कांटापठार-आस्था का शक्तिपीठ

सुमिधा सिदार`हेम`
सरकण्डा(छत्तीसगढ़)
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प्रकृति हमें अनमोल उपहार देती है-धरती,आकाश,वायु,अग्नि और जल। इन पाँच तत्व के बिना हम जीवन यापन नहीं कर सकते,ये हमारे लिए अमृत के समान वरदान हैं। जन्म- मृत्यु इन्हीं से शुरू होती है।हमारी सफलता-असफलता के गवाह यही पाँच तत्व हैं तथा हमारा शरीर भी यही पाँच तत्व का आधार है। इन पाँच तत्व के पुजारी प्रकृतिवादी गोड़ जाति के लोग होते हैं,जिनकी हर पूजा-पाठ रीति-रिवाज प्रकृति की गोद से होते हैं। छत्तीसगढ़ में बहुत बड़ी जनसंख्या इसी गोड़ जाति की है,जो अपने धर्म-संस्कृति की अलग पहचान बनाती है। गोड़ जाति के लोग सरल,सादगी स्वभाव वाले तथा ईमानदारी से परिपूर्ण होते हैं। गोड़ जाति के ईष्ट देव ‘बूढ़ादेव,बड़ादेव’ होते हैं। घर में किसी बुजुर्ग की मृत्यु हो जाने पश्चात्  उन्हें बूढ़ादेव तथा महिलाओं को बूढ़ी माँ के रूप में पूजते हैं।
गोड़ जाति के लोग धरती को माँ व आकाश को पिता का स्वरूप मानते हैं ।
गोड़ जाति का एक विशिष्ट गुण होता है जो प्रकृति से जुड़ा है,इसलिए इन्हें ‘प्रकृति पुत्र’ भी कहा जाता है। अपने नेक,धर्म-संस्कृति एवं गोड़ी धर्म को बचाए रखने के लिए महासमुन्द (छत्तीसगढ़) जिले के फुलझरराज में  भालुकोना कांटापठार में ऐतिहासिक कार्य किया गया है। ४ फरवरी २०१७ रविवार को बड़ादेव महापूजन व त्रिशूल स्थापना गुरूदादा दुर्गेभगत जगत जी के हाथों की गई।
यह कांटापठार गोड़ जाति के आस्था का केन्द्र यानी शक्तिपीठ है,जहां उनका अटूट विश्वास है,तथा ईष्टदेव का  आशीर्वाद है। इस अंचल का ऐतिहासिक  गोड़ी धर्म वैभव परम्पराओं व धर्म-संस्कृति की पहचान है,जिसके साक्ष्य लाखों श्रध्दालु हैं। महासमुन्द जिले से ही नहीं,वरन अन्य जिलों व पड़ोसी राज्य से भी इस कार्यक्रम में लोगों ने भाग लिया था। सांस्कृतिक नृत्य गीत कर्मा,सुआ से इस पवित्र स्थल कांटापठार की सुन्दरता में चार चाँद लग गए थे।  कांटापठार,गोड़ लोगों के अस्तित्व की पहचान है,गोड़ होने का स्वाभिमान है। गोड़ों के देव बड़ादेव का सबको आशीर्वाद है,जहां हर किसी  को सच्चे मन से की गई आराधना का फल मिलता है।
यह उस विश्वास की ताकत है, जो अपनी मेहनत में तत्परता से लगे हुए हैं। ये सम्पूर्ण गोड़ जाति की जीत है,जहां उनके विश्वास का जलता हुआ दीया कांटापठार है। यह गोड़ जाति द्वारा प्रकृति की गोद में लिखी गई सच्ची कहानी है,जहां मन्नतों के दाता बड़ादेव हैं,जिनके सानिध्य में सब फल- फूल रहे हैं।
जय बूढ़ादेव,जय बड़ादेव।
परिचय-१३ सितम्बर १९९० को जन्मीं सुमिधा सिदार का जन्म स्थान-ग्राम कुण्डापाली(छग) है। आप वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य में महासमुंद जिले के ग्राम-सरकण्डा में रहती हैं। श्रीमती सिदार का साहित्यिक उपनाम-हेम(पति का नाम और वही आदर्श)है। शिक्षा-बी.ए. और कार्यक्षेत्र-सरकण्डा ही है।आप सामाजिक क्षेत्र में लोगों को बेटी की महत्ता बताने के साथ ही तनाव से राहत के लिए हँसाने की कोशिश करती हैं। लेखन में कविता, कहानी, एकांकी, हाइकु, तांका, मुक्तक एवं शायरी रचती हैं। आपकी नजर में-मेरी लिखी रचना कोई दूसरा पढ़ता है,वही सम्मान है। आपके लेखन का उद्देश्य-समाज की औरतों के प्रति है,क्योंकि गोंडवाना समाज को निखारना है,ताकि महिला वर्ग घर,गली, गाँव से बाहर निकलकर समाज के बारे में सोंचने को तैयार करना,औरतों को जागृत करना व हिन्दी भाषा लेखन को बढ़ावा देना है। कार्यक्षेत्र में आप गृहिणी हैं और ब्लॉग पर भी लिखती हैंl कुछ वेब मंचों पर आपकी रचना का प्रकाशन हुआ है।

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