृथकतावादी राजनीतिक गतिविधियों से उभरी अलगाववादी प्रवृत्यिां १९५२ तक बल पकड़ने लगी थीं,जिससे राष्ट्रीय मानस विक्षुब्ध हो उठा। डॉ.मुखर्जी ने प्रजा परिषद् के सत्याग्रह को पूर्ण समर्थन दिया,जिसका उद्देश्य जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना था। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा था,अलग संविधान था और वहां का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कहलाता था। डॉ.मुखर्जी ने जोरदार नारा बुलन्द किया था-`एक देश में दो निशान,एक देश में दो प्रधान,एक देश में दो विधान,नहीं चलेंगे,नहीं चलेंगे।` अगस्त १९५२ में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया-`या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने नई दिल्ली में नेहरू सरकार और श्रीनगर में शेख अब्दुला की सरकार को चुनौती देने का निश्चय किया और पं.नेहरू से कहा कि,वे जम्मू जरूर जाएंगे और बिना ‘परमिट’ के जाएंगे। ११ मई को रावी पर करते समय ही लखनपुर में डॉ. मुखर्जी को गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल ले जाया गया। ४० दिन तक न उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गई। भारत का यह शेर श्रीनगर की जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में २३ जून १९५३ को चिरनिंद्रा में सो गया।

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