कश्मीर

गंगाप्रसाद पांडे ‘भावुक’
भंगवा(उत्तरप्रदेश)
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हाथ में पत्थर जुबां पे ज़हर,
सोचिए कैसा ये कश्मीर शहर।
नौजवानों की करें क्या बात हम,
वहां की बेटियां भी मारे हैं पत्थर।
जिन्हें हम पालते हैं पिला के लहू,
वही निगल रहा है जैसे अजगर।
हाथों में संगीनें देखो सर है फटा,
इस हाल में टूटे न सेना का सबर।
अब तो बर्दाश्त की हद हो गई,
आखिरी चारा है इन्हें करो बेघर॥
परिचय-गंगाप्रसाद पांडेय का उपनाम-भावुक है। इनकी जन्म तारीख २९ अक्टूबर १९५९ एवं जन्म स्थान- समनाभार(जिला सुल्तानपुर-उ.प्र.)है। वर्तमान और स्थाई पता जिला प्रतापगढ़(उ.प्र.)है। शहर भंगवा(प्रतापगढ़) वासी श्री पांडेय की शिक्षा-बी.एस-सी.,बी.एड.और एम.ए. (इतिहास)है। आपका कार्यक्षेत्र-दवा व्यवसाय है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त प्राकृतिक आपदा-विपदा में बढ़-चढ़कर जन सहयोग करते हैं। इनकी लेखन विधा-हाइकु और अतुकांत विधा की कविताएं हैं। प्रकाशन में-‘कस्तूरी की तलाश'(विश्व का प्रथम रेंगा संग्रह) आ चुकी है। अन्य प्रकाशन में ‘हाइकु-मंजूषा’ राष्ट्रीय संकलन में २० हाइकु चयनित एवं प्रकाशित हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक एवं राष्ट्रीय ज्वलंत समस्याओं को उजागर करना एवं उनके निराकरण की तलाश सहित रूढ़ियों का विरोध करना है। 

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