कुत्ते और जेबकतरा

 

अजीत सिंह चारण
बीकानेर(राजस्थान)

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मैंने टिकट ली,ट्रेन में चढ़ा और वह चल पड़ी,क्योंकि उसे तो चलना ही थाl अपनी मस्ती में मस्त हारन रूपी मुख से कुछ गीत गुनगुनाते हुए अपनी ही धुन में कुछ गाए जा रही थी..क्या गा रही थी मेरी समझ से बाहर था,पर शोर जैसा कुछ था जरूर,जहां उसे श्रोता जैसी कुछ भीड़ दिखती,वह खुशी से झूम के रुक जाती है और उन्हें अपने में समाहित करते हुए भारतीय संस्कृति का परिचय देती और आगे चल पड़ती हैl

चलते-चलते वह मुकाम भी आया,जहां पहुंचने के बाद मेरी टिकट की शारीरिक और मानसिक यानी आर्थिक शक्ति चुक गई थीl इसलिए मैं ट्रेन से नीचे उतरा,या यूं समझिए कि उतार दिया गयाl मैं जहां उतरा,वह कोई खास जगह नहीं थीl फिर भी दिल बहलाने के लिए दो ठंडे जल की प्याऊ,जिनमें पानी लगभग नहीं था,क्योंकि वह स्वचलित थीl दो ठेकेदार,जो सुबह की चाय को ताजा कहकर अब तक बेच रहे थे,पास ही एक ब्रेड के टुकड़े को घेरकर दो कुत्ते खड़े थेl ये न लड़ते थे,न भोंकते थे,बस बड़े-बड़े सफेद दांत दिखा रहे थे जैसे पेप्सोडेंट का विज्ञापन कर रहे होंl मैं उस विज्ञापन में दिलचस्पी लेने लगा,तभी जीआरपी वालों का एक कुत्ता आया…उस ब्रेड के टुकड़े को उठाया और वहां से चला गया,पर वे दोनों कुत्ते कुछ भी बोलने यानी कि गुर्राने की बजाए बस पूंछ हिलाकर खुशामद कर रहे थेl जीआरपी का कुत्ता गर्व से सीना ताने उन पर `कृपा दृष्टि है` की और चला गयाl वे खुश थे चलो झंझट मिटा,एक ब्रेड का टुकड़ा और हम दो-क्या फायदाl अच्छा किया जो ले गया,ऐसी भारतीयता और कहां है ?

सुहाना सफर

मैं फिर नर्वस होने लगा,तभी मॉडल जैसी कुछ लड़कियां आई,मैं खुश हुआl बचपन से दो ही शौक रहे हैं-साहित्य पढ़ना और सौंदर्य देखनाl साहित्य मेरे पास था नहीं,सौंदर्य आ पहुंचाl लाइन मारने के इरादे से मैंने सोचा,पहले मुंह-हाथ धो लिया जाए,असर जमेगाl यही सोचकर नल के पास आयाl पानी कम था,फिर भी मैंने ड्राई क्लीन कर ली,तभी मुझे लगा कि आयकर विभाग के अधिकारियों की तरह कोई मेरे जेब की लक्ष्मी पर कुदृष्टि डाल रहा हैl मेरे होते हुए कोई मेरा धन चुराने का प्रयास करे,यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता,क्योंकि यह राष्ट्रीय नहीं,व्यक्तिगत अस्मिता का भी सवाल थाl मैंने तुरंत उस टपोरी जैसे लड़के को पकड़ा,जो मेरी जेब एकमात्र इज्जत-आबरु सौ-सौ के पांच हरे पत्ते अपनी मुट्ठी में दबाना चाह रहा था,पर ऐनवक्त पर चश्मे से झांकती मेरी छोटी-छोटी आंखों ने उसे धर दबोचाl मैंने उससे अपने रुपए वापस ले लिए,यानी कि छीन लिएl अब मुझे उस भारत के भविष्य से कोई सरोकार नहीं था,लेकिन फिर भी बुद्धिजीवी और विद्वान होने के नाते अपने ज्ञान के थोक भंडार से राष्ट्र की सेवा हेतु कुछ ज्ञान खर्च करना आवश्यक समझाl यूं समझ लीजिए उन कन्याओं को अपने ज्ञान की थोक दुकान दिखाकर प्रभावित करने हेतु मैं उस बालक पर ज्ञान की बौछार एकसाथ करने लगाl वह इस ज्ञान की बारिश से लगभग भीग गया,लेकिन मुझे उसकी कोई परवाह नहीं थीl चोरी करना पाप है,भगवान ने दो हाथ दिए हैं,कमाकर खाने की नीयत नहीं,घरवालों ने चोरी करना सिखाया क्या,बोल..अंदर करवा दो तो कैसी रही..पता नहीं,थोक भाव से कहां-कहां के पैदा हो जाते हैं ? ऐसी अनेक पंक्तियां मेरे मुंह से धड़ल्ले से बिना विराम लिए निकलती जा रही थीl आसपास की भीड़ और उन कन्याओं की तिरछी नजर मुझ पर कटाक्ष कर रही थीl

