कुल्लू-यात्रा

सुनील जैन राही
पालम गांव(नई दिल्ली)

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“भाई साहब आपका पत्र मिला। धन्यवाद। अगर हिन्दी में लिखते तो अच्छा लगता। आपने अंग्रेजी में लिखकर हमारी फजीयत करा दी। जब छटंकी से पूछा- ये क्या लिखा है,तो उसने मजाक उड़ाते हुए कहा-दादा आपको इतनी भी लज्जा नहीं आती। मेरी आँखें लाल देखकर वह दल बदल गया। उसने कहा-मेरा मतलब अंग्रेजी नहीं आती। देखो मुझे जितनी लज्जा आती है,मैं बता दूंगा। लज्जा इसलिए कि अंग्रेजी गलत हो तो शर्म की बात है,हिन्दी की कोई बात नहीं। लिखा है-तुम्हें कुल्लू या कल्लू,बुलाया है। ये कल्‍लू है या कुल्‍लु ये आप जानो।”
इसकी घर में चर्चा हो गई। बुडढा कुल्लू जाएगा तो अपनी घराली को भी ले जाए। वैसे दोनों की बर्फ में ममी अच्छी बन जाएगी। ना हिन्दू गुस्सा,ना मुसलमान। एक को जलाने की पड़ी रहती है,तो दूसरे को गाड़ने की। बुडढे का धरम सत्ता के साथ बदल जाता है। हिन्दुओं की सरकार हो तो जनेऊ, मुसलमानों की हो तो टोपी पहन लेता है। बुडढा सठिया गया है। अरे भाई,तू हिन्दू की औलाद है-हिन्दू बनेगा,मुसलमान की औलाद तो मुसलमान…। खैर, इसको तो मरना है। जाने दो कुल्लू। कुल्लू में मरे या कल्लू के यहां। समस्या तो ऊंट की तरह बैठी की बैठी ही रहेगी-जलाओ या गाड़ो। मरने के बाद तो बाडी रह जाती है,न राम रहता है और ना रहीम।
कुल्लू जाने के दो ही तरीके-एक तो हवाई जहाज से या फिर बस से। हवाई जहाज की औकात नहीं,बस में चक्कर आते हैं। सो गाड़ी करके जाने की ठानी। जिन्दगी भर टेबल के आसपास से जो कमाया, उसे ठिकाने तो लगाना है ना ? तैयारी हो गई। बुडढा और बुढ़िया की खटिया पास-पास बिछा दी सपने में कुल्लू जाते-जाते मर-मरा गए तो एक साथ ही क्रिया करम करने में सुविधा होगी। बुडढा तो मरने के बाद पहचान में आ जाएगा-हिन्दू है,मुसलमान है…लेकिन बुडढी…बुडढी तो जन्म से जैसी थी,वैसी ही है। रात को खटिया पर पड़ते ही बुडढे को नींद आ गई। बुडढे को मालूम था,अगर जागता रहा तो बुढ़िया चैन से सोने नहीं देगी। कहेगी-जितना खर्च होगा उसमें एक सोने की मोटी चैन आ जाएगी।
करनाल से जैसे ही गुजरे तो मौसम देखकर बुडढे को बुढ़िया भी अप्सरा लगने लगी। गाड़ी रोक दी। सड़क किनारे जंगली और आवारा फूल लगे थे। बुडढा तोड़ लाया और बुडढी को एक फूल थमा दिया। शहर में केवल आवारा होते हैं। फूल पाकर बुढ़िया ऐसे शरमाई,जैसे साहब की नई निज सहायिका…।
चाय की दुकान पर चाय पी,फिर लस्सी पी,फिर सिगरेट पी,बस दारू की दुकान होती तो एक-एक पैग भी लगा लेते। गरीब आदमी का खून पीने में और टेबल के आसपास से उमड़ती पैसों की सुनामी से जो माल मिलता है उसे बटोरने में जो आनंद आता है,वह कुल्लू पहुंचने के बाद मिले या ना मिले, इसकी गारन्टी नहीं होगी। मोड़ वाले रास्तों से कार सनसनाती न्यायसेवा की तरह चली जा रही थी। जो आया वो धड़ाम। अंधे मोड़,चुनावों की तरह हर पांच किलोमीटर पर पड़े थे। बच गए तो भक्त,नप गए सत्ता से दूर सत्ता के चमचे।
जितना ऊंचा हमारे यहां रावण का पुतला बनता है,उससे ऊंचे पेड़। पेड़ों में अहंकार नहीं,पेड़ सीधे थे,यहां के लोग भी सीधे। उन्हें मारने के लिए हर साल राम नहीं आता। उनमें बारूद नहीं भरी। पेड़ों में जातिवाद नहीं था। सभी पेड़ एक ही भूमि पर एकसाथ खड़े थे। उनका कोई नेता नहीं,उनका कोई धर्म नहीं था। सभी ने मौसम बांट लिए थे,आदमी ने जैसे धर्म बांट लिए है। उनमें साम्प्रदायिक तनाव नहीं था, स्थिति हमेशा नियंत्रण में रहती। प्रत्येक का मौसम तय था। मौसम आते ही बौरा जाते,जैसे चुनाव में नेता़। उनकी खुशहाली देखकर आने वाले शहरी दक्षिण अफ्रीका की गरीबी की तरह सिकुड़ जाते। नदी का पानी,दल के घोषणा-पत्र की तरह साफ,जैसे पानी नीचे पहुंचता और चुनाव के बाद घोषणा-पत्र और पहाड़ के बाद नदी का पानी गंद से भर जाते हैं।
पेड़ों के बीच से गुजरते हुए,बर्फ सिलाओं के बीच दो गज जमीन की तलाश में बुडढा और बुढ़िया एक दूसरे को साँसों का सहारा दे रहे थे। प्रदूषण मुक्त हवा में आक्सीजन ज्यादा परेशान कर रही थी। प्रदूषण की आदत जो बनी हुई थी। बर्फ ही बर्फ। बर्फ में बुडढा कुल्लू को ढूंढने लगा। उसे उम्मीद थी कि कल्लू ने अपना नाम बदल कर कुल्लू कर लिया होगा। सभी जगहों के नाम बदले जा रहे हैं, इसलिए कल्लू,कुल्लू हो गया होगा।
उसने कार से उतर कर दो बार कल्लू-कल्लू करके आवाज लगाई,लेकिन न तो कल्लू दिखाई दिया,न कल्लू आया। इतने में बुढ़िया ने ठिठोली करते हुए बुडढे के मुँह पर बर्फ का गोला मारा। बुडढे का चेहरा पानी से सराबोर हो गया और उसकी नींद खुली तो देखा बुढ़िया लोटे में पानी और राजनीति का बंदर छाप मंजन लिए खड़ी थी।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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