किराए का फूफा

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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सतना वाले ब्याई जी के यहां मझले बेटे का ब्याह चल रहा है,इस मंगल घड़ी में सभी हर्षोल्लास से लबरेज थे,लेकिन ब्याई जी को बारात की चिंता खाए जा रही थी। विवाह में जितनी मांगलिक पत्रिकाएं नहीं छपी,उससे ज्यादा बारात का आमंत्रण छपा। हर पत्रिका के साथ दो-दो आमंत्रण-मनुहार की गई।
अड़ोस-पड़ोस,नाते-रिश्तेदार,दोस्तों से मनुहार कर-करके,ब्याई जी का मुंह सूखने लगा। मजाल है कि सीटें भरा जाए। जिस भी किसी व्यक्ति से बारात में चलने की मनुहार की,वह पल्ला झाड़ने लगा।आप सोच रहे होंगे-बारात में जाने से कौन मना करेगा! लेकिन, जब बारात दूसरे राज्य नागपुर के गांव गजब चौक जाए तो माथे पर सल आना लाजमी है।
५-६ दिन की बारात,आज के इस युग में दिवा-स्वप्न-सी जान पड़ती हैl बारात में पधारने की मनुहार जिस भी किसी सज्जन से की,वह कन्नी काटता नजर आया।
बच्चों के विद्यालय खुल गए,कार्यालय में बहुत मारामारी है, कल्लू की नानी की मौसी बीमार है,प्रायवेट नौकरी है,आप तो जानते ही हैं ना…ऐसे कई बहाने वास्तविकता का जामा पहने मुस्कुरा रहे थे।
बारात के १ दिन पहले जब बारातियों की कमी माथा खुजा रही थी,तभी दस्सू भैय्या को एक तरकीब सूझीl उसने परोसगारीकर्ता (केटरर) के उस्ताद को बुलाकर वेटरों की दैनिक मजदूरी पूछीl फिर क्या था,एक-एक करके बस की खाली सीट भरने लगी। हटटे-कट्टे मोटे-मोटे २ लोगों को फूफा बनाया,१ को जियाजी,३ को मौसा,२ को काका और ३ लोगों को किराए का साला बनाकर बारात हँसते-गाते नागपुर रवाना हुई।

परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl

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