अचानक जीआरपी वाले `मामाजी` मेरे पास आए यानी कि आरक्षकl एक बार तो मैं घबरा गया,क्योंकि मुझे जन्मजात `पुलिसफोबिया` है,लेकिन सज्जनता उनके चेहरे पर `फेयर एंड लवली` की तरह चमक रही थीl उन्होंने हाथ मिलाना चाहा,पर मैंने नहीं मिलायाl मन के किसी कोने में डर अभी भी दबा हुआ बैठा थाl मेरे को घूरकर पूछा-क्या बात हुई ? मैंने कहा-कुछ नहीं,यह लड़का मेरी जेब काट रहा था तो…तो आपने मुझे सूचना क्यों नहीं दी ? ऐसी कोई खास बात नहीं हुई….सौ ही रुपए की बात थी तो मैंने सोचा जाने दो,पर लड़के को थोड़ा समझाना उचित समझा इसलिए….मैंने अटकते हुए कहाl….सारे समाज को सुधारने का ठेका आपने ले रखा है ? हम क्यों बैठे हैं यहां ?,उसने धमकाते हुए कहाl मैं सकुचाते हुए बोला-अजी छोड़िए भी,कुछ खास नहीं! उसका तमतमाया चेहरा अपनी वाली पर उतर आया,

कड़ककर बोला-`बुद्धिजीवी के बच्चे!
तुम्हें भी अंदर कर दूं तो कैसी रहे..साले…पुलिस कुछ करती है तो करने नहीं देते,न करें तो भ्रष्टाचार का लांछन लगाते हैंl आए बड़े समाज सुधारक! चल मुकदमा दर्ज करवाl` अब तक उन कन्याओं की सहानुभूति पुलिस वाले के साथ हो चुकी थीl उन्होंने कहा-भाई साहब यह सही कह रहे हैंl आज आपकी जेब कटी है,कल किसी और की कटेगीl आप इनका कहना न मानकर अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं!
आरक्षक ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा-`चल रहे हो या तांगा मंगवाऊं साहब के लिए!` उनका यह व्यंग्य बाण मेरे हृदय को चीरता हुआ निकल गया,मैं शर्म से पानी-पानी हो गयाl वह टपोरी जैसा बालक मुझे देखकर हंस रहा था और वे कन्याएं यह नजारा देखकरl

मैं डरा कि,कहीं फिर से न धमकाए,इसलिए मैंने डरना उचित समझा और डरते-डरते उनके पीछे चल पड़ा थाने की ओर,भारत से भ्रष्टाचार,अनाचार,दुराचार,अपराध आदि को नष्ट करने के लिएl मैं मुकदमे रूपी मिसाइल को छोड़ने के लिए जा रहा थाl

