कितनी ताकत होती है रोटी में

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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                 सभी जीव,जंतु,वृक्ष आदि पृथ्वी पर  रहते हैं। भोजन ही उनके जीवित होने का आधार होता है। इसी आहार से वे सब बलिष्ठ होते हैं और उनमें शक्ति का संचरण होता है। आहार से प्राप्त शक्ति का उपयोग अधिकांशतः तीन प्रकार का होता है जैसे रचनात्मक,विध्वंसात्मक और संरक्षणात्मक। प्रकृति ने जीव-जंतु,वृक्षों को जीवन देने के लिए प्राकृतिक रूप से व्यवस्था की है और वे बिना कल की चिंता और बिना संग्रहण के रहते हैं पर मानव को जन्म से ही अपने आहार के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। शिशु को माता का दूध चाहिए,उसके बाद अन्न, जल,फल आदि इन सबके लिए मनुष्य को पराधीन रहना पड़ता है। यह पराधीनता जन्म से मृत्यु तक रहती है। जब से मानव अस्तित्व में आया है तो पहले कल्पवृक्ष के माध्यम से उसकी इच्छापूर्ति होती थी। उसके बाद उसे अन्न पाने के लिए श्रम करना पड़ा। जो अन्न पैदा करते हैं,कृषि का काम करते हैं,उन्हें कृषक कहते हैं। अन्य जन जो कृषक नहीं होते,उनको कृषक के अन्न  पर निर्भर रहना पड़ता है,जिसके लिए धन की आवश्यकता होती है। धनाभाव के कारण अन्न के बिना जिन्दा रहना असंभव होता है।
यह व्यवस्था सनातनी है कि,कृषक भरण पोषण करने वाला होता है और बाकी सब उस पर आश्रित होते हैं। इतिहास साक्षी है कि,जब भी अन्न का अभाव या अकाल पड़ा तब शासन या राजा ने अपना अन्न कोष खोलकर जनता को अन्न दिया है।
मानव की संग्रह करने की आदत होने से धनवान व्यक्ति इसका दुरूपयोग करते रहे। उन्होंने अधिकतम संग्रह कर जनता का शोषण किया। मानव पेट की आग शांत करने के लिए सब-कुछ करता है।कई बार देखने में आता है कि भूख शांत करने के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं,या हो जाना पड़ता है। आज भी हालात ये हैं कि कई स्त्रियां पेट की आग मिटाने के लिए मजबूरी में कोठे पर बैठ जाती हैं। जेल में कैदी लोग रोटी के लिए अनैतिक काम करने को तैयार रहते हैं। अधिकतर लोग बहुत से अपराध पेट के लिए अन्न न मिलने पर और अन्न के धनाभाव होने पर करते हैं। यहाँ तक कि आत्महत्या करते हैं,हत्या करते हैं,चोरी करते हैं या डाका डालते हैं|
     आज भी गरीब क्षेत्रों में अन्न के अभाव में वहां के बच्चे जूठन खाने को मजबूर होते हैं। कई बच्चे,माँ,बहिन कभी-कभी धनवानों से शोषित हो जाती हैं और कई तो अकाल के गाल में समा जाती हैं। वर्तमान में राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा गरीबों को अन्न आदि प्रदाय करने की योजना बनाई गई है,जिससे बहुत लोग लाभान्वित हो रहे हैं,पर अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
         इस सम्बन्ध में कई घटनाएं सामने आती हैं। कुछ हमारी कल्पना से परे होती हैं,कुछ अकथनीय होती हैं। एक बच्ची विद्यालय में पढ़ती थी। उसकी कक्षा की किसी छात्र की कलम चोरी हो गई। शिक्षक द्वारा सब बच्चों के बस्ते की जाँच कराई गई पर उस बच्ची ने पहले तो अपने बस्ते की जाँच कराने से मना कर दिया। आखिरकार तलाशी में उसके बस्ते से शाला के बच्चों की जूठन निकली। पूछने पर उसने बताया कि वह अपने माता-पिता व बहिन के लिए भोजन इकठ्ठा करके ले जाती थी। ये घटना तो मात्र एक है और न जाने कितनों को ऐसा करना पड़ रहा होगा। और तो और अब किसान जो अन्नदाता कहलाता है,उसको ही किसानी का पूरा पैसा नहीं मिलने से आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसके बाद भी  देखने में आता है कि शादी में, होटलों में,समारोह में बेरहमी से अन्न फेंका जाता है। समझना होगा कि एक-एक कण को तैयार करने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है,और जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचना  ही चाहिए।
आज भी भारत में करोड़ों व्यक्ति या लाखों परिवार एक वक्त के भोजन के लिए दर-दर भटकते हैं, कचरे में से अन्न की जूठन खोजते हैं और कभी कभी भूखे भी सोते हों तो कोई आश्चर्य नहीं। आज तो किसान भी भूखा सोने को मजबूर हो रहा है।
वैसे हमारे देश की स्थिति पहले से सुधरी है,पर अभी भी बहुत कुछ करने की गुंजाईश है-
    ‘अस्मत लुटा के बैठी एक लड़की अपने कोठे पर,
    ख्याल आता है कितनी ताकत होती हैं एक रोटी में।’
परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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