कावड़ियों द्वारा हिंसा:पुलिस बेबस

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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यही अंतर है स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में,यही अंतर है धर्म और अधर्म में। आजकल धर्म की प्रभावना बहुत है,और होनी भी चाहिए,पर जब कोई भी विचारधारा समूह में होती है तो वह अराजक कैसे हो जाती है,इसका प्रमाण विगत दो दिनों में देहली और बुलंदशहर में देखने को मिला है। वहां का पुलिस प्रशासन मूक बना देख रहा है,वह हताशा में है,बेबस देख रहा है। यह भी एक प्रकार की ‘मॉब लिंचिंग’ हैं,और इसका वीडियो प्रमाण स्वरुप है। इन पर क्या कोई क़ानूनी कार्यवाही की जाना उचित होगी,या धर्म की आड़ में कुछ भी किया जाए,वह सब जायज है ? इसका मूल कारण समूह में होना है। समूह में लोगों में इतना उत्साह रहता है कि उन्हें जोश में होश नहीं रहता है।
वैसे हमारा देश नए युग की शुरुआत में है। मेक इन इंडिया,स्टार्ट-अप इंडिया आदि जारी है। हमारे यहाँ एक प्रकार से बेरोजगारी है,भोजन की व्यवस्था नहीं और काम करने के अवसर बहुत होने के बाद भी कोई काम नहीं करना चाहता है। हमारे देश में किसी  कालोनी में सड़क नहीं है,या कुछ श्रम की जरुरत है तो उसके लिए कोई इकठ्ठा नहीं होंगे और सब शासन-नगर निगम से अपेक्षा करते हैं पर सार्वजनिक काम पर आने की फुर्सत नहीं है। क्रिकेट मैच आने पर करोड़ों लोग टी.वी. से ऐसे चिपके रहते हैं,जैसे फैविकाल का जोड़,और कोई काम करने के लिए फुर्सत नहीं है। इसी प्रकार कोई आंदोलन हो,प्रदर्शन हो तो भीड़ अपने-आप इकठ्ठी हो जाती है, तोड़फोड़ करना हो तो किसी बैठक की जरुरत नहीं,अपने-आप इकठ्ठे हो जाते है,किन्तु किसी निर्माण कार्य में इनकी जरुरत हो तो समय नहीं है।
वास्तव में धर्म एक अफीम है और इसका नशा बहुत तेज़ी से चढ़ता है। धर्माधन्ता के कारण कुछ भी करो,चाहे अजान हो या अखंड पाठ के नाम पर कान फोड़ू लाऊड स्पीकर का बजना या धर्म के नाम पर जुलूस या शादी के नाम पर रास्ता रोकना,इसमें सब कुछ जायज है। अत्यंत सेवाएं भी प्रभावित करना उचित नहीं है,किसी को अस्पताल जाना,किसी की मृत्यु हो जाना,किसी को रेल गाड़ी-फ्लाइट पकड़ना,किसी की क्या स्थिति-परिस्थिति है, कावड़ियों को क्या मालूम,पर यही जुलुस एक क्रम से,अनुशासित चले तो मार्ग भी सुगम और उनकी यात्रा भी सुविधाजनक है। यदि इस समूह ने अनुशासनहीनता का रूप रख लिया,तब कहना क्या ?,जैसे शासन उनके हाथों में आ गया हो।
क्या यह धरम के नाम पर अतिवादिता नहीं है ? ये जब समूह में होते हैं तब भीड़तंत्र की ताकत के कारण मदांध हो जाते हैं,और फिर कुछ नहीं सूझता है। हमारे यहाँ वैसे तो बेरोजगारी है,और काम न करने के नाम पर धरम के लिए बहुत समय मिल जाता है,पर धरम यह थोड़ी सिखाता है कि अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करो,अनुशासन को मत मानो। आपने जिनकी कार तोड़ी,पुलिस की जीप जलाई और रास्ता रोककर आवागमन को प्रभावित किया ये क्या सब धर्म की परिभाषा के अंतर्गत आता है..! हमारे देश को स्वतंत्र हुए ७१ वर्ष होने जा रहे हैं और हम वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं। क्या अब भी यह बुनियादी शिक्षा दी जाए कि,अनुशासन का पालन करो,दूसरों को कष्ट न दो,पर उससे विपरीत हम चल रहे हैं। मात्र शक्ति प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं हो रहा है,पर जहाँ शक्ति प्रदर्शन करना चाहिए वहाँ मौन हैं! कितनी बच्चियों औरतों के साथ दुराचार हो रहा है,उस पर चुप का कारण हो सकता हो कि उनकी भी भागीदारी न हो। ये सब अशांति का वातावरण पैदा करके नई नेतागिरी को चमकाने का काम कर रहे हैं,जो सब अनुचित है।
इसके लिए अनुशासन जरुरी है,मार्च ऐसा निकले जिससे दूसरे प्रभावित न हों और शासन को चाहिए जो अपराधी हों,उन्हें बिना किसी भेदभाव के कठोरतम दंड की प्रक्रिया कर दण्डित किया जाए। साथ ही जो नुकसान हो,उसकी भरपाई भी उनसे ही कराई जाए। इनके नेता और आयोजक को भी ध्यान रखना चाहिए। क्या ये सब बिना नेता की फौज हैं,तो इन पर बंदिश भी लगना चाहिए.क्योंकि धर्म के नाम पर इस अधर्म से अपनी ही प्रतिष्ठा गिरती है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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