पुलिस चौकी पहुंचने पर उन्होंने मेरी और उस बालक की बड़ी खातिर कीl उस बालक को ही भेजकर एक पैन,५० पेपर,१० कार्बन मंगवाएl नाश्ते के लिए गर्म समोसा और चाय मंगवाईl मैं बहुत खुश हुआ और उनकी प्रशंसा में एक कविता पढ़ डाली…पर मेरा दिल उस समय बैठ गया,जब उस नाश्ते और अन्य सामान यानी कि स्टेशनरी का बिल मुझे चुकाना पड़ाl उन्होंने रोजनामचे में पूरी घटना लिखीl बालक ने अपना पेट भरने के लिए जेब काटी थी,पर मामाजी ने रौब और ईमानदारी से भारत सरकार सेवार्थ १ मिनट में मेरे गुलाबी पत्ते को झटक लिया! उन्होंने एफआईआर की पेशकश की,जिसमें बालक द्वारा मारपीट करना भी शामिल थाl मैं उनका प्रस्ताव सुनकर लगभग कांप उठा,ऐसे मामलों में भुगतभोगी रहा हूंl मैंने विनती की-`आप यह सब रहने दीजिए,मुझे अगली ट्रेन पकड़नी हैl` वे बोले-`नहीं,यह नहीं हो सकताl मैंने रजिस्टर में दर्ज कर लियाl` मैं रो पड़ा,उन्होंने मेरे कंधे को संभालकर बोला-`मामला रफा-दफा कर दूं!` मैंने कहा-`हां सरl`

वह दाई आंख दबाकर बोले-`कुछ चाय पानी का खर्चा करना होगा!`

मैं भारत सरकार की सेवा में २००० खर्च कर चुका था,पीछा छुड़ाने के लिए ५०० और निकालेl उन्होंने बाज की तरह झपट्टा मारा,बोले-`और निकालो…..?` मैंने कहा-`नहीं सर मुझे आगे जाना है,फिर कभी आपकी सेवा करुंगाl` मैं जल्दी से बाहर निकलाl मामाजी बोले-`जरा आराम से चले जाना,भाग क्यों रहे हो ?` मेरे पीछे वह बालक भी थाl हम दोनों ही खुश थे,चलो पीछा छूटा,वरना रोज कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते!…मैं एक क्षण रुका,फिर पीछे मुड़कर देखा…उस बालक ,…आरक्षक और फिर अपने को…यकायक कुत्ते वाला दृश्य मेरे दिमाग में घूमने लगा…मुझे पश्चाताप हुआ…यदि मैं उस बालक को नहीं पकड़ता,तो उसे अपने हुनर पर गर्व होता और मुझे केवल कुछ ही पैसों की चपत लगती…l

परिचय-अजीत सिंह चारण का साहित्यिक नाम अजीतसिंह अजीत है। आपकी जन्मतिथि ४ अप्रैल १९८७ और जन्म स्थान जौतासर(शहर रतनगढ़,राजस्थान) है। वर्तमान में सारुन्डा नोखा पांचू (बीकानेर)में निवासरत हैं। बीए और एमए के साथ आप `नेट` -जेआरफ उत्तीर्ण होकर कार्यक्षेत्र में व्याख्याता हैं। सामाजिक क्षेत्र में आप साहित्य लेखन एवं शिक्षा से जुड़े हुए हैं। साथ ही अध्यापन, साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी मंच संचालन व कवि सम्मेलन में सक्रिय हैं। आप लेखन विधा के तहत हास्य व्यंग्य,गीत,मुक्तक, कविता सहित अन्य विषयों पर आ लेख लिखते रहते हैं। रचनाएं कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं तो राजस्थानी गीत संग्रह में भी गीत प्रकाशित हुआ है। लेखन की वजह से आपको रामदत सांकृत्य साहित्य सम्मान,वाद-विवाद व निबंध प्रतियोगिताओं में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कार। सहित नोबल टाइम्स साहित्य सम्मान,राणौली साहित्य सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। लेखन में आपके प्रेरणापुंज किशोर कल्पनाकांत,डॉ. कुमार विश्वास व वाचिक परंपरा के सभी कवि हैं,क्योंकि हर कवि का अपना स्वर है हर स्वर की अपनी मादकता।विशेष उपलब्धि राष्ट्रीय मंचों पर लगातार कवि सम्मेलन में भागीदारी है। लेखनी का उद्देश्य-केवल प्रेम पाना और आनंद लुटाना है।

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