किशोरावस्था में मानसिक तनाव

कैलाश मंडलोई ‘कदंब’
रायबिड़पुरा(मध्यप्रदेश)

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१२ से १८ वर्ष की आयु को किशोरावस्था कहा गया है। यह जीवन का बसंत काल होता है। इस अवस्था में व्यक्ति न तो बच्चा होता है,और न प्रौढ़। माता-पिता एवं शिक्षक बच्चे की इस अवस्था से अत्यंत भयभीत रहते हैं,क्योंकि इस अवस्था में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है। इस अवस्था में व्यक्ति के व्यक्तित्व का नया जन्म होता है। तीव्र तथा विशिष्ट परिवर्तन बच्चे के व्यक्तित्व को पूर्णतः बदल देते हैंl इन परिवर्तनों के कारण इसे `तनाव और संघर्ष` का काल कहा गया है। यह जीवन का सबसे कठिन काल है। इस अवस्था में संवेगों का विकास तीव्र गति से होता है। शारीरिक और मानसिक विकास भी तीव्र गति से होता है। अतः इस अवस्था में बच्चा समायोजन की समस्या का अनुभव करने लगता है। इच्छापूर्ति में बाधा,प्रतिकूल पारिवारिक संबंध, स्वयं की अयोग्यता,नई परिस्थितियों से समायोजन न कर पाना आदि कारकों के कारण किशोरों में मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। किशोरों का अपने माता-पिता से किसी-न-किसी विषय पर मतभेद चलता रहता है। माता-पिता इस अवस्था में बच्चों जैसा व्यवहार करते हुए उसे सदैव उपदेश देते रहते हैं,और उन कार्यों के लिए उसे मना करते हैं,जो वे स्वयं करते हैंl इससे किशोरों में कई बार तनाव एवं विरोध की भावना उत्पन्न होती है। किशोर भावी व्यवसाय के बारे में चिंतित रहते हैं,और इन व्यवसायों में प्राप्त होने वाली सफलता या असफलता उनके सामाजिक विकास को प्रभावित करती है एवं मानसिक तनाव को भी प्रभावित करती है।
अतः किशोरावस्था में बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने में माता-पिता का व्यवहार,परिवार का वातावरण,आस-पड़ोस का वातावरण,विद्यालय का वातावरण काफी कुछ मददगार साबित होता है।
परिवार में माता-पिता के संबंध,भाई-बहनों के बीच के संबंध,अन्य सदस्यों के आपस में संबंध यदि माधुर्यपूर्ण होंगे,तो बच्चा एक संतुलित व्यक्तित्व लिए हुए विकसित होगा,परन्तु यदि परिवार का वातावरण इसके विपरीत होता है तो बच्चा उग्र स्वभाव का होगाl वह मानसिक ग्रन्थियों का शिकार होगा। बच्चे के आसपास का वातावरण जितना स्वस्थ होता है,बच्चे का विकास उतना ही स्वस्थ होता है। वहीं शाला का वातावरण भी बच्चे को प्रभावित करता है। प्रधान पाठक का अपने सहयोगियों-शिक्षकों के साथ संबंध,शिक्षकों के आपसी संबंध,शिक्षकों के विद्यार्थियों के साथ संबंध जितने मधुर होंगे,बच्चे का मानसिक तनाव उतना की कम होगा। यदि विद्यालय का वातावरण इसके विपरीत होगा,तो बच्चा मानसिक तनाव से अधिक प्रभावित होगा।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि,बच्चों के साथ विद्यालय एवं समाज का सौहार्दपूर्ण व्यवहार उसके अच्छे एवं सुदृढ़ व्यक्तित्व के विकास में सहायक होकर किशोरावस्था में उसके मानसिक तनाव को कम करने में सहायक भी होता है।

 परिचय-कैलाश मंडलोई का साहित्यिक उपनाम ‘कदंब’ हैl आपका निवास रायबिड़पुरा(जिला खरगोन,म.प्र.)में हैl एम.ए.(हिन्दी) और डी.एड. शिक्षित श्री मंडलोई का जन्म १५ जून १९६७ को हुआ हैl पेशे से आप शिक्षक होकर लेखन करते हैंl आपने सेवा कार्य के तहत विशेष रुचि लेकर शाला परिसर में १००० पौधों का वृक्षारोपण कर उद्यान तैयार किया है।अन्य शैक्षिक गतिविधियों में अतिरिक्त समय में छात्र-छात्राओ को पढ़ाना,सुबह योग की कक्षा लगाना आदि शामिल हैl शैक्षिक सामग्री का निर्माण व प्रदर्शन,६०० से अधिक विज्ञान एवं गणित के प्रारुप(माडल) का अनुपयोगी वस्तुओं से निर्माण,१००० से अधिक कटाउट्स,१००० से अधिक चार्ट,अख़बार की कतरनें आदि शामिल है। अन्य शालाओं के छात्र-छात्राओं को अपनी शाला में बुलाकर विज्ञान-गणित प्रारुप का प्रदर्शन करना,वाद-विवाद प्रतियोगिता,निबन्ध प्रतियोगिता और सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन सहित विभिन्न दिवसों तथा महापुरुषों के जन्मदिन पर सबको एकत्रित कर संगोष्ठियों का आयोजन करना आपकी पसंद का काम है। आपकी लेखन विधा-नई कविता,छंद,छंदमुक्त रचनाएं एवं आलेख आदि है।अनेक कवि सम्मेलनों में कविता पाठ कर चुके श्री मंडलोई के कई सामूहिक काव्य संग्रह हैं,जिसमें-वर्तमान सृजन,नव काव्यांजलि,एक पृष्ठ मेरा भी और छंद कलश आदि हैं, तो व्यक्तिगत प्रकाशित पुस्तक `साहित्यमेध` हैl अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा वेब पोर्टलों पर आपकी कविताएँ,कहानी,आलेख, तथा समीक्षा प्रकाशित हैl साहित्यिक क्षेत्र में आपको श्रेष्ठ रचनाकार,श्रेष्ठ टिप्पणीकार सम्मान सहित काव्य मार्तण्ड सम्मान,साहित्य संगम समीक्षाधीश,साहित्य अभ्युदय सम्मान के साथ ही व्याकरणशाला एवं छंदशाला में श्रेष्ठ प्रदर्शन के प्रमाण-पत्र मिले हैंl विशेष पुरस्कार में आपके पास कलेक्टर द्वारा सम्मान,जिला स्तर पर पर्यावरण पर सम्मान,जिला स्तर पर शिक्षक सम्मान हैl आप वर्तमान में साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता से में कार्यरत हैंl